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आकलन: नवाज और इमरान के बीच दिलचस्प हैं पाकिस्तान के सियासी समीकरण

Fri, 27 Oct 2023 07:45 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 27 Oct 2023 07:45 AM IST
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सार
इमरान से निपटने के लिए सेना नवाज शरीफ को ले तो आई, पर लाहौर में भीड़ ने उनका स्वागत नहीं किया। भ्रष्टाचार के मामलों के कारण नवाज शायद चुनाव लड़ भी न पाएं। वैसे में शहबाज की किस्मत खुल सकती है। सेना की मुश्किल यह भी है कि उसके पास इमरान की लोकप्रियता की कोई काट नहीं है।
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interesting political equations between Nawaz Sharif Imran Khan and challenges for Pakistan Army
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पंजाब में एक लोकप्रिय कहावत है-'लाहौर लाहौर ऐ'। उसके बाद 'जिन लाहौर नई वेख्या ओ जम्या नई' कहावत मशहूर है। लाहौरवासियों को खुद पर बहुत गर्व है और उन्हें लगता है कि पाकिस्तान का दूसरा कोई भी शहर लाहौर से बेहतर नहीं है। लेकिन यह सब बदल रहा है, जैसा कि हमने इस हफ्ते देखा, जब लाहौर के नागरिकों ने चार साल के स्वनिर्वासन से लौटने के बाद अपने शेर और निर्वासित नेता मियां नवाज शरीफ का स्वागत करने से इन्कार कर दिया। नतीजतन पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) को पंजाब के विभिन्न शहरों से आई भीड़ पर निर्भर रहना पड़ा।



लाहौर के लोग दशकों से पीएमएल-एन को वोट देते रहे हैं और यह प्रांतीय राजधानी शरीफ परिवार का मजबूत गढ़ रही है। लेकिन सबने देखा कि आम लाहौरी समर्थक गायब थे और शहर का कामकाज सामान्य ढंग से चल रहा था, जिसे इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि मीनार-ए पाकिस्तान मैदान पर क्या हो रहा है। पीएमएल-एन लाहौर शहर में इतनी अलोकप्रिय हो चुकी है कि उप-चुनाव में इमरान खान की पार्टी पीटीआई ने न केवल लाहौर की, बल्कि आसपास के निर्वाचन क्षेत्रों में भी हर सीट पर जीत दर्ज की। लाहौर के संभ्रांत लोग मजबूती से पीटीआई के खेमे में हैं। लगता है कि हम एक बार फिर 2018 में लौट रहे हैं, जब सुरक्षा प्रतिष्ठान ने एक नए चेहरे, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता इमरान खान को इस उम्मीद में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाया था कि उनके जरिये वह पाकिस्तान पर शासन कर सकता है। प्रत्यक्ष मार्शल लॉ अब पाकिस्तान के अंदर या बाहर लोकप्रिय या बर्दाश्त के काबिल नहीं है। इसके बजाय प्रधानमंत्री कार्यालय में अपनी कठपुतली बिठाकर उसके माध्यम से शासन चलाना आसान है।


लेकिन जैसे ही इमरान खान कुछ वर्षों के बाद व्यवस्थित हो गए, उन्होंने स्वयं को सेना से स्वतंत्र दिखाने की कोशिश की। सबसे पहले उन्होंने आईएसआई के महानिदेशक के पद पर अपने आदमी को नामित करना चाहा और सेना मुख्यालय में जनरलों को इधर-उधर करना चाहा, ताकि वह पाकिस्तान के सबसे कद्दावर व्यक्ति यानी सेना प्रमुख के पद पर अपने आदमी बिठा सकें। सुरक्षा प्रतिष्ठान इसे बर्दाश्त नहीं कर सका और पर्दे के पीछे से तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने संसद में इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करवाया, जहां संसदीय लोकतंत्र के संक्षिप्त इतिहास में पहली बार सदन के एक निर्वाचित नेता को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटा दिया गया। अब सुरक्षा प्रतिष्ठान अपनी दूसरी योजना (प्लान बी) पर काम कर रहा है। इस बार उसने अपने 'फौजी खिलौने' के तौर पर नवाज शरीफ को चुना है।  

