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ज्ञान के आदान-प्रदान में इस्लाम

Sun, 11 Oct 2015 07:40 PM IST
उदय प्रकाश अरोड़ा
उदय प्रकाश अरोड़ा Updated Sun, 11 Oct 2015 07:40 PM IST
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Islam in exchange of Wisdom

विभिन्न कारणों से मुसलमानों की आक्रामक ओर बर्बर छवि दुनिया भर में बन रही है। इस्लाम की इस छवि को तोड़ने की जरूरत है। यह तभी संभव है, जब इस्लाम का सही चेहरा लोगों तक पहुंचे। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने अपने विभिन्न भाषणों में इस्लाम की सूफी परंपरा में शामिल प्रेम और उदारता की भावना पर काफी जोर दिया। इस्लाम की सूफी परंपरा के बारे में तो लोगों को जानकारी है भी, पर यह सच्चाई कम लोग जानते हैं कि ज्ञान-विज्ञान के आदान-प्रदान में इस्लाम ने दुनिया को सबसे अधिक जोड़ा है।

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ज्ञान पर पश्चिम के वर्चस्व के कारण अंग्रेजी जैसे आज अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा है, उसी तरह आठवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से ग्यारहवीं शताब्दी के अंत तक वैश्विक संपर्क की भाषा अरबी थी। अरबी प्रभुत्व के उस युग में मानो खलीफा से साधारण नागरिक तक विद्यार्थी हो गया था। ज्ञान की जितनी प्यास नवीं-दसवीं शताब्दी के अरब संसार में थी, वह उससे पहले कभी नहीं देखी गई।

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उस बौद्धिक जागरण ने इस्लामी संसार में पुस्तक की संस्कृति को जन्म दिया। सुदूर इलाकों से लोग असंख्य भारी-भारी ग्रंथों को ऊंटों, खच्चरों और घोड़ों पर लादकर लौटने लगे। याकूबी लिखता है कि उसके समय (891 ई.) में अकेले बगदाद शहर में सौ पुस्तक विक्रेता थे। वे विक्रेता महज पुस्तकें नहीं बेचते थे, बल्कि ग्रंथों की नकल बनाते और सुलेखन कला के प्रशिक्षण केंद्र भी चलाते थे। पांडुलिपियों की नकल बनाकर उन्हें बेचने के काम में अनगिनत विद्यार्थी लगे थे। व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा पुस्तकों के संग्रह के आधार पर बनती थी। बगदाद के एक हकीम को जब बुखारा के सुलतान ने वहां रहने के लिए आमंत्रित किया, तो हकीम ने निमंत्रण केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उसे अपनी किताबें ढोने के लिए चार सौ ऊंटों की आवश्यकता थी। दसवीं शताब्दी में वजीर साहब-इब्न-उब्वाद के पास एक लाख से अधिक किताबें थी। तब इतनी किताबें यूरोप के सभी पुस्तकालयों को मिलाकर भी नहीं थीं। 1064 ई. में अकेले बगदाद में वैज्ञानिक ज्ञान के तीस बड़े शोध केंद्र थे। बगदाद के अलावा काहिरा, सिकंदरिया, येरूशलम, अलेप्पो, दमिश्क, मोसुल, तुस, निशपुर अरब संसार में विद्या के महत्वपूर्ण केंद्र थे।
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जब यूरोप के दूसरे देश अंधकार युग में थे, तब स्पेन में अरबों की उपस्थिति के कारण ज्ञान की रोशनी प्रकाशित हो रही थी। अरबों के पास प्राचीन यूनानी दार्शनिकों और वैज्ञानिकों की रचनाएं सुरक्षित थी। उनके माध्यम से यूनानी ज्ञान ने यूरोप में प्रवेश किया। न केवल यूनानी, बल्कि भारतीय और चीनी ज्ञान भी उनके माध्यम से यूरोप पहुंचा। अरबी से लैटिन में अनूदित विज्ञान ग्रंथों ने यूरोप में वैज्ञानिक ज्ञान की नींव डाली। तर्क और विवेक पर आधारित विज्ञान और दर्शन का अनमोल खजाना ईसाई चर्चों के अंधविश्वास और पाखंड के कारण दबा पड़ा था।

अरब वैज्ञानिक जाबिर को आधुनिक रसायन विज्ञान का जनक माना जाता है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अल-राजी की किताबें यूरोपीय विश्वविद्यालयों में आधार ज्ञान के रूप में कार्य करती रहीं। ‘अरबों का अरस्तू’ कहे जाने वाले इब्न सिना ने दर्शन शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, रसायन शास्त्र, भूगोल, भूगर्भ शास्त्र, तर्कशास्त्र, गणित, भौतिक विज्ञान, मनोविज्ञान, काव्य, संगीत आदि विषयों पर लगभग 450 ग्रंथ लिखे। अलजेबरा शब्द अरबी का है। प्रायः सभी पूर्वी देशों में ज्योतिष का ज्ञान पंडितों-पुरोहितों के हाथ में था। अरब लोगों ने उसे नक्षत्र विज्ञान के समीप लाकर विज्ञान के रूप में विकसित किया। सर्जरी को विज्ञान के रूप में विकसित करने का रेय कोरदोवा के अरबी चिकित्सक अल-जहरवी को जाता है। अबूबकर ने अंतरिक्ष के नक्षत्र मंडल और उनकी गति के संबंध में जो विचार प्रस्तुत किए, उन्हीं की सहायता से बाद में ब्रुनो, गैलीलियो और कोपरनिकस अपने युग परिवर्तनकारी अनुसंधानों को विकसित कर सके।


भारत और यूरोप को जोड़ने वाला प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र बगदाद नगर था। जब तक वह शहर खलीफाओं के संरक्षण में रहा, भारत का ज्ञान इसके माध्यम से सारे यूरोप में पहुंचता रहा। खलीफा हारूनर्रशीद के समय तो बगदाद का दरबार भारतीय विद्वानों की चहल- पहल से भरा रहता था, जो वहां मुख्यतः वैद्य के पदों पर आसीन थे। अरब विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए भारत भेजा जाता था। खलीफा ने पंडितों की सहायता से संस्कृत के दर्शन, वैद्यक, ज्योतिष, नक्षत्र विज्ञान और गणित के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद करवाया। अरब संसार से जब यह ज्ञान यूरोप पहुंचा, वहां लैटिन में उसका अनुवाद हुआ। भारतीय विद्या और विद्वानों के प्रति इस्लामी संसार में बड़ा सम्मान था। बसरे के एक निवासी जाहिज ने लिखा कि भारतीय ज्योतिष, गणित, चिकित्सा शास्त्र, दर्शन, साहित्य और नीतिशास्त्र में दुनिया में सबसे आगे हैं। दुखद यह है कि पश्चिम एशिया में विकसित जिस इस्लामी संस्कृति ने यूरोप को सभ्य बनाया, आज ठीक उसके विपरीत कट्टरपंथिरयों द्वारा इस्लाम के नाम पर उस इलाके से एक गलत संदेश दुनिया को दिया जा रहा है। आज जरूरत इसकी है कि सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों द्वारा मानव सभ्यता के इन दुश्मनों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी जाए और इस्लाम की सही तस्वीर दुनिया के सामने रखी जाए।

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