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चंद्रयान: अंतरिक्ष में परचम लहराने की तैयारी, 140 तक पहुंची टेक्नोलॉजी स्पेस स्टार्ट-अप्स की संख्या

Fri, 14 Jul 2023 07:54 AM IST
ऋषभ मिश्र ऋषभ मिश्र
Updated Fri, 14 Jul 2023 07:54 AM IST
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सार
वर्ष 2014 से पहले भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़ा सिर्फ एक टेक्नोलॉजी स्पेस स्टार्ट-अप था, वहीं अब ऐसे स्टार्ट-अप की संख्या 140 तक पहुंच चुकी है।
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Isro Chandrayaan 3 moon lander mission India making history technology space start-ups increasing
चंद्रयान 3 - फोटो : SOCIAL MEDIA

विस्तार

एक जमाने में भारत को सपेरों का देश कहा जाता था, लेकिन अब भारत अंतरिक्ष की दुनिया में एक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी भूमिका को पूरी तरह से बदल दिया है। वर्ष 2014 से पहले जहां भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़ा सिर्फ एक टेक्नोलॉजी स्पेस स्टार्ट-अप था, वहीं अब ऐसे पंजीकृत स्टार्ट-अप की संख्या 140 तक पहुंच चुकी है। इसके अतिरिक्त भारत में ऐसी कंपनियों की संख्या 400 से ज्यादा हो गई है।



अभी अंतरिक्ष सेवाएं देने के मामले में भारत अमेरिका, चीन, जापान और ब्रिटेन के बाद पांचवें स्थान पर पहुंच चुका है। अभी पूरी दुनिया की स्पेस इकनॉमी लगभग 30 लाख करोड़ रुपये की है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी 57,431 करोड़ रुपये की है। लेकिन अगले पांच वर्षों में इसमें सालाना 48 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है, जिससे आगामी पांच वर्षों में भारत की स्पेस इकनॉमी चार लाख 10 हजार करोड़ रुपये की हो सकती है।


भारत के स्टार्ट-अप सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सैटेलाइट और रॉकेट इंजन भी अपने देश में विकसित कर रहे हैं। इनमें से कुछ स्टार्ट-अप ने अगले एक दशक में 30 हजार सैटेलाइट लॉन्च करने का लक्ष्य रखा है। अब ज्यादातर भारतीय स्टार्ट-अप 'इनोवेशन' पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। भारतीय स्टार्ट-अप अपनी खुद की रिसर्च (अनुसंधान) और अपने ही देश के काबिल इंजीनियरों के बल पर काम कर रहे हैं। पूरी दुनिया में सबसे काबिल और सस्ते इंजीनियर हमारे इन्हीं स्टार्ट-अप में काम कर रहे हैं। इसलिए दुनिया की बड़ी से बड़ी कंपनियां भारतीय स्टार्ट-अप में निवेश करने के लिए लाइन लगाकर खड़ी हैं।

पिछले एक साल में भारत के स्टार्ट-अप्स को एक हजार करोड़ रुपये का नया निवेश मिला है, और इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। इसका बड़ा कारण प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू किया गया वह कार्यक्रम है, जिसका मकसद अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनाना है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)  अंतरिक्ष में नए-नए कीर्तिमान लगातार स्थापित कर रहा है। 2014 से लेकर अब तक इसने 44 स्पेस क्रॉफ्ट मिशन और 42 लॉन्च व्हीकल मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है। अब अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी 'नासा' भी इसरो के साथ काम करना चाहती है।

चंद्रयान-3 पूरी तरह से 'मेड इन इंडिया' है। वर्ष 2019 में चंद्रयान-2 की विफलता के बाद यह भारत का तीसरा चंद्रयान मिशन है, जिसे आज आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया जाएगा। चंद्रयान-3 में भी उसी लॉन्चिंग व्हीकल का उपयोग किया गया है, जिसका चंद्रयान-2 में किया गया था। इस यान में कई वैज्ञानिक उपकरण हैं, जो चांद की सतह का अध्ययन करेंगे। इस साल मार्च में इस यान के जरूरी परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए गए थे। इसमें चांद पर लॉन्चिंग के दौरान आ सकने वाली संभावित परिस्थितियों का आकलन किया गया था।

चंद्रयान-3 में तीन मॉड्यूल क्रमशः प्रोपल्शन (प्रणोदन), लैंडर तथा रोवर हैं। 'प्रणोदन मॉड्यूल' में चांद की कक्षा से पृथ्वी के वर्णक्रमीय और ध्रुवीय माप का अध्ययन करने के लिए 'स्पेक्ट्रो पोलरिमेट्रिक ऑफ हैबिटेबल प्लेनेट अर्थ' (एसएचएपीई) नामक उपकरण है, और यह लैंडर तथा रोवर को चांद की कक्षा के 100 किलोमीटर तक ले जाएगा।

इसके अलावा प्रणोदन मॉड्यूल में वैल्यू एडिशन के रूप में एक वैज्ञानिक उपकरण भी है, जिसे लैंडर मॉड्यूल के अलग होने के बाद संचालित किया जाएगा। लैंडर चांद के निर्दिष्ट स्थल पर 'सॉफ्ट लैंडिंग' करने और रोवर को तैनात करने की क्षमता से लैस है, जो अपनी गतिशीलता के दौरान चांद का रासायनिक विश्लेषण करेगा। यदि इस बार चंद्रयान-3 का लैंडर चंद्रमा की सतह पर उतरने में सफल हो गया, तो भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद ऐसा कीर्तिमान रचने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा।

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