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दवा उद्योग: मरीजों को भी मिले दवाओं की लागत में कमी का लाभ, नवाचार की दरकार

Thu, 29 Jun 2023 05:55 AM IST
Jayantilal Bhandari जयंतीलाल भंडारी
Updated Thu, 29 Jun 2023 05:55 AM IST
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सार
देश में बड़े पैमाने पर दवा उत्पादन होने के कारण कई दवाओं की लागत में कमी आई है, जिसका लाभ मरीजों को भी मिले।
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Indian pharmaceutical sector need innovation indo-us agreement will boost pharma industry
pharmaceutical company

विस्तार

प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा के दौरान 23 जून को दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण करार हुए हैं, उनमें फॉर्मास्युटिकल आपूर्ति शृंखला और टीके के लिए कच्चे माल को लेकर जो सहमति बनी है, उससे भारत के दवा उद्योग को तेजी से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। इसी के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने इंडियन फॉर्मास्युटिकल अलायंस द्वारा आयोजित क्वालिटी फोरम में जानकारी दी कि दवा उद्योग के लिए स्व-नियामकीय संस्था बनाने की योजना है, जो निरंतर दवा उद्योग का आकलन करेगी। इसके बावजूद भारतीय दवाओं से संबंधित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर कई सुधार की जरूरत है। ग्राहकों के हितों के मद्देनजर गुणवत्ता और दवाई के मूल्य कम किए जाने के लिए अभी और अधिक ध्यान देने की जरूरत है।


गौरतलब है कि इस समय भारत दुनिया में फॉर्मा के नए हब के रूप में रेखांकित हो रहा है। जो भारतीय दवा उद्योग कोई पांच दशक पहले केवल विदेशी कंपनियों और ब्रांड पर निर्भर रहता था, वही अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जोरदार प्रतिस्पर्धा कर रहा है। नए आंकड़े बता रहे हैं कि देश में 3,000 से अधिक दवा कंपनियां हैं, 10,500 से अधिक क्रियाशील दवाई उत्पादक इकाइयां हैं तथा भारत 185 से अधिक देशों को दवाओं का निर्यात करता है। भारतीय दवा उद्योग उत्पादन के मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर है और दवाई के मूल्य के मामले में 14वें स्थान पर है।


यह भी कोई छोटी बात नहीं है कि इस समय विश्व की करीब 70 फीसदी जेनेरिक दवाओं का निर्माण भारत में होता है। जेनेरिक दवाओं की अफ्रीका की कुल मांग का 50 फीसदी, अमेरिका की मांग का 40 फीसदी तथा ब्रिटेन की कुल मांग का 25 फीसदी हिस्सा भारत से ही जाता है। दुनिया के कोई 50 फीसदी से अधिक विभिन्न टीकों का उत्पादन भी भारत में होता है। साथ ही प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआइ) योजना और विभिन्न देशों के साथ हो रहे मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की बदौलत फार्मा क्षेत्र का कारोबार वर्तमान 50 अरब डॉलर से छलांग लगाकर अगले दो वर्षों में 70 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

इस समय दुनिया के फॉर्मा सेक्टर में भारत के तेजी से आगे बढ़ने के कई कारण हैं। कोविड-19 और रूस-यूक्रेन युद्ध से दुनिया भर में जिस तरह दवा की आपूर्ति बाधित हुई है, उसका लाभ भारत को मिल रहा है। भारत में दवा उत्पादन की लागत अमेरिका एवं पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत कम है। यह भी महत्वपूर्ण है कि केंद्र सरकार ने दवाई उत्पादन में आत्मनिर्भरता लाने, अधिक कीमतों वाली दवाओं के स्थानीय विनिर्माण को प्रोत्साहन देने और चीन से आयातित कच्चे माल-एपीआई के भारत में ही उत्पादन हेतु कोई ढाई वर्ष पहले शुरू की गई पीएलआई स्कीम को बड़ी सफलता मिली है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि देश के कोने-कोने में जहां लोग बिक्री व्यवस्था और दवाओं के अधिक मूल्यों से परेशानी का सामना कर रहे हैं, वहीं कई भारतीय दवाइयां गुणवत्ता को लेकर घेरे में आ रही हैं। निश्चित रूप से अब देश में दवाओं की गुणवत्ता पर और अधिक ध्यान देना होगा।

अक्सर देखा गया है कि केमिस्ट या मेडिकल स्टोर ग्राहकों को 10, 15 या 20 टेबलेट या कैप्सूल वाली पूरी स्ट्रिप खरीदने पर जोर देते हैं। कई बार पैसे की कमी की वजह से कई गरीब दवाई उपभोक्ता एक साथ पूरी स्ट्रिप खरीदने में असमर्थ रहते हैं। हाल ही में एक देशव्यापी सर्वे में यह बात सामने आई है कि पूरी स्ट्रिप की खरीद के कारण बड़ी मात्रा में दवाइयां बिना उपयोग के फेंक दी जाती हैं। सर्वे में यह भी सामने आया कि लोगों ने पिछले तीन साल में खरीदी गई दवाओं में से 70 फीसदी दवाएं बिना उपयोग के फेंक दीं। इसके संबंध में उपभोक्ता मामलों के विभाग ने ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के अधिकारियों और फार्मा चिकित्सा उपकरण उद्योग के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। इस बैठक में दवाओं के लिए नई पैकेजिंग तकनीक खोजने की सिफारिश की गई है।

सरकार ने फैसला किया है कि अब से दवा की हर स्ट्रिप पर हर टेबलेट के पीछे मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ एक्सपायरी डेट भी लिखी होगी। अब देश में बड़े पैमाने पर दवा उत्पादन होने के कारण कई दवाओं की लागत में कमी आई है। ऐसे में दवाओं की कीमतों को और कम करने के बारे में भी विचार करने की जरूरत है।
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