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अंतरराष्ट्रीय: प. एशिया में बदलता शक्ति संतुलन; नेतन्याहू के पास नया भूराजनीतिक आकार तैयार करने का दुर्लभ अवसर

Mon, 16 Jun 2025 05:40 AM IST
ज्योति भास्कर नताशा लिंडस्टेड, द कन्वर्सेशन
नताशा लिंडस्टेड, द कन्वर्सेशन Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 16 Jun 2025 05:40 AM IST
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सार
ईरान से चल रही अमेरिका की परमाणु वार्ता के किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ही इस्राइल का हमला पश्चिम एशिया में नए शक्ति संतुलन का संकेत है।
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International Geopolitics Changing power balance in West Asia Netanyahu has rare opportunity
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू - फोटो : एक्स@netanyahu

विस्तार

पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बदल रहा है। ईरान के परमाणु स्थलों पर हमले और ईरान के कम से कम दो वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों की हत्या के साथ बेंजामिन नेतन्याहू अकेले आगे बढ़ने और ट्रंप प्रशासन के दबाव को नजर अंदाज  करने की अपनी इच्छाशक्ति दिखा रहे हैं। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का कूटनीतिक हल चाहते थे, लेकिन ऐसा लगता है कि पहले से अच्छे संबंधों के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति नेतन्याहू को रोकने में असमर्थ थे।



हमलों का समय महत्वपूर्ण है। ट्रंप प्रशासन को संभवत: पता था कि वह इस्राइल को ईरान पर हमले करने से नहीं रोक सकता, लेकिन उसने सोचा कि वह इस्राइल पर दबाव डालकर तब तक हमला करने से रोक सकता है, जब तक कि वह ईरान के साथ नया परमाणु समझौता नहीं कर लेता। हवाई हमले से कुछ घंटों पहले ट्रंप ने कहा था, ‘मुझे लगता है कि ईरान के साथ कोई समझौता हो जाएगा, मैं नहीं चाहता कि इसमें कोई व्यवधान आए।’


अमेरिका का इस्राइल पर कितना असर है, इसको लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। जो बाइडन प्रशासन द्वारा महीनों तक की गई तैयारी के बाद ट्रंप जनवरी में इस्राइल और हमास में संघर्ष विराम कराने में सफल रहे। लेकिन वार्ता के एक हिस्से के रूप में नेतन्याहू वेस्ट बैंक में बसने वालों पर लगे प्रतिबंधों को हटाने में सफल रहे, जिससे उन्हें वहां कार्य करने की पूरी छूट मिल गई। इसके अलावा, अमेरिका ने इस्राइल को 2,000 पाउंड के बमों के हस्तांतरण पर लगी अपनी रोक भी हटा दी, जो इस्राइल के लिए एक और रियायत थी। 

अमेरिका गाजा में मानवीय संकट को रोकने में भी अक्षम साबित हुआ। वाशिंगटन इस्राइल द्वारा लेबनान पर हमले और ईरान समर्थित आतंकी संगठन हिजबुल्ला को खत्म करने के उसके प्रयासों को रोकने में भी शक्तिहीन दिखाई दिया। अमेरिका शक्तिशाली क्षेत्रीय नेता के बजाय एक दर्शक बनकर रह गया है। सूत्र से बताते हैं कि अक्तूबर 2024 में हिजबुल्ला नेता हसन नसरल्ला को मारने के लिए किए गए हवाई हमले से पहले भी इस्राइल ने वाशिंगटन को सूचना नहीं दी थी, जो अमेरिकी इजाजत के बिना कार्रवाई करने की इस्राइल की बढ़ती इच्छाशक्ति का संकेत है। वास्तव में, गाजा में चल रहे युद्ध का लेबनान तक विस्तार क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण क्षण था। हिजबुल्ला (जो उत्तरी इस्राइल की ओर रॉकेट दाग रहा था) को रोकने के लिए इस्राइल ने दक्षिणी बेरूत पर हवाई हमले किए, जिसमें हिजबुल्ला के कई उच्च पदाधिकारी मारे गए। इसके बाद अपने करिश्माई नेताओं के बिना युवाओं को भर्ती कर हिजबुल्ला खुद को फिर से उठ खड़ा करने में असमर्थ था और उसका संगठन बिखर गया। नवंबर, 2024 तक अमेरिकी मध्यस्थता में हिजबुल्ला संघर्ष विराम के लिए तैयार हो गया।

सैन्य और संगठनात्मक रूप से हिजबुल्ला का पतन ईरान की क्षेत्रीय शक्ति के लिए बड़ा झटका है। हिजबुल्ला एक समय दुनिया का सबसे ज्यादा हथियारों से युक्त गैर-सरकारी हिंसक संगठन था। उसके पास लगभग 50,000 लोगों की फौज और विभिन्न रेंज की दो लाख से ज्यादा रॉकेट व मिसाइलें थीं। इस्राइल के साथ छद्म युद्ध में हिजबुल्ला और हमास के कई शीर्ष नेताओं के मारे जाने के बाद ईरान काफी कमजोर पड़ गया। इसके अलावा, ईरान आर्थिक संकट से भी गुजर रहा है। दशकों से ईरान पश्चिम एशिया में रणनीतिक वर्चस्व हासिल करने की कोशिश कर रहा था। अमेरिका का अनुमान है कि ईरान ने 2012 से 2020 तक सीरिया में बशर अल-असद को सहारा देने के लिए 16 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए। असद के तख्तापलट के बाद सीरिया अब ईरान से हिजबुल्ला तक हथियारों की खेप या रसद पहुंचाने में सहयोग नहीं कर सकता। असद को हटाने वाले विभिन्न सशस्त्र लड़ाकों को तुर्किये के समर्थन के साथ अंकारा खुद को सीरियाई गृहयुद्ध के बाद बड़े विजेता के रूप में देखता है, न कि तेहरान। 

इधर, पश्चिम एशिया में घटते अमेरिकी प्रभाव और बढ़ते क्षेत्रीय तनाव की वजह से ट्रंप की खाड़ी देशों के साथ व्यापार बढ़ाने की योजना भी खटाई में पड़ सकती है। अमेरिका अपने राजदूत स्टीव विटकॉफ को ओमान भेजकर ईरान के साथ परमाणु समझौता करने का प्रयास कर रहा है, जिसके बदले वह ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को हटा लेगा, लेकिन वार्ता के किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ही अमेरिका इस्राइल को हमले करने से नहीं रोक पाया, जिसका उसे पहले से अंदेशा था। 

हालांकि, अमेरिका इस्राइल को हर साल 3.8 अरब डॉलर मूल्य के हथियारों की आपूर्ति करता है। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या घरेलू राजनीतिक दबाव में अमेरिका इस्राइल को फंडिंग रोक देगा। वहीं, नेतन्याहू के लिए यह पश्चिम एशिया को नया आकार देने और क्षेत्रीय शक्ति गतिशीलता बदलने का एक दुर्लभ अवसर है। ऐसा लगता है कि उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि अमेरिका या बाकी दुनिया उनकी इस कार्रवाई के बारे में क्या सोचती है।                      

(द कन्वर्सेशन से)

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