फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Internal cleaning in SP

सपा में साफ-सफाई की तैयारी

Tue, 28 Oct 2014 12:14 AM IST
श्ाीतला सिंह
श्ाीतला सिंह Updated Tue, 28 Oct 2014 12:14 AM IST
विज्ञापन
Internal cleaning in SP

लखनऊ में थोड़े दिनों पहले आयोजित समाजवादी पार्टी के महाधिवेशन में मंत्री पद प्राप्त लोगों की आवश्यकता और उनके प्रति उपजे क्रोध के परिणामों से लोकसभा चुनाव प्रभावित होने और इनसे मुक्ति की चर्चा आरंभ हो गई थी। लोकसभा चुनाव के बाद ऐसे सत्ताईस लोगों को हटाया भी गया था, जिन पर अधिकृत उम्मीदवारों को हराने के प्रयत्न या पदों के दुरुपयोग का आरोप था। तब मात्र सत्ताईस लोगों के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल भी उठा था। अंततः मुख्यमंत्री अखिलेश ने बिना किसी शोर-शराबे के इन सभी को इनके पदों से बर्खास्त कर दिया है। अब केवल बारह सांविधानिक पदों पर ही लालबत्ती वाले लोग विद्यमान हैं।

विज्ञापन


दरअसल इन पदों के सृजन और नियुक्तियों से आम कार्यकर्ताओं में भेदभाव का ही संदेश गया और कार्यकर्ता इनसे जलते अधिक थे। पद दिए जाने का चलन तो पूर्ववर्ती सरकारों में भी था, लेकिन उसकी संख्या सीमित होती थी और पदाधिकारियों के कार्य और दायित्व भी निर्धारित होते थे। जबकि सपा सरकार में ऐसी नियुक्तियों से पार्टी और जनता में ईर्ष्या और विरोध की भावना अधिक फैली।
विज्ञापन


यह मुद्दा संसद और न्यायालय में उठा था कि मंत्रियों की कोई सीमा निर्धारित होनी चाहिए या नहीं या यह कार्य सरकार पर छोड़ देना चाहिए कि उसका मुख्यमंत्री जितना चाहे, पद बांट दे।
विज्ञापन
विज्ञापन


उत्तर प्रदेश में इसकी शुरुआत भाजपा द्वारा अपनी सरकार बनाने और उसे बचाने के लिए की गई थी, जब सहयोगी मायावती ने उससे समर्थन ले लिया था। लेकिन जब सूबे में दोबारा मुलायम सिंह की सरकार बनी, तो उसमें मंत्रियों की संख्या नब्बे तक पहुंच गई थी। तब यह मुद्दा उठा था कि इसे भ्रष्ट आचरण की परिभाषा में रखना चाहिए या नहीं, क्योंकि खाली धन देकर नहीं, पद देकर भी प्रभावित किया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने मंत्रियों की संख्या पर सुझाव दिया था कि यह सदन के सदस्यों के ग्यारह प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। पर अध्यक्ष और सलाहकार के नाम पर की गई नियुक्तियों पर फिर सवाल उठा कि इन्हें मंत्री या राज्यमंत्री के बराबर का पद देना संविधान के अनुरूप है या नहीं। यह प्रश्न उच्च न्यायालय में भी उठा था और न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से इस संबंध में जवाब मांगा था। अगले महीने इस पर सुनवाई होनी थी कि अखिलेश ने यह कदम उठा लिया।

इस कदम को सपा के भीतर की साफ-सफाई के रूप में देखना चाहिए। सपा के महाधिवेशन में नौंवी बार अध्यक्ष चुने गए मुलायम सिंह यादव को पदाधिकारियों और कार्यसमिति की नियुक्ति का अधिकार भी दे दिया गया, लेकिन मुख्य तत्व तो पार्टी की शक्ति और प्रभाव बढ़ाना है, जो नहीं दिखता। सपा का प्रभाव दूसरे राज्यों में बढ़ने के बजाय घटा ही है। महाराष्ट्र में उसे एक ही सीट पर संतोष करना पड़ा है।


महाधिवेशन में मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री के कार्यों की प्रशंसा और मत्रिमंडल के सदस्यों पर भ्रष्टाचरण का आरोप लगाकर यही जताया कि पार्टी को नए रूप में संयोजित करने का प्रयत्न हो रहा है। सरकार और नेतृत्व में कुछ बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है, जिससे यह संदेश जाए कि पार्टी किसी को माफ करने वाली नहीं और वह अपने वांछित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए संकल्पबद्ध है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed