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विदेशी व्यापार की शर्तों से सावधानी जरूरी
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निवेश
- फोटो : pixabay
मूल डेयरी के एमडी आर. एस. सोढ़ी द्वारा दी गई चेतावनी को व्यापक समर्थन मिल रहा है, जिसमें उन्होंने अमेरिकी व्यापारिक समझौतों में आयातित डेयरी उत्पाद में किसी भी तरह की छूट देने का विरोध किया है। भारत का डेयरी उद्योग प्रगति की ओर बढ़ रहा है, जिसमें शीघ्र ही लगभग 1.1 करोड़ लोगों को रोजगार देने की संभावना भी बनी हुई है।
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अमेरिका प्रतिवर्ष लगभग 2.8 करोड़ डॉलर की सब्सिडी अपने डेयरी उद्योग को देता है। ऐसे में भारत उनके डेयरी उत्पादों का मुकाबला कैसे कर सकेगा? भारत में डेयरी उत्पाद पर 30 से 60 प्रतिशत तक का आयात शुल्क लगता है, जबकि अमेरिका में 60-70 फीसदी तक आयात शुल्क लगता है। भारत ने इसका कभी विरोध नहीं किया।
दरअसल, अमेरिका मुक्त व्यापार अनुबंध (एफटीए) की नई शर्तों पर भारत व अन्य विकसित देशों के साथ व्यापारिक अनुबंध करने के प्रयास में है। इन समझौतों का असर वहां के राष्ट्रपति चुनाव पर भी होगा, ऐसा अमेरिकी सरकार का विश्वास है। राष्ट्रपति ट्रंप अपने भारत दौरे के दौरान भी भारत के साथ यह अनुबंध करने का संकेत दे चुके थे। लेकिन सरकार के कड़े एवं नकारात्मक रूख के कारण यह संभव नहीं हो पाया।
इससे पूर्व भारत आर.सी.ई.पी. समझौते से अलग होकर समूचे विश्व को संदेश दे चुका है कि अब भारत को अपने आर्थिक हितों की अनदेखी कर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है। प्रधानमंत्री ने इन देशों के शिखर सम्मेलन में स्वयं घोषणा की थी कि भारत यदि इस समझौते पर हस्ताक्षर करता है, तो देश में चीन के सस्ते कृषि और औद्योगिक उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी। भारत के कड़े रुख के कारण ही इस समझौते को अमल में नहीं लाया गया।
मुक्त व्यापार समझौते के चलते हमारे कई पुश्तैनी धंधे समाप्ति की ओर हंै। भारत ने थाईलैंड व इंडोनेशिया से एफटीए किया, जिसके बाद रबड़ आयात से केरल के किसान भारी घाटे में आ गए हैं। विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के बाद आयात इस कदर बढ़ा है कि देश के किसानों और कारोबारियों को काफी नुकसान पहुंचा है। कृषि निर्यात के बजाय आयात बढ़ रहा है। सुपारी, काली मिर्च, रबड़ के उत्पादक आयात की वजह से बर्बादी के कगार पर हैं।
दरअसल, लद्दाख में तनातनी और भारत द्वारा आर.सी.ई.पी. से अलग होने के बाद अमेरिका द्वारा एफटीए के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। अमेरिका के साथ व्यापार बातचीत में भारत के अगले प्रस्ताव में ऊंची कीमत के अमेरिकी कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कमी, चिकित्सा उपकरणों के लिए व्यापार मार्जिन नीति और अमेरिकी उत्पादों पर कीमत प्रतिबंधों को कम करने को लेकर बातचीत का वादा शामिल है।
विश्व व्यापार संगठन भारत समेत सभी विकासशील देशों पर प्रतिबंध लगाता है कि किसानों को सब्सिडी देने को अनुशासित करें। कई विकासशील देश इन धमकियों के चलते किसानों को सब्सिडी देना भी बंद कर चुके हैं। भारत में किसानों को वर्ष भर में बमुश्किल एक अरब डॉलर की सब्सिडी ही मिल पाती है, लेकिन संगठन का आग्रह है कि गरीब को सस्ता अनाज और किसानों को सस्ती बिजली, पानी और उर्वरक आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी घटाई जाए।
यही क्रम अगर जारी रहता है, तो भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी। बाहर के देश अपने किसानों को निर्यात के लिए भी भारी रियायत देते हैं, ताकि वे अपना माल सस्ती दरों पर भेज सकें। उनका घाटा, उनकी सरकारें वहन करती हैं, जबकि हम पर दबाव है कि हम अपनी खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालकर भी किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी कम कर दें।
कृषि को लेकर आज हम ऐसा कोई समझौता नहीं कर सकते, जो देश की कृषि व्यवस्था को चौपट कर दे। संक्रमण काल के संकट में सरकार की कई महत्वाकांक्षी योजना इसलिए अस्तित्व में आईंो, क्योंकि हमारे गोदाम अनाज से भरे हैं। व्यापार मंत्री पीयूष गोयल के वक्तव्य से यह विश्वास जरूर बना है कि आर.सी.ई.पी. की तरह भारत अपनी शर्तों पर ही समझौता करेगा। भारत में अन्न भंडारण को खत्म करना भी इनके एजेंडों में शामिल रहा है। जबकि हाल में ही अमेरिका में अगले 10 वर्षों तक कृषि सब्सिडी देने का प्रस्ताव संसद में पास हो चुका है। (लेखक जद(यू) के प्रधान महासचिव हैं।)