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वक्त है सुधार में रफ्तार का
शंकर अय्यर
Updated Wed, 15 Mar 2017 07:50 PM IST
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शंकर अय्यर
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जिस दिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आ रहे थे, उस दिन मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के 1,020 दिन पूरे किए। अब देश के पंद्रह राज्यों में भाजपा का शासन (अपने बूते और सहयोगियों के साथ) है, जिनमें 60 फीसदी से ज्यादा आबादी है और ये राज्य देश के 70 फीसदी भौगोलिक क्षेत्र में फैले हैं।
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जीत उपलब्धि और चुनौती, दोनों है। वोट महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों की जन स्वीकृति का प्रतीक है। यह भाजपा से बदलाव की गति में तेजी की भी उम्मीद करता है। संरचनात्मक कारणों से बदलाव मुश्किल है। कई विफलताओं के कारण और निदान (मानव विकास संकेतक से लेकर निवेश और रोजगार सृजन तक) केंद्र-राज्य संबंधों में निहित हैं। भाजपा के लिए यह अवसर की खिड़की है, क्योंकि 2019 के चुनाव में अभी 20 महीने से ज्यादा का समय बाकी है। उम्मीदों को पूरा करने के लिए नरेंद्र मोदी को पंद्रह राज्यों की अपनी सरकारों को सक्रिय करना होगा। संभावित बदलाव के लिए यह सक्रियता जरूरी है, क्योंकि व्यवस्था यथास्थितिवाद को पसंद करती है और निष्क्रियता जनादेश को नुकसान पहुंचा सकती है।
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इस संदर्भ में मोदी सरकार के प्रमुख कार्यक्रमों पर नजर डालना जरूरी है। मेक इन इंडिया, जिसके लिए व्यवसाय को आसान बनाना जरूरी है, स्वच्छ भारत, स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया, कुशल भारत, ग्राम ज्योति योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, श्यामा प्रसाद रूअर्बन मिशन, नमामि गंगे, आदर्श ग्राम योजना, उज्ज्वला योजना, उदय और अमृत-ये सब मोदी सरकार के प्रमुख कार्यक्रम हैं। जन-धन योजना और वित्तीय समावेशन को छोड़कर बाकी लगभग सभी योजनाएं केंद्र एवं राज्यों के बीच बहुस्तरीय निर्णय प्रक्रिया से संबद्ध हैं। आम तौर पर नीतियां केंद्र द्वारा तैयार की जाती हैं, राज्यों का इनमें बहुत कम दखल होता है। नीतियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्यों पर होती है, खराब कार्यान्वयन की स्थिति में केंद्र कुछ नहीं कर सकता। सुधार की जरूरत को कई आयोगों ने रेखांकित किया है, जैसे प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग, सरकारिया आयोग और द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग।
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सुधारों की जरूरत के मूल्यांकन के लिए स्मार्ट सिटी योजना पर विचार करते हैं। शहरीकरण विकास का वाहक है। यह भी सच है कि शहरी भारत पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, इसलिए यह विचार स्मार्ट है। हालांकि शासन की व्यवस्था स्मार्ट नहीं है। देश के शहर जल संकट से जूझ रहे हैं-लोग बोतलबंद पानी और टैंकर माफिया पर निर्भर हैं। मात्र एक तिहाई सीवेज और 20 फीसदी कचरे का निष्पादन होता है।
73वें और 74वें संशोधन पारित होने के दो दशक बाद भी पंचायत एवं नगरपालिका निकाय प्रभावहीन हैं। केंद्र उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुझाव दे सकता है, उनके बीच प्रतियोगित आयोजित कर सकता है और उन्हें अंतरराष्ट्रीय नगरों से जोड़ने में सक्षम बना सकता है। निर्वाचित निकायों के पास धन, कार्यात्मक शक्ति और कर्मचारियों का अभाव रहता है, क्योंकि नगरपालिका निकायों को नौकरशाही द्वारा नियंत्रित किया जाता है। राज्यों को स्थानीय निकायों की जरूरतों की होड़ से जूझना पड़ता है। दिवंगत विलासराव देशमुख कहा करते थे कि केंद्र सरकार राज्यों के साथ जैसा व्यवहार करती है, वैसा ही राज्य सरकारें स्थानीय निकायों के साथ करती हैं।
स्वच्छ भारत अभियान में भी यह संघर्ष दिखता है। यह अभियान सिर्फ शौचालय निर्माण को लेकर नहीं है, बल्कि भारत को स्वच्छ बनाने, कुपोषण तथा नवजात मृत्युदर जैसे स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। इसका अर्थ है स्वच्छता, जलापूर्ति, सीवेज और कचरा निष्पादन में निवेश। हाल में ओडिशा के पंचायत और महाराष्ट्र के नगरपालिका चुनाव में भाजपा ने प्रभावी जीत दर्ज की है। क्या कोई विजेता सहयोगी राज्य सरकारों के बिना वायदे पूरे कर सकता है?
अब मेक इन इंडिया को ही लीजिए। निवेशकों की सबसे बड़ी शिकायत है कि प्रक्रिया में काफी लंबा समय लगता है। इसका कारण है-लाइसेंस राज, जिसे 1991 में नरसिंहा राव ने खत्म कर दिया था, पर राजनीतिक पार्टियां और बाबूशाही ने इसे जिंदा रखा है। एक होटल प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए 120 और बिजली परियोजना के लिए 90 मंजूरी की जरूरत होती है। हैरानी नहीं कि वर्ल्ड बैंक की इज ऑफ डुइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत 130वें पायदान पर है। साफ है कि प्रमुख कार्यक्रमों की सफलता इस बात पर निर्भर है कि सरकार समवर्ती सूची को विकेंद्रित फॉर्म, फंड और राज्यों के कार्यों की उलझन को कैसे सुलझाती है। प्रधानमंत्री ने अक्सर टीम इंडिया के आइडिया-भारत को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगी प्रयास- का आह्वान किया है। इसका समाधान विकेंद्रीकरण है। एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने राज्यों के वर्चस्व को अतिक्रमित करने के लिए संविधान में संशोधन किए हैं। बदलाव की गति में बढ़ोतरी के लिए विकेंद्रीकरण जरूरी है और राज्यों को उनके विषय वापस लौटा देना चाहिए। इस कवायद की जटिलता को देखते हुए बहुमत की सरकार के लिए भी यह कठिन है। इसमें समय भी लगेगा।
यही कारण है कि राज्य सरकारों को सक्रिय करना जरूरी है। भाजपा सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए अपनी सरकारों को इशारा कर सकती है। मसलन, बिजली चोरी में कटौती करने, जिससे राज्यों को सालाना 90, 000 करोड़ रुपये की चपत लगती है, शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए तकनीकी को शामिल करने, सेवाओं की डिलिवरी में सुधार के लिए स्थानीय निकायों में कैडर बनाने, कई मंजूरियों की जरूरतों पर सवाल पूछने, श्रम कानूनों को नया स्वरूप देकर नकदी अर्थव्यवस्था के बजाय औपचारिक बनाकर श्रमिकों के लिए उसे आसान बनाना।
शासन के प्रतिस्पर्धी मॉडल तैयार कर उसका प्रदर्शन दिखाने के लिए भाजपा के पास मौका है। भाजपा को भारी जन समर्थन है। मतदाता अधैर्य हैं और बदलाव की गति में तेजी चाहते हैं।