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मुद्दा: क्या परमाणु शस्त्रों से मुक्ति की राह खुलेगी, नोबेल शांति पुरस्कार से आशा और आह्वान
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शांति के लिए जापान के संगठन को मिला 2024 का नोबेल।
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अमर उजाला
विस्तार
निहॉन हिदायनको परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया की आवाज बनकर उभरा है। नोबेल शांति पुरस्कारों की लंबी रेस में एक दिन जापान की निहॉन हिदायनको यानी हिबाकुशा को यह सम्मान मिलेगा, इसका अंदाजा इसके संस्थापकों को भी नहीं था। अंतरराष्ट्रीय शांति ब्यूरो (आईपीबी) द्वारा नोबेल शांति पुरस्कार के लिए हिबाकुशा व प्रोफेसर जोसेफ रोटब्लैट को 1994 में नामांकित किया गया था। तब बात आई गई हो गई थी, लेकिन इस साल जब इस महान कार्य को सम्मान मिला, तो निस्संदेह हिबाकुशा को अपने किए गए अब तक के प्रयास पर संतोष हुआ होगा।
अब आज दुनिया में परमाणु हथियारों की होड़ सी लगी है। विश्व के नौ देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन, पाकिस्तान, भारत, इस्राइल और उत्तर कोरिया के पास परमाणु हथियार हैं। कुल मिलाकर, वैश्विक परमाणु भंडार 12,000 से अधिक हथियारों के करीब है। निहॉन हिदायनको परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया का हिमायती रहा है, जिसका अपने स्थापनाकाल से ही यह नारा रहा है कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल दोबारा कभी नहीं किया जाना चाहिए। अगस्त 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमलों में मानवीय और प्राकृतिक क्षति के साथ ही जो लोग बचे, वे निरंतर रेडियोधर्मी किरणों की चपेट में आकर मरते रहे। उस त्रासदी की यादें आज भी रूह कंपा देती हैं। उसी त्रासदी की उपज है हिबाकुशा। आज परमाणु शक्तियां अपने शस्त्रागारों का आधुनिकीकरण कर रही हैं। कई देश परमाणु हथियार हासिल करने की तैयारी कर रहे हैं। मौजूदा दौर में चल रहे युद्धों में परमाणु हथियारों का उपयोग करने की धमकियां दी जा रही हैं। आज मानव इतिहास के इस क्षण में हमें खुद को यह याद दिलाना जरूरी है कि परमाणु हथियार क्या हैं? दुनिया में अब तक देखे गए सबसे विनाशकारी हथियार के परिणाम क्या रहे हैं? ऐसे समय में हिबाकुशा की बुलंद आवाज कह रही है कि हिरोशिमा और नागासाकी जैसे हमले अब और नहीं। पृथ्वी, जलवायु और ब्रह्मांड यानी सबकी भलाई की खातिर सचमुच अब परमाणु हथियारों के खिलाफ आवाज उठाने का यह सही समय है।
यूक्रेन, रूस, इस्राइल व नाटो से जो परमाणु धमकियां मिल रही हैं, वे हलके में नहीं ली जानी चाहिए। इस साल मई महीने में हिबाकुशा ने साफ-साफ कहा था कि दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर धकेलकर मानवता के विनाश का खतरा मंडरा रहा है। जापान में परमाणु बम विस्फोटों ने कई लोगों की जान ले ली और हमारे शरीर, जीवन आदि पर इसका प्रभाव जारी है। परमाणु हथियारों के प्रयोग की त्रासदी, जिसका परिणाम अमानवीय निकला, कभी भी दोहराई नहीं जानी चाहिए।
हिबाकुशा चाहता है कि हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु हमले में जो लोग बच गए थे, उनका जीना भी मुश्किल हो गया था, ऐसी स्थिति अब दोबारा न आए। आज के परमाणु हथियारों में पहले से कहीं अधिक विनाशकारी शक्ति है। परमाणु युद्ध हमारी सभ्यता को नष्ट कर सकता है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने वास्तव में दुनिया को परमाणु निरस्त्रीकरण की तत्काल आवश्यकता की याद दिलाई है। 1945 के परमाणु बम हमलों के जवाब में, एक वैश्विक आंदोलन खड़ा हुआ हिबाकुशा, जिसके सदस्यों ने परमाणु हथियारों के उपयोग के विनाशकारी मानवीय परिणामों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किया, उसे नोबेल शांति पुरस्कार से प्रोत्साहित किया है। और एक तरह से विश्व को यह संदेश दिया है कि परमाणु हथियारों के उपयोग को नैतिक रूप से अस्वीकार्य कर दिया जाए।
‘परमाणु निषेध’ वैश्विक स्वीकृति बने। नोबेल समिति के इस सम्मान के मायने यह भी निकल रहे हैं कि जिन्होंने शारीरिक पीड़ा और दर्दनाक यादों के बावजूद, शांति के लिए आशा और प्रतिबद्धता पैदा करने के लिए अपने महंगे अनुभव का उपयोग करने का विकल्प चुना, वे सम्माननीय हैं और अब परमाणु हथियारों का उपयोग सुरक्षित पृथ्वी के लिए बिल्कुल जरूरी नहीं है। दुनिया को परमाणु निरस्त्रीकरण की तत्काल आवश्यकता है। यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने जब यह कहा कि यह सटीक समय है कि विश्व नेता भी, हिबाकुशा की ही तरह, स्पष्ट नजर रखें। परमाणु हथियारों को उनके असली रूप में ही देखें, जो मृत्यु उपकरण हैं, जो कोई सुरक्षा, संरक्षण या हिफाजत मुहैया नहीं कराते। पृथ्वी जब भी परमाणु मुक्त होगी, निश्चय ही भय की काली रात की जगह भोर का सूरज उगेगा और चहुंओर एक नया वातावरण देखने को मिलेगा, जो भी हो इस वर्ष के नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं ने यह बता दिया है कि उनकी मेहनत विश्व में प्रेरणा की कुंजी है। नोबेल समिति ने भी यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई संकल्प मानवीय होगा और उसके सतत प्रयास जन उद्धार व संसार के हित में होंगे, तो ऐसे मिशन का सम्मान एक दिन सभी करेंगे।