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क्या दलित इस देश के नागरिक नहीं

Sun, 24 Jul 2016 09:23 AM IST
उदित राज
उदित राज Updated Sun, 24 Jul 2016 09:23 AM IST
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Is Dalit not a citizen of this country
उदित राज

जब कभी दलित उत्पीड़न होता है, तब एक यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है कि उनके पक्ष में ज्यादातर दलित नेता ही क्यों बोलते हैं। दूसरे लोग भी कूदते हैं, लेकिन तब, जब निहितार्थ स्वार्थ हो। चुनाव के समय ऐसी कोई घटना घटती है, तो लगता है कि सभी दल दलितों के परम हितैषी हैं। वैसे तो दलितों का उत्पीड़न रोजमर्रा का काम है, पर कुछ वारदात ऐसी हो जाती है, जो सुर्खियां बन जाती हैं। गुजरात के ऊना में छह दलितों को इसलिए बेरहमी से पीटा गया, क्योंकि वे मरी हुई गाय की खाल लेकर जा रहे थे। हरियाणा के रोहतक विश्वविद्यालय से एमए कर रही एक दलित छात्रा का दूसरी बार बलात्कार उन्हीं लोगों ने किया, जिन्होंने 2013 में उससे भिवानी में बलात्कार किया था। उसकी गलती यही थी कि उसने दुष्कर्म की शिकायत पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई थी। उसके घरवालों पर शिकायत वापस लेने का लगातार दबाव बनाया गया। शिकायत वापस न लेने पर दोबारा उसके साथ वही घृणित कृत्य किया गया।

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इन घटनाओं का विरोध केवल दलित संगठनों ने किया, यह राष्ट्र के लिए चिंताजनक बात है। समाज के अन्य वर्गों की उदासीनता से यही लगता है कि शायद दलित इस देश के नागरिक नहीं हैं। जमाना तेजी से बदला है, ऐसे में, अन्य वर्गों की निष्क्रियता उठ खड़े हो रहे दलितों को क्या संदेश देगी, यह समझना मुश्किल नहीं है। हैरानी इस बात की है कि राष्ट्रभक्ति का नारा देते हुए न थकने वाले लोग भी चुप बैठे हैं। इन लोगों को लगता है कि भूभाग पर रहने वाले लोगों से ही राष्ट्रीयता बनती है, जबकि यह सतही समझ है। गाय की खाल उतारने या उनको मारने पर दलितों पर कहर बरपता रहता है। इससे कौन इन्कार करेगा कि पशु हत्या गलत है? लेकिन गाय को दलित से ज्यादा महत्वपूर्ण मानना कैसी मानवता है! जिन दलितों पर यह गुजर रही है, क्या वे मानसिक रूप से अन्य वर्गों के साथ गुजारा कर सकेंगे? गुजरात में गाय की खाल के लिए जिन लोगों ने दलितों को बेरहमी से पीटा, वास्तव में उन्होंने दलितों पर नहीं, राष्ट्र पर हमला किया। यूरोप और अमेरिका में कोई भी धर्म अपने विचार फैलाने के लिए स्वतंत्र हैं। वहां के बहुसंख्यक ईसाइयों को धर्मांतरण का डर नहीं होता। हमारे यहां कुछ लोग हमेशा डरे रहते हैं कि दलित दूसरे धर्म के प्रभाव में न आ जाएं। ऐसे लोग खुलकर क्यों नहीं बोलते कि जानवर से ज्यादा इंसान महत्वपूर्ण है?
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पिछले दिनों कानपुर देहात के मंगलपुर कस्बे में जब दलित समाज की महिलाएं मंदिर में पूजा करने पहुंचीं, तो पुजारिन ने दरवाजा बंद कर ताला जड़ दिया। बहुत अनुरोध करने पर किसी तरह उन महिलाओं को पूजा तो करने दिया गया, पर उसके बाद पुजारिन ने उनके सामने ही मंदिर को धो डाला। जैसे-जैसे दलित जाग्रत होंगे, वे मंदिर से खुद ही दूर हो जाएंगे, और संभव है कि किसी अन्य धर्म से जुड़ जाएं। राजस्थान के बीकानेर जिले के एक गांव बरजांगसर में दलितों से मृत जानवर जबरन उठवाए जाते हैं और उन्हें खाल निकालने के लिए मजबूर किया जाता है। यही नहीं, इन जानवरों को दलितों के इलाकों में इसलिए फिंकवाया जाता है, ताकि इनकी सड़ांध से दलितों को उनकी औकात महसूस होती रहे।
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दलित इस समाज का उत्पीड़न सहने के आदी हो गए हैं। उनकी तो कट जाएगी, पर उनका क्या होगा, जिन्हें समाज और राष्ट्र की चिंता रहती है? इन समस्याओं का समाधान तो समाज की संवेदनशीलता से ही संभव है।

लेखक भाजपा सांसद हैं

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