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जरा हटके, जरा बचके, ये पब्लिक बचत है

Tue, 12 Feb 2019 06:31 PM IST
shankar aiyyar शंकर अय्यर
Updated Tue, 12 Feb 2019 06:31 PM IST
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it's a special public saving.
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सार्वजनिक बचत का वित्तीय और कानूनी परिदृश्य जटिल है। विभिन्न तरह के जमा के पांच नियामक हैं- एनएचबी, रिजर्व बैंक, सेबी, एमसीए और राज्य सरकारें। जिनमें तालमेल कायम करना एक चुनौती है।

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सार्वजनिक बचत का वित्तीय और कानूनी परिदृश्य जटिल है। विभिन्न तरह के जमा के पांच नियामक हैं- एनएचबी, रिजर्व बैंक, सेबी, एमसीए और राज्य सरकारें। जिनमें तालमेल कायम करना एक चुनौती है।


सुपर हिट फिल्म डॉन में, अमिताभ बच्चन हेलेन से कहते हैं, 'ये तुम जानती हो कि ये रिवाल्वर खाली है...मैं जानता हूं कि रिवाल्वर खाली है...लेकिन पुलिस नहीं जानती कि ये रिवाल्वर खाली है।' फिल्म का यह चर्चित संवाद नियामकों, नियमन और सार्वजनिक बचत के बीच के अंतर को सांकेतिक रूप में बखूबी प्रदर्शित करता है। इससे भी बदतर यह है कि जिसके बारे में पता है उस पर भी निरंतर पर्दा डाला जाता है। 

शुक्रवार को रिजर्व बैंक ने नियमों के उल्लंघन और अपने कर्जदार द्वारा फंड के उपयोग की निगरानी नहीं करने की वजह से भारतीय स्टेट बैंक पर एक करोड़ रुपये और कॉरपोरेशन बैंक तथा इलाहाबाद बैंक पर 3.5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है।

गौरतलब है कि 10 लाख रुपये के फंसे या बुरे कर्ज के बड़े हिस्से के बारे में पता नहीं है कि आखिर उसे कहां इस्तेमाल किया गया और इस कर्ज के एंड यूजर्स यानी कर्ज का लाभ उठाने वाले भी लापता हैं। स्टेट बैंक ने किसे कर्ज दिया और कितना कर्ज दिया? न तो स्टेट बैंक, जिसके पास 27 लाख करोड़ रुपये की सार्वजनिक संपत्ति है और न ही रिजर्व बैंक, जो कि 119 लाख करोड़ रुपये की जमा राशि का संरक्षक है, इन दोनों ने ही विस्तार से इसके बारे में बताना जरूरी नहीं समझा। नियामक कार्रवाई पर पड़ी धुंध की व्याख्या नहीं की जा सकती। 

इसका खुलासा करना क्यों महत्वपूर्ण है, यह आईएल ऐंड एफएस (इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंशियल सर्विसेज) की कहानी से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। 2014-15 के दौरान रिजर्व बैंक को पता था कि आईएल ऐंड एफएस की बैलेंस शीट (चिट्ठा) कर्ज के बोझ से दबी हुई है और उसने अपनी जांच रिपोर्ट में इसे दर्ज किया। आईएल ऐंड एफएस को चेतावनी से कोई फर्क नहीं पड़ा। दूसरी ओर रिजर्व बैंक ने भी इस मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाया और न ही बैंकों या आम लोगों के लिए किसी तरह की चेतावनी जारी की।

इस बीच, म्यूचुअल फंड निवेशक, एनबीएफसी के जमाकर्ता, बांड धारक और जमाकर्ता मजे और जोखिम दोनों में रहे। आईएल ऐंड एफसी की रेटिंग तब तक शीर्ष पर रही, जब तक कि वह दिवालिया नहीं हो गई। 2019 में आईएल ऐंड एफएस पर कंपनियों का 91,000 करोड़ रुपये के कर्ज का अनुमान है। 

