क्या कांग्रेस वाकई बदल रही है, एक मुद्दा हिंदी प्रदेश की राजनीति तय कर सकता है
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यह देखना आश्चर्यजनक है कि भारतीय राजनीति किस तेजी के साथ बेहतर बदलाव में परिवर्तित हो रही है। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में विपक्ष का प्रदर्शन चूंकि बहुत निराशाजनक नहीं रहा, ऐसे में, आने वाले चुनावों को पूरी तरह एकतरफा नहीं माना जा सकता। सरकार की नीतियों के खिलाफ कांग्रेस सड़कों पर प्रदर्शन करने जा रही है और पूरे विपक्ष को अपने साथ ले रही है। झारखंड में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में वह झारखंड मुक्ति मोर्चा के कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। विपक्ष बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा और दूसरे छोटे दलों को भी साथ लाने की कोशिश में है। झामुमो के अध्यक्ष हेमंत सोरेन को झारखंड में विपक्ष के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने में सोनिया गांधी को भी कोई परेशानी नहीं है। कांग्रेस और झामुमो सत्ता में आने पर भीड़ की हत्या के खिलाफ कानून बनाने की बात कर रहे हैं। झारखंड उन राज्यों में से है, जहां मॉब लिंचिंग की बहुत अधिक घटनाएं हुई हैं।
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कांग्रेस के नेता सच कहने में गुरेज नहीं कर रहे। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जो नपी-तुली बात कहने के लिए जाने जाते हैं, पिछले दिनों दिल्ली में एक अखबार के दफ्तर में थे। वहां उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार की नीतियों से लोग नाराज और हताश हैं। गहलोत ने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार के कुप्रबंधन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के लिए सड़कों पर उतरने का यह सही समय है। 'और जब आंदोलन की शुरुआत होगी, तब न्यायपालिका, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई में से जो भी दबाव के तहत काम कर रहे हैं, उनके काम का तरीका बदल जाएगा। जब मन बदलेगा, तब सड़कों पर आम आदमी का भी मन बदलेगा।...नौकरशाह और एजेंसियां समझेंगी कि किसी भी समय बदलाव हो सकता है।'
गहलोत की ये टिप्पणियां कांग्रेस के अंदर नई सोच के बारे में बताती हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा में हुए विधानसभा चुनावों में गांधी परिवार के बगैर भी कांग्रेस ने जिस तरह अच्छा प्रदर्शन किया, वह पार्टी की हाई कमान परिपाटी को मिला बड़ा धक्का है। सोनिया और प्रियंका गांधी ने इन दोनों ही चुनावों में प्रचार नहीं किया। राहुल गांधी ने हालांकि कुछ चुनावी सभाओं को संबोधित किया, पर उन्होंने जिन मुद्दों पर बात की, उनसे मतदाताओं को कोई लेना-देना नहीं था। ऐसा लगता है कि कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रप 10, जनपथ से निर्देश लिए बगैर नए तरीके अपना रहे हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इन दिनों क्षेत्रीय भावनाएं उभारने के काम में व्यस्त हैं। वह पूरे राज्य में घूम-घूमकर उन जातियों और उप-जातियों की शिनाख्त कर रहे हैं, जो मूल छत्तीसगढ़िया हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति, कैलेंडर और त्योहार उनके एजेंडे में सबसे ऊपर हैं। वह सोटा (चाबुक) को लोकप्रिय बनाने में जुटे हैं। वह कहते हैं कि पुराने दौर में छत्तीसगढ़ के लोग सोटा का प्रयोग किसी को पीटने के लिए नहीं करते थे, बल्कि इसका धार्मिक-आध्यात्मिक अर्थ में इसका इस्तेमाल होता था। बघेल के नजदीकी लोग आश्वस्त हैं कि उनका उप-राष्ट्रवाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पीछे छोड़ने में मददगार साबित होगा।
ऐसे ही, मध्य प्रदेश में कमलनाथ खुद को निवेशकों के हितैषी मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर रहे हैं। हाल ही में इंदौर में हुआ निवेशकों का एक सम्मेलन न केवल सफल रहा, बल्कि इस आयोजन ने कुछ बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों का भी ध्यान आकृष्ट किया। मध्य प्रदेश देश का अकेला राज्य भी है, जो स्वास्थ्य के अधिकार का कानून बनाने पर विचार कर रहा है। सत्ता में आने के एक लगभग एक साल में कमलनाथ राज्य कांग्रेस में व्याप्त क्षेत्रवाद से छुटकारा पाने में भी सफल हुए हैं। कमलनाथ के उत्थान और मुख्यमंत्री के तौर पर उनके ताकतवर बन जाने को भी कांग्रेस के दिल्ली दरबार ने चुपचाप देखा। वस्तुतः पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने शक्ति संतुलन से छेड़छाड़ किए बगैर हाई कमान पर निर्भर न रहने की इस प्रवृत्ति की शुरुआत की, जिसका कमलनाथ और अशोक गहलोत ने सफलतापूर्वक अनुसरण किया।
विपक्ष में यह राय बन रही है कि अगर झारखंड और दिल्ली में भाजपा को चुनौती दी गई, तो मोदी और भाजपा को रोका जाना असंभव नहीं होगा। हालांकि राजनीति में एक सप्ताह में भी चीजें बदल जाती हैं। राम मंदिर पर अदालती फैसला हिंदी प्रदेश में भविष्य की राजनीति तय कर सकता है। हालांकि अनुभव यह भी बताता है कि यह देश किसी एक मुद्दे से प्रभावित नहीं होता। अनुच्छेद 370 हटाने और आक्रामक राष्ट्रवाद ने महाराष्ट्र और हरियाणा में सत्तारूढ़ दल को लाभ नहीं पहुंचाया। बल्कि पश्चिम महाराष्ट्र में कुछ मराठा नेताओं के जीत के अंतर को देखते हुए भाजपा को सोचना चाहिए कि विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने का उसका वादा उसके लिए फायदेमंद हुआ या नुकसानदेह।
हालांकि दिल्ली में विपक्षी एकजुटता आसान नहीं है। कांग्रेस और आप में गठजोड़ की कोई संभावना नहीं है। आप जहां अपनी सत्ता बरकरार रखने के प्रति निश्चित है, वहीं भाजपा यह देख रही है कि कांग्रेस के पास आप का वोट काटने की कितनी क्षमता है। सुभाष चोपड़ा को दिल्ली का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस भाजपा का वोट काटने की उम्मीद कर रही है, जबकि मुस्लिम लोकसभा चुनाव के विपरीत कांग्रेस के बजाय आप को वोट देंगे।
आगामी 18 नवंबर से शुरू हो रहा संसद का शीत सत्र विपक्ष के लिए परीक्षा है। पिछले मानसून सत्र में तीन तलाक, मोटर वाहन कानून, अनु्च्छेद 370 की समाप्ति और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून के जरिये प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष को हाशिये पर ला दिया था। आगामी सत्र में सरकार विवादास्पद नागरिकता संशोधन विधेयक को फिर से ला सकती है। चूंकि अयोध्या मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी आना है, ऐसे में, विपक्ष के सामने अपनी रणनीति तय करने की बड़ी चुनौती है।