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प्लाज्मा डोनेशन की पेचीदगियां
Thu, 16 Jul 2020 11:02 AM IST
योगेश साहू
संजय वर्मा
संजय वर्मा
Published by: योगेश साहू
Updated Thu, 16 Jul 2020 11:02 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
भारतीय मिथकों में जाएं, तो वहां महर्षि दधीचि ने दानवों से संघर्ष में देवताओं को शक्ति प्रदान करने के उद्देश्य से शरीर को गलाकर वज्र बनाने के लिए अपनी हड्डियां दान दे दी थीं। महामारी काल में दिल्ली सरकार ने देश का पहला प्लाज्मा बैंक स्थापित कर कोविड-19 से ठीक हुए मरीजों से अपील की है कि वे अपना प्लाज्मा दान कर इसके मरीजों की जान बचाने में योगदान दें।
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खून की तरह प्लाज्मा की पूर्ति भी शीघ्र हो जाती है। लेकिन रक्तदान, नेत्रदान और अस्थिदान जैसे असंख्य आह्वानों का नतीजा देखें और दान में मिले रक्त की बर्बादी से लेकर खून और अंगदान के गिरोहों पर नजर दौड़ाएं, तो कहीं से नहीं लगता कि प्लाज्मा डोनेशन की सरकारी अपीलें रंग लाएंगी।
सरकारी दान-खातों में लोग पैसे से लेकर अपना खून या प्लाज्मा देने की अपीलों पर इसलिए ध्यान नहीं देते, क्योंकि उनसे हमारा परलोक सुधारने वाली आस्था का मकसद हल होते नहीं दिखता। दूसरे, अपारदर्शिता और रख-रखाव की ढीली व्यवस्थाओं के चलते सरकारी दानखातों की घपलेबाजियां देखकर लोगों का इससे मोहभंग ही हो चुका है।
तीन साल पहले चेतन कोठारी नामक शख्स की आरटीआई के जवाब में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (एनएसीओ) की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के आधार पर 2017 में तैयार एक रिपोर्ट बताती थी कि पूरे देश के ब्लड बैंकों ने पिछले पांच साल में जमा हुए इंसानी खून और उसके जरूरी अवयवों की 28 लाख यूनिटें रख-रखाव संबंधी लापरवाही के कारण बर्बाद कर दी थीं। इस बर्बादी में न केवल खून, बल्कि रेड ब्लड सेल्स और प्लाज्मा भी शामिल था।
इसी आरटीआई पर एनएसीओ के एक अन्य जवाब से यह भी पता चला था कि उस दौरान 17 महीनों में ही देश के अलग-अलग राज्यों में 2,234 लोग खून चढ़ाए जाने के बाद एचआईवी संक्रमण की गिरफ्त में आ गए थे, जिनमें से सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश के थे।
अस्थिदान में फर्जीवाड़े कम हैं, पर धार्मिक आस्थाओं में बंधा समाज इससे बाहर नहीं आ पाता कि अगर उनके प्रियजन के शव की हड्डियां ले ली गईं, तो अगले जन्म में उसे उन अस्थियों का अभाव यानी विकलांगता झेलनी पड़ सकती है। नतीजा यह है कि 1999 में एम्स में जिस बोन बैंक की शुरुआत की गई थी, उसे 2017 तक सिर्फ 24 मानव देहें दान में मिल सकीं थीं।
फर्जीवाड़ा एक बड़ी समस्या है, जो ब्लड-प्लाज्मा डोनेशन आदि के रास्ते में बड़ी मुश्किल पैदा करता है। इधर देश की राजधानी से ही खबरें मिली हैं कि कोरोना से बचाव की एंटी वायरल ड्रग रेमडेसिविर की एक शीशी के लिए तीमारदारों से 30 हजार रुपये या उससे भी ज्यादा वसूले जा रहे हैं, जबकि कीमत 5,400 रुपये है।
क्या गारंटी है कि प्लाज्मा को एक सटीक इलाज मान लेने पर इसकी भी कालाबाजारी नहीं बढ़ेगी? पड़ोसी देश पाकिस्तान में यह शुरू हो चुका है। वहां कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों को प्लाज्मा के बदले तीन लाख रुपये तक मिलने का बाजार काफी आकर्षक लग रहा है।
सवाल है कि सरकार क्या करे। अच्छी बात है कि दिल्ली सरकार ने कोविड-19 के मरीजों को प्लाज्मा मुहैया कराने में मदद के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर ऐंड बिलियरी साइंस अस्पताल में इसका बैंक स्थापित कर दिया है। खुशी की बात है कि भाजपा नेता संबित पात्रा ने कोरोना की चपेट में आने पर स्वस्थ होने के बाद गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अपना प्लाज्मा दान दिया।
पर ये उपाय और नजीरें तभी कारगर हैं, जब मौजूदा हालात को देखते हुए मामले को दान की स्वस्थ परंपरा के हवाले न किया जाए। इसका उपाय है कि सरकार कोविड अस्पतालों में सिर्फ बेड्स की व्यवस्था के पार जाकर वाजिब कीमत पर हरेक मरीज के अच्छे इलाज की व्यवस्था करे।
अगर किसी भी तीमारदार को रेमडेसिविर लाने के लिए अस्पताल से बाहर भेजा जाता है, तो इसे उस अस्पताल के आपराधिक कृत्य में शामिल किया जाए। इस अच्छे इलाज की कीमत ठीक हो चुके उन मरीजों से जरूर ली जाए, जो प्लाज्मा दान करने की सभी शर्तें पूरी करते हैं। आपातकालीन स्थितियों में लोगों को कोरोना-योद्धा बनाने का काम स्वेच्छा, सदिच्छा आदि से जुड़ी अपीलों पर नहीं छोड़ा जा सकता।