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संबंधों को रणनीतिक बनाने की जरूरत

Fri, 01 Aug 2014 10:10 PM IST
रहीस सिंह
रहीस सिंह Updated Fri, 01 Aug 2014 10:10 PM IST
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indo nepal relation

‘हम नेपाल की स्वतंत्रता को मान्यता प्रदान करते हैं और उसका भला चाहते हैं। लेकिन एक बच्चा भी यह जानता है कि भारत से गुजरे बिना कोई नेपाल नहीं पहुंच सकता। इसलिए अन्य किसी देश के नेपाल के साथ उतने घनिष्ठ संबंध नहीं हो सकते, जितने कि भारत के...।’

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यह बात जवाहरलाल नेहरू ने 1950 में भारतीय संसद में कही थी। तब से लेकर अब तक सामरिक परिदृश्य और चुनौतियां काफी बदल चुकी हैं। क्या ऐसे में उसी परंपरागत नीति पर चलना उचित रहेगा, जिसने दोनों के बीच गतिरोध पैदा कर दिया है या इसमें बदलाव की जरूरत होगी? पिछले दिनों विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नेपाल की यात्रा पर थीं, जिसका मूल मकसद नरेंद्र मोदी के नेपाल दौरे का रोडमैप तैयार करना था। इस दौरान दोनों देशों ने आपसी संबंध मजबूत करने के लिए कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया, जिसमें भारत और नेपाल शांति तथा मैत्री संधि की समीक्षा पर सहमति भी है।
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जिस संयुक्त आयोग की बैठक में ये निर्णय लिए गए हैं, उसका गठन 1987 में हुआ था और विदेश मंत्रियों के स्तर पर आधारित इस आयोग का उद्देश्य दोनों देशों के मध्य आपसी समझ और सहयोग बढ़ाने के उपाय तलाशना था। इस बार इसकी बैठक में पांच अलग-अलग समूहों में विचार-विमर्श हुआ। इनमें राजनीतिक, सुरक्षा और सीमा से जुड़े मुद्दे पर एक समूह, आर्थिक सहयोग और ढांचागत परियोजनाओं के बारे में दूसरे समूह, व्यापार और पारगमन पर तीसरे समूह, बिजली और जल संसाधन पर चौथे समूह तथा संस्कृति, शिक्षा और मीडिया पर पांचवें समूह में बातचीत हुई। इस सक्रियता के कारण भारत-नेपाल में सहयोग की रणनीतिक भूमिका के क्षेत्र में जो गतिरोध उत्पन्न हो गया था, उसे कुछ हद तक भरने की संभावनाएं दिखी हैं।
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अभी भारत-नेपाल द्विपक्षीय व्यापार 4.7 अरब डॉलर का है और नेपाल में होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारत का योगदान 17 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त 60 लाख नेपाली नागरिक भारत में रोजगार पाते हैं। पर रणनीतिक रूप से नेपाल भारत के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। नेपाल की 1,850 किलामीटर की लंबी खुली सीमा भारत के सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को स्पर्श करती है। अपनी इसी भौगोलिक स्थिति के कारण नेपाल भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट का कार्य करता है। नेपाल की इसी स्थिति का लाभ चीन और नेपाल के अंदर मौजूद कुछ राजनीतिक एवं नस्लीय समूह उठाने का प्रयास करते रहते हैं। इसका सबसे ज्यादा लाभ चीन ने उठाया और पाकिस्तान के अराजक तत्वों ने भी। चीन तिब्बत से नेपाल तक रेल संपर्क का विस्तार करने का निर्णय काफी पहले ले चुका है। सुषमा स्वराज की नेपाल यात्रा से एक दिन पहले चीन ने यह घोषणा की कि 2020 तक ल्हासा से लुंबिनी तक उसकी रेल शुरू हो जाएगी।


सवाल यह है कि जब नेपाल को चीन समर्थकों और माओवादियों द्वारा निशाना बनाया जा रहा हो, तब बीजिंग को वहां महत्व क्यों मिल रहा है। यह मसला केवल विकास का नहीं, कूटनीतिक क्षमता या अक्षमता का भी है। इसलिए अब नेपाल को दान देने या निवेश करने पर ही नहीं ठिठकना चाहिए, बल्कि रणनीतिक महत्व के क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। नेपाल में आईएसआई की मजबूत पैठ बन गई है। ऐसे में, जरूरत इस बात की है कि नेपाल की भारत के लिए रणनीतिक व सामरिक महत्ता का अध्ययन किया जाए, फिर उसके साथ रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश हो।

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