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पाकिस्तान अंदर से टूट रहा है

Tue, 08 Oct 2013 08:07 PM IST
कुलदीप तलवार
कुलदीप तलवार Updated Tue, 08 Oct 2013 08:07 PM IST
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internal problem of pakistan

पाकिस्तान इन दिनों सीमा पर भारत-विरोधी कार्रवाइयों के कारण चर्चा में है, और यह माना जा रहा है कि खुद नवाज शरीफ कश्मीर मामले को हवा देकर आतंकवादियों को उकसा रहे हैं। लेकिन उस मुल्क की आंतरिक स्थिति भी अच्छी नहीं।

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दहशतगर्दों ने केन्या की राजधानी नैरोबी में जिस दिन गैर-मुस्लिमों का चुन-चुनकर कत्ल किया था, उसी दिन पाकिस्तान के पेशावर में एक गिरिजाघर में आतंकवादियों ने करीब नब्बे निर्दोष ईसाइयों को मार डाला। उस हमले की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान ने कुबूल की, जिसकी जड़ अल कायदा से जुड़ी है। तालिबान ने वह हमला पाक में जारी अमेरिकी ड्रोन हमलों के विरोध में किया। इसी तरह नैरोबी हमले की जिम्मेदारी अल कायदा के करीबी संगठन ने ली है। उसने वह नरसंहार सोमालिया में केन्या के सैन्य हस्तक्षेप के विरोध में किया।
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इन हमलों से पता चलता है कि अल कायदा का जाल कितनी दूर तक फैला हुआ है। एशिया में अल कायदा का केंद्र पाकिस्तान है। ये दोनों हमले अल कायदा नेता जवाहिरी की अपील के कुछ दिन बाद ही हुए।
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पाकिस्तान में वैसे तो अल्पसंख्यकों पर हमेशा ही हमले होते रहे हैं, पर जियाउल हक के समय मुल्क का इस्लामीकरण हुआ और कट्टरपंथियों को पनपने देने में आईएसआई, फौज और खुद सरकार ने मदद की। उसी का नतीजा है कि वहां अल्पसंख्यकों, खास तौर पर ईसाइयों पर हमले तेज हो गए। पेशावर के चर्च में हुआ हमला पिछले सभी हमलों से बड़ा माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए साक्षात्कार में माना कि यह हमला शांति बहाली के लिए एक बड़ा धक्का है। गौरतलब है कि पाक प्रधानमंत्री तालिबान से हथियार डालने और संविधान का पालन करने की बात कहते रहे हैं, जबकि तालिबान ने इन शर्तों को नामंजूर कर दिया है। ऐसे में आतंकवाद को खत्म करने के लिए इस्लामाबाद के पास अब सैन्य कार्रवाई का ही विकल्प रह गया है, जिसके लिए सेनाध्यक्ष कयानी भी राजी बताए जाते हैं।

वहां ईसाइयों पर होते हमले की वजह है। असल में, कट्टरपंथियों को लगता है कि ईसाई अपने प्रगतिशील विचारों के जरिये उनकी लड़कियों और महिलाओं को बिगाड़ रहे हैं। कट्टरपंथियों का यह भी मानना है कि ईसाइयों का अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों में रह रहे ईसाइयों से गुप्त रिश्ता है।

इसीलिए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरे के लिए रवाना होने वाले थे, तब पेशावर में ईसाइयों को निशाना बनाया गया। पाकिस्तानी दहशतगर्द चाहते थे कि नवाज शरीफ जब अमेरिका पहुंचें, तब अमेरिकी ईसाई उनके खिलाफ प्रदर्शन करें। पाकिस्तान में लागू ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग भी इसका सबसे बड़ा कारण है। इसकी आड़ में निजी दुश्मनी के तहत ईसाइयों को निशाना बनाना आम है। विगत मार्च में कट्टरपंथियों ने लाहौर स्थित जोजफ कालोनी को आग लगाई थी। उन्होंने जो आरोप लगाए थे, वे बाद में झूठे साबित हुए।

पाकिस्तान की कोई भी सरकार ईशनिंदा कानून को खत्म करने या उसमें जरूरी संशोधन करने का साहस नहीं जुटा पाई है, जिससे ईसाइयों समेत दूसरे अल्पसंख्यकों पर ढाए जा रहे जुल्म बंद हों और झूठा आरोप लगाने वालों और झूठी गवाही देने वालों को सख्त सजा मिल सके।

पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी सरकार के अल्पसंख्यक विभाग के मंत्री शहबाज भट्टी इस कानून में संशोधन करने के पक्षधर थे, लेकिन कट्टरपंथियों ने इन दोनों को मौत के घाट उतार दिया। नवाज शरीफ सरकार इस कानून में संशोधन कर झूठी गवाही देने वालों को फांसी की सजा देने के हक में है, लेकिन कट्टरपंथी का एक धड़ा इसके विरोध में है।


पाकिस्तान में कट्टरपथियों की ताकत जिस तरह बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि सरकार इस काले कानून में संशोधन कर पाएगी। लेकिन मानवाधिकारों की रक्षा करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को नैरोबी और पेशावर जैसी दिल दहलाने वाली घटनाओं का नोटिस लेना चाहिए। नवाज शरीफ सरकार अगर वाकई इस दिशा में कुछ नहीं कर पाती, तो देश के भीतर और बाहर भी उनकी साख खत्म हो जाएगी।

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