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संयुक्त राष्ट्र में सुधार का माकूल वक्त, बता रहे हैं पूर्व विदेश सचिव शशांक

Sat, 26 Sep 2020 04:44 AM IST
शशांक पूर्व विदेश सचिव शशांक, पूर्व विदेश सचिव
शशांक, पूर्व विदेश सचिव Published by: शशांक पूर्व विदेश सचिव Updated Sat, 26 Sep 2020 04:44 AM IST
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it is the appropriate time for reform in the United Nations
यूएन - फोटो : twitter

संयुक्त राष्ट्र के 75 साल पूरे होने पर एक बार फिर व्यापक सुधार की मांग जोर पकड़ रही है और चीनी आक्रामकता पर अंकुश लगाने की मांग उठ रही है। इस अवसर पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये आम सभा को संबोधित करते हुए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि व्यापक सुधारों के बिना संयुक्त राष्ट्र विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि दुनिया को एक सुधारवादी बहुपक्षीय मंच की जरूरत है, जो आज की हकीकत को दर्शाए, सबको अपनी बात रखने का मौका दे और समकालीन चुनौतियों का समाधान कर मानव कल्याण पर ध्यान दे। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि 'चीनी वायरस' की महामारी को नियंत्रित करने में विफल रहने के लिए संयुक्त राष्ट्र को चीन को जिम्मेदार ठहराना चाहिए।


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इस वैश्विक मंच की मौजूदा चुनौतियों पर बात करने से पहले इसके इतिहास पर नजर डालना समीचीन होगा। द्वितीय विश्वयुद्ध का विध्वंसक रूप देखने के बाद भविष्य के युद्धों को रोकने तथा शांति की स्थापना के लिए 24 अक्तूबर, 1945 को इसकी स्थापना की गई थी। हालांकि इससे पहले लीग ऑफ नेशन्स का गठन किया गया था, जो कुछ वजहों से वह अप्रभावी हो गया। पहला तो यह कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने इसमें बड़ी पहल की थी, लेकिन उनको अपने ही देश में समर्थन नहीं मिला। दूसरा, उसमें छोटा देश हो या बड़ा देश हो, सभी सदस्य देशों की  बराबर साझेदारी थी। ऐसे में बड़े देशों को लगा कि छोटे देश हम पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रहे हैं। तीसरा यह कि द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया था, जिसके चलते लीग ऑफ नेशन्स का कोई लाभ ही नहीं मिला। 

फिर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई, तो यह प्रावधान किया गया कि इसमें कुछ स्थायी सदस्य देश होने चाहिए, जो कि विभिन्न मसलों पर निर्णय ले सकें और उनकी जिम्मेदारी रहेगी कि विश्व में शांति बनी रहे। संयुक्त राष्ट्र के गठन के समय कुछ उद्देश्य निर्धारित किए गए थे, जिनमें अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, मानवीय सहायता पहुंचाना, सतत विकास को बढ़ावा देना और अंतरराष्ट्रीय कानून को बनाए रखना शामिल हैं। इन सब उद्देश्यों को हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की कुछ संस्थाएं भी बनाई गईं। मसलन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र सैन्य आयोग, उपनिवेश विरोधी समिति (डी-कॉलोनाइजेशन कमेटी) इत्यादि। लेकिन अनेक मोर्चों पर संयुक्त राष्ट्र विफल रहा। भले ही कोई तीसरा विश्वयुद्ध नहीं हुआ, लेकिन छोटे-मोटे युद्ध तो हुए ही। लंबे समय तक इस पर शीतयुद्ध की छाया पड़ी रही। भारी संख्या में लोगों का विस्थापन हुआ और शरणार्थी समस्या बढ़ती चली गई। मानवाधिकार का बड़े पैमाने पर उल्लंघन होता रहा। यही नहीं, बच्चों और महिलाओं की ह्यूमन ट्रैफिकिंग भी होती रही और हथियारों की तस्करी भी बढ़ी। हाल के वर्षों में शरणार्थी की समस्या इतनी ज्यादा बढ़ी कि यूरोप के जो देश पहले मानवाधिकार संरक्षण की बात करते थे, वे भी पीछे हटने लगे।

