मुद्दा आतंकवाद है, कश्मीर नहीं
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राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत का इस तरह रद्द होना लगभग तय था। पाकिस्तान कश्मीर पर बात करने को अड़ा था, जबकि भारत तय मुद्दे यानी आतंकवाद पर बात करना चाहता था। बेशक हमारे पास एक मौका था, जहां हम पाकिस्तान को घेर सकते थे। मगर दो राय नहीं कि मौके बहुत आते रहते हैं। जरूरत सिद्धांत पर टिके रहने की है। इस मामले के ही दो पहलू थे। पहला, आप जिस देश में जाते हैं, उस देश की मान-मर्यादा और कूटनीति की परिधि का ध्यान रखना जरूरी है। यह नहीं होता कि आप किसी देश में जाएं, और उनकी इजाजत के बिना वहां ऐसे लोगों से मिलें, जो वहां की सरकार से बगावत करते हैं। अगर आज कश्मीरी अलगाववादियों से बातचीत की पाकिस्तान की मांग भारत स्वीकार कर लेता, तो कल यदि पाकिस्तान माओवादियों या खालिस्तानियों से मिलने की भी मांग करेगा, तो उस पर रोक कैसे लगेगी? आखिर एक सीमा तो तय होनी ही चाहिए। यह ठीक है कि पहले कश्मीरी अलगाववादियों से उनकी मुलाकात होती रही है, लेकिन यह गलत परंपरा रही है। इसे कूटनीति की मर्यादा का उल्लंघन कहना चाहिए।
दूसरा पहलू यह था कि उफा में जिन मुद्दों पर सहमति बनी थी, उसे दोनों देशों के विदेश सचिवों ने सार्वजनिक तौर पर साझा किया था। ऐसे में सिद्धांत का तकाजा यही है कि जब बातचीत का मौका आए, तो तय मुद्दों पर बात की जाए। मगर पाकिस्तान ने मुद्दे बदलने की कोशिश की। इसकी इजाजत भला कैसे दी जा सकती है? भारत सरकार की स्थिति साफ थी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का स्पष्ट कहना था कि सभी मुद्दों पर बात करने को भारत तैयार है, पर इस वक्त सिर्फ आतंकवाद पर ही बात होगी, क्योंकि उफा में यही तय किया गया था। यदि उफा में नवाज शरीफ की बातों का कोई मतलब नहीं है, तो फिर सरताज अजीज के भारत आने का भी भला क्या औचित्य? मुश्किल यह है कि पाकिस्तान न तो उन मुद्दों से सहमत होता दिखता है, जो पूर्व में दोनों देशों के बीच के समझोते से तय हुए हैं, और न ही वह उन संकेतों को समझता है, जो भारत उसे भेजता है। लिहाजा मेरा यही मानना है कि ऐसे मुल्क के साथ बातचीत का कोई औचित्य नहीं है।
यहां समझना यह भी होगा कि भारत ने कभी यह नहीं कहा कि वह वार्ता नहीं करेगा। हमारी सरकार का सिर्फ यही कहना था, कि बात सिर्फ उन्हीं मुद्दों पर होगी, जो दोनों देश के प्रधानमंत्री ने उफा में तय किए हैं। और अगर पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भारत आते हैं, तो हुर्रियत नेताओं से नहीं मिलेंगे। ये दोनों बातें पाकिस्तान को मान्य नहीं थीं, यानी बातचीत का सिलसिला पाकिस्तान ने तोड़ा। अलबत्ता विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह भी कहा था कि जब आतंकवाद पर बात होगी, तो आतंकवाद से जुड़े अन्य मुद्दों पर बात करने को भारत तैयार है। यह साफ संकेत था कि आतंकवाद के संदर्भ में अगर कश्मीर का मुद्दा उठता है, तो भारत उस पर बात करेगा। वह अलग से मुद्दा नहीं बनाया जाएगा। रही बात दाऊद इब्राहिम की या हाल ही में जिंदा पकड़े गए आतंकी नावेद के बहाने पाकिस्तान को घेरने की, तो सुषमा स्वराज ने यह भी साफ कर दिया कि दोनों पड़ोसी देश जब भी वार्ता की मेज पर बैठेंगे, तो बात वहीं से शुरू होगी, जहां से टूटी है। लिहाजा पाकिस्तान को घेरने के कई मौके आते रहेंगे। यह कैसे होगा अथवा कौन-सी रणनीति इसमें कारगर होगी, यह उस समय के हालात पर तय होंगे। इसे अभी नहीं आंका जा सकता। मगर हां, इस बीच हमें अन्य देशों के साथ मिलकर पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव जरूर बनाना चाहिए। यह दबाव संभवतः पाकिस्तान के रवैये को बदलने में कारगर हो सकता है।
वैसे देखा जाए, तो कुछ मुद्दे ऐसे भी होते हैं, जिनका समाधान नहीं निकलता। हमें तय यह करना होता है कि उसका प्रबंधन किस तरह किया जाए। ऐसे मामलों में जरूरी यह है कि उन समस्याओं के साथ किस तरह रहा जाए, या उन्हें किस तरह झेला जाए। भारत और पाकिस्तान की समस्या भी इसी तरह की है। इसका तुरंत हल नहीं निकल सकता। हालात बदलने पर संभव है कि इसका समाधान निकल आए। बस हमें अपनी स्थिति से किसी भी तरह का समझौता किए बिना हालात को संभालना होगा। कूटनीतिक पंडित यह भी कहते हैं कि एंडोरा, ट्राएस्टे और उत्तरी आयरलैंड का जिस तरह का समाधान हुआ, उसे इस मामले में भी अपनाया जा सकता है। मगर ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि इस तरह का समाधान काफी वर्षों की मशक्कत के बाद निकला है। एंडोरा का समाधान 800 वर्ष में सामने आया, जबकि उत्तरी आयरलैंड का 500 वर्ष में, और वह भी आधा-अधूरा। ट्राएस्टे में भी समाधान 700 वर्ष में निकला है। लिहाजा भारत-पाकिस्तान समस्या का चुटकी बजाते समाधान नहीं हो सकता। वार्ता से पीछे हटने से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की छवि को ही धक्का लगा है; भारत की छवि को नहीं।
इन तमाम घटनाक्रम में मीडिया की भी चर्चा स्वाभाविक है। हमारे देश का मीडिया वह काम करना चाहता है, जो उसका नहीं है। वह विदेश नीति बनाना चाहता है, सुरक्षा नीति तय करना चाहता है, कूटनीतिज्ञ बनना चाहता है, राजनीति करना चाहता है, मगर उसे समझना चाहिए कि ये उसके काम नहीं हैं। हालांकि यह बहस पूरी दुनिया में है कि 24 घंटे के मीडिया को किस तरह देखा जाए? इसका मतलब यह नहीं है कि मीडिया को नियंत्रित किया जाए। वैसे देखा जाए, तो अगर पूर्व की घटनाएं नहीं होतीं, तो मीडिया भी इस वार्ता का स्वागत ही करता।
बहरहाल, पाकिस्तान को समझना होगा कि भारत पर दोषारोपण करने के बजाय वह अपने गिरेबान में झांके। जब पिछले डेढ़ महीने में 90 से अधिक घुसपैठ की घटनाएं हो चुकी हों, जिंदा आतंकी पकड़ा गया हो, लगातार आतंकी घटनाएं हो रही हों, तो बात आतंकवाद पर होगी, न कि कश्मीर पर। कश्मीर जब मुद्दा बनेगा, तो उस पर बात होगी ही। मगर फिलहाल सवाल तो आतंकवाद का है।
-लेखक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के सीनियर फेलो हैं