हालांकि नवाज शरीफ अब भी अदालतों में सजा के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं और अभी उनका आरोपों से बरी होना बाकी है। वह इन दिनों जमानत पर हैं, पर सबसे शक्तिशाली लोगों ने उनका जीवन आसान बना दिया है। यहां तक कि भ्रष्टाचार के दो मामलों में दोषी ठहराए जाने के बावजूद उन्हें वीवीआईपी प्रोटोकॉल दिया गया है। एक सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने स्वास्थ्य कारणों से उन्हें निर्वासन में जाने की सुविधा दी, तो दूसरे सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने उनकी सहज वापसी की व्यवस्था की।

पर यह बिल्कुल साफ है कि चौथी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से पहले नवाज शरीफ को कई कानूनी बाधाओं को पार करना होगा। ये ज्यादातर उनकी योग्यता से संबंधित कानूनी मुद्दे हैं, जिसके कारण उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिल सकती, क्योंकि वह अब भी एक दोषी राजनेता हैं और इसकी कोई गारंटी नहीं है कि अदालतें उन्हें बरी कर देंगी। हाल ही में पाकिस्तान के पिछले प्रधान न्यायाधीश ने नवाज की सजा से संबंधित समीक्षा याचिका के लिए कोई मौका देने से पहले अपने आखिरी फैसले में इमरान खान का खुलकर समर्थन किया था।

नवाज शरीफ अब अपने चौथे कार्यकाल के लिए प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री के रूप में उनके भाई शहबाज शरीफ का कार्यकाल पूरी तरह से विनाशकारी था और उन्हें फिर से प्रधानमंत्री कार्यालय में वापस देखना दुःस्वप्न जैसा होगा। दरअसल शहबाज और उनकी आर्थिक टीम ने अर्थव्यवस्था को इतने खराब ढंग से संभाला कि पीएमएल-एन के मंत्री अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाने से डर रहे हैं, क्योंकि मतदाता गुस्से में हैं।

मगर फिर शहबाज शरीफ और नवाज शरीफ की बेटी मरियम शरीफ का क्या होगा, जिन्हें नवाज अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं? अफवाहें हैं कि पीएमएल-एन उन्हें पंजाब की मुख्यमंत्री के रूप में निर्वाचित कराने की कोशिश करेगी, ताकि वह पंजाब की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल कर सके। नवाज शरीफ द्वारा मरियम को अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में तैयार करने के बाद से ही शरीफ परिवार में फूट पड़ गई है। ऐसे में शहबाज शरीफ एवं उनके बेटे, जिनकी अपनी भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं और जिन्होंने अतीत में चुनाव जीता भी है, खुद को कहीं नहीं पाते।

अगर नवाज शरीफ को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया जाता है, तो शहबाज का भाग्य चमक सकता है, क्योंकि सुरक्षा प्रतिष्ठान मरियम शरीफ जैसे किसी बिन परखे चेहरे को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहेगा। वास्तव में यदि प्रधानमंत्री कार्यालय में किसी युवा और नए चेहरे को नियुक्त करना है, तो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रमुख बिलावल भुट्टो के पास अधिक अनुभव है, क्योंकि वह पिछली कैबिनेट में विदेश मंत्री थे। इसके अलावा वह अन्य राजनेताओं के मुकाबले अधिक लोकप्रिय और सम्मानित नेता हैं।

सुरक्षा प्रतिष्ठान इमरान खान को चुनाव से दूर रखने की जिस तरह कोशिश कर रहा है, वह पाकिस्तान में बहुत से लोगों को मंजूर नहीं। जेल में रहने के बावजूद इमरान खान की लोकप्रियता बरकरार है। निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव होने की स्थिति में उनके पास अब भी वापसी का मौका है। लेकिन यदि पीटीआई पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता और वह चुनावों में भाग लेती है, तो भी जेल के बाहर पार्टी के पास नेतृत्व करने लायक कोई चेहरा नहीं है। चुनाव से पहले सुरक्षा प्रतिष्ठान की बड़ी चुनौती यह है कि इमरान खान की लोकप्रियता से निपटने के लिए उसके पास कोई विकल्प नहीं है।
 

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