इसी के साथ-साथ आतंकवाद भी तेजी से फैलता जा रहा है। आतंकवाद से भारत सबसे ज्यादा पीड़ित रहा है। 1971 के युद्ध में पराजय के बाद पाकिस्तान को जब समझ में आ गया कि युद्ध लड़कर वह भारत से नहीं जीत सकता, तो उसने आतंकवाद का सहारा लेकर भारत के खिलाफ छद्म युद्ध शुरू कर दिया। तब दुनिया के अन्य देश इस समस्या को नहीं पहचान पा रहे थे। जबसे अमेरिका में 9/11 की घटना हुई और बाकी यूरोप के देशों में भी आतंकी घटनाएं हुईं, तब दुनिया को इसकी गंभीरता का पता चला। फाइनेंसियल ऐक्शन टास्क फोर्स हालांकि सीधे संयुक्त राष्ट्र के अधीन नहीं है, पर संयुक्त राष्ट्र का भी उससे संबंध है। वह भी पाकिस्तान को काली सूची में अब तक नहीं डाल पाया है, जबकि पाकिस्तान आतंकियों को संरक्षण दे रहा है। अब कोविड-19 का कहर दुनिया भर में फैल गया है। 

संयुक्त राष्ट्र से जुड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) समय पर चेतावनी नहीं दे सका। ऐसा लगता है कि चीन के प्रभाव में उसने चेतावनी जारी करने में देरी की। अब यह संयुक्त राष्ट्र एवं डब्ल्यूएचओ के लिए बाध्यता हो गई है कि इसकी जांच की जाए कि वायरस की उत्पत्ति प्रयोगशाला में हुई थी या किसी जीव से, ताकि आगे ऐसी महामारी पर रोक लग सके। इसके अलावा जिस तरह से चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के तहत पड़ोसी देशों पर दबाव बनाना शुरू किया है, उस पर अंकुश लगाने की जरूरत है। भारत को भी वह चारों तरफ से घेरने की कोशिश कर रहा है और सीमा पर विवाद बढ़ा रहा है, ताकि भारत की प्रगति को रोक सके। यानी संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं के विफल होने से संयुक्त राष्ट्र आज साख के संकट से जूझ रहा है।

अब जबकि इस वैश्विक संस्था के 75 साल पूरे हो गए हैं, तो यह जरूरी-सा लगने लगा कि इसमें व्यापक स्तर पर सुधार हो और भारत जैसे जिम्मेदार देशों को प्रतिनिधित्व दिया जाए। वैसे भी जब संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ था, उस समय सदस्य देशों की संख्या मात्र 51 थी, जो अब बढ़कर 193 हो गई है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाना चाहिए और उसमें विकासशील एवं उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूरोप के ज्यादातर देश हैं, जबकि समस्याएं ज्यादातर गैर-यूरोपीय देशों में होती हैं। संयुक्त राष्ट्र के सैन्य मिशनों में भी पश्चिमी राष्ट्रों का प्रभुत्व देखने को मिलता है, इसे भी लोकतांत्रिक बनाए जाने की आवश्यकता है। आतंकवाद के खिलाफ प्रभावशाली कदम उठाए जाने चाहिए। पाकिस्तान को काली सूची में डालने की बात वर्षों से चल रही है, पर कुछ देशों की वजह से वह हो नहीं पा रहा है। और एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था तथा जिम्मेदार राष्ट्र होने के नाते भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थान मिलने से न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र की साख बढ़ेगी, बल्कि अन्य छोटे व कमजोर राष्ट्रों के साथ भी न्याय हो सकेगा। 

अमेरिका ने भी कहा है कि भारत को स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए। इस संदर्भ में भारत को अन्य देशों का भी समर्थन मिल रहा है। भारत का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार का अब वक्त आ गया है, क्योंकि दुनिया तेजी से विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ रही है। जाहिर है, इस वैश्विक मंच को मौजूदा चुनौतियों से निपटने और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए व्यापक और शीघ्र मंथन की जरूरत है।

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