इस महीने की शुरुआत में दो कॉरपोरेट घरानों एस्सल-जी समूह और रिलायंस एडीए समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर कारोबार के दौरान 30 फीसदी गिर गए थे। इसके बाद सुभाष चंद्रा ने शेयरधारकों को पत्र लिखकर दावा किया कि 'नकारात्मक ताकतें' उनके समूह को नुकसान पहुंचाना चाहती हैं। आरडीएजी ने वित्तीय कंपनियों पर गैरकानूनी तरीके से जानबूझकर कार्रवाई करने का आरोप लगाया। बेचने वालों का दावा था कि प्रतिभूत शेयरों पर ऋण देने की कठोर शर्तें लागू करने के कारण बिकवाली तेज हुई।

कुछ हफ्ते पहले आवासीय वित्तीय कंपनियों ने प्रतिरोधक कॉरपोरेट कार्रवाई की शिकायत की थी, जिसके कारण शेयर और बांड के दाम गिर गए। जहां तक वैधता का प्रश्न है, तो इसके लिए जांच का इंतजार है और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को अभी इस पर विचार करना है। हालांकि इस घटनाक्रम ने बाजार को किस चीज की जानकारी है या किसकी नहीं है, इन्हें लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ऋण बाजार को कारोबार और मूल्य निर्धारण को प्रभावित करने वाले ब्यौरों के बारे में तो पता है, लेकिन ऋण समझौता जो कि शेयर के मूल्य निर्धारण को प्रभावित करता है, उसकी जानकारी नहीं है। प्रमोटरों द्वारा गिरवी रखे गए शेयरों की संख्या की जानकारी तो पता है, लेकिन मू्ल्य तथा ऋण के ब्यौरे में पता नहीं, जिसके कारण बाजार में उथल-पुथल मचती है। इसका प्रभाव साधारण निवेशकों और म्यूचुअल फंड पर पड़ता है। 

पिछले महीने भारतीय जीवन बीमा निगम ने आईडीबीआई बैंक के अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी की। लेकिन अधिग्रहण के औसत मूल्य के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जो पता है, वह यह कि जीवन बीमा निगम ने 61.73 रुपये की दर से आईडीबीआई बैंक के 26 फीसदी शेयर खरीदे। पिछले हफ्ते इसके शेयर के दाम गिरकर 42 रुपये हो गए थे। एलआईसी, जो कि 'लाइिबलिटीज इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया' बन गया है, सरकारों के लिए संकट मोचक बन गया है और जिसने पिछले एक दशक में नाकाम विनिवेशों को उबारा है।

पहले उसने बीमार सार्वजनिक उपक्रमों के शेयर खरीदे और अब मरणासन्न संस्थाओं को जीवनदान दे रहा है। और यह सब बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) की जानकारी और उसकी मंजूरी से हो रहा है, यहां तक कि बीमा कंपनी ने एक बैंक का अधिग्रहण कर लिया, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। 

कहा गया कि एलआईसी में धन का प्रवाह और निवेश दीर्घकालीन होता है और उसे पिछले निवेशों से फायदा हुआ है। संभवतः यह सच हो। लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि उन्होंने यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया के बारे में भी ऐसा ही कहा था, लेकिन वह गलत साबित हुए। 

जीवन बीमा निगम की ऑडिट दस ऑडिटरों ने की, जिन्होंने वार्षिक रिपोर्ट में प्रमाणित किया कि, 'यह निगम किसी ट्रस्ट के ट्रस्टी की तरह काम नहीं कर सकता।' ऐसे में 29.62 लाख पॉलिसी धारकों के विश्वास और उनकी बचत का क्या होगा? जीवन बीमा निगम 2017-18 में सरकार का सबसे बड़ा ऋणदाता था और उसने केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी 1.09 लाख करोड़ और 1.51 लाख करोड़ रुपये के बांड खरीदे। उसके साथ कोई गड़बड़ी होती है, तो इसके आर्थिक और राजनीतिक दोनों तरह के दुष्परिणाम सामने आएंगे।
 
सार्वजनिक बचत का वित्तीय और कानूनी परिदृश्य जटिल है। विभिन्न तरह के जमा के पांच नियामक हैं- एनएचबी (नेशनल हाउसिंग बैंक), रिजर्व बैंक, सेबी, एमसीए (कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय) और राज्य सरकारें। लिहाजा जो जानकारियां पता हैं और जो पता नहीं हैं उनके बीच अंतर होना स्वाभाविक है, लेकिन जो पता है, उसे गलत तरीके से खत्म कर देने को जायज नहीं ठहराया जा सकता। 
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