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अर्थव्यवस्था: ऐसे बनेंगे आर्थिक महाशक्ति, चीन से सबक हासिल कर सकता है भारत

Thu, 21 Sep 2023 07:32 AM IST
Santosh Mehrotra संतोष मेहरोत्रा
Updated Thu, 21 Sep 2023 07:32 AM IST
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सार
जीडीपी का 35 फीसदी निवेश और आठ फीसदी की विकास दर जरूरी है, क्योंकि जनसांख्यिकीय लाभांश 2030 के अंत तक ही मिलेगा।
 
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Investment, GDP, growth rate and demographic dividend in India
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

बीती सदी के आठवें दशक के प्रारंभ में भारत को जो जनसांख्यिकीय लाभांश मिलना शुरू हुआ था, वह 2030 के अंत तक समाप्त हो जाएगा। चीन का जनसांख्यिकीय लाभांश करीब एक दशक पहले ही खत्म हो गया था, पर उसने इसका पूरा लाभ उठाया और तीन दशकों तक जीडीपी में नौ से 10 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि की।



वर्ष 1980 तक भारत और चीन प्रति व्यक्ति आय के समान स्तर पर थे, पर अब, पीपीपी के मानक में चीन की प्रति व्यक्ति आय 18,000 डॉलर है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति आय 7,000 डॉलर ही है। ऐसे में, देश को ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जो यह सुनिश्चित करें कि जीडीपी लगातार कम से कम आठ फीसदी सालाना की दर से तब तक बढ़े, जब तक इसका लाभांश समाप्त न हो जाए, ताकि इसकी युवा आबादी के लिए पर्याप्त गैर-कृषि रोजगार पैदा हो सके। वर्ष 2004-14 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था आठ फीसदी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी, जबकि वर्ष 2008 में वैश्विक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था।


वर्ष 2004-05 और 2011-12 के दौरान अर्थव्यवस्था हर साल 75 लाख नई गैर-कृषि नौकरियां पैदा कर रही थी, इसीलिए युवा और कुल बेरोजगारी कम थी। इसने अभूतपूर्व पैमाने पर श्रमिकों को कृषि से बाहर निकाला, जो चीन और अब औद्योगिकीकृत देशों में पहले हुए संरचनात्मक परिवर्तन की एक विशेषता है। 2004 से 2014 के दौरान गैर-कृषि रोजगार सृजन से ग्रामीण श्रम बाजार में सख्ती आई, जिससे खुले बाजार में मजदूरी बढ़ी। गरीबी कम हुई और 14 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठे। पर 2013-2019 के बीच सृजित गैर-कृषि नौकरियों की संख्या 75 लाख सालाना से गिरकर 29 लाख रह गई। 2015 के बाद से कुल विनिर्माण नौकरियों में पूर्ण रूप से गिरावट आई। सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण का योगदान, जो 1992 से 2015 तक 17 फीसदी पर स्थिर था, उसके बाद 13 फीसदी तक गिर गया, हालांकि 2022-23 में यह फिर बढ़कर 17 फीसदी हो गया।

वर्ष 2014 से 2022 के बीच सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि धीमी होकर 5.7 फीसदी सालाना क्यों हो गई? इसका मुख्य कारण आर्थिक नीति प्रबंधन है। सबसे पहले सरकार ने 2016 में 86 फीसदी करेंसी का विमुद्रीकरण कर दिया। नकदी पर निर्भर अर्थव्यवस्था में इसने अधिकांश सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को संकट में डाल दिया। फिर जिस एमएसएमई क्षेत्र में सबसे अधिक गैर-कृषि नौकरियां उत्पन्न होती थीं, विमुद्रीकरण के छह महीने बाद उसे एक और झटका लगा, जब जीएसटी लागू किया गया, जिसमें 17 राज्यों के वैट और अन्य अप्रत्यक्ष कर शामिल हो गए। खराब योजना के कारण जीएसटी ने एमएसएमई को और अधिक नुकसान पहुंचाया।

नतीजतन, सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर करीब तीन वर्षों तक धीमी होकर चार फीसदी पर आ गई। मार्च, 2020 में जब देश में कोविड के 600 मामले थे, तब सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा की थी, जिसके कारण सभी आर्थिक गतिविधियां बंद हो गईं। उसने छह करोड़ श्रमिकों को शहरों से गांवों में भेज दिया, जिससे कृषि पर अत्यधिक बोझ पड़ा और उसका रोजगार में हिस्सा 42 फीसदी से बढ़कर 46 फीसदी हो गया। खुली बेरोजगारी तेजी से बढ़ी, जो 45 वर्षों में सबसे अधिक है।

जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा उठाने के लिए लाखों लोगों को कृषि से बाहर निकालने की जरूरत है। गैर-कृषि नौकरियों की जरूरत वाले युवाओं में लड़कियों पर फोकस करना चाहिए, जिन्होंने 2015 तक माध्यमिक शिक्षा में 80 फीसदी सकल नामांकन दर हासिल कर ली थी। फिर भी, हमारे यहां महिला श्रम शक्ति की भागीदारी सऊदी अरब के समान कम है। कुल मिलाकर, देश को हर साल कम से कम 1-1.2 करोड़ नई नौकरियों की जरूरत है।

भारत ने 2000-2012 में सालाना 75 लाख गैर-कृषि नौकरियां पैदा की हैं और फिर से ऐसा हो सकता है। पर इसके लिए सकल घरेलू उत्पाद में निवेश को 35 फीसदी तक बढ़ाने और विकास दर को आठ फीसदी तक ले जाने की जरूरत है। इन दोनों को कार्यान्वित करने के लिए भारत को चीन व प्रमुख पूर्वी एशियाई के समान एक विनिर्माण रणनीति की आवश्यकता है और उत्पादन में श्रम-गहन विनिर्माण की हिस्सेदारी बढ़ाने की जरूरत है। एमएसएमई पर भी नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

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