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जानना जरूरी है: महर्षि भृगु ने त्रिदेव में किसे बताया श्रेष्ठ? ब्रह्मा, विष्णु एवं महादेव से जुड़ी है पौराणिक

Sun, 08 Jun 2025 08:43 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 08 Jun 2025 08:43 AM IST
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सार
ऋषि-मुनियों के कहने पर कौन-से भगवान श्रेष्ठ हैं, इसका पता करने के लिए महर्षि भृगु तीनों के पास पहुंचे। उन्होंने निष्कर्ष निकाला, ‘ब्रह्मा जी में रजोगुण, रुद्र में तमोगुण का आधिक्य है। केवल भगवान विष्णु शुद्ध सत्वमय हैं।’
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Indian Mythology Who did Maharishi Bhrigu consider best among Brahma Vishnu and Mahadev know
त्रिदेव में श्रेष्ठ कौन... महर्षि भृगु से जुड़ी कथा जानिए - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मंदराचल पर्वत पर यज्ञ चल रहा था, जिसमें अनेक ऋषि-मुनि पधारे थे। वहां एक प्रश्न उठा-ब्रह्मा, विष्णु और शिव में श्रेष्ठ कौन है? सब अपने-अपने तर्क देने लगे। कोई निष्कर्ष नहीं निकला, तो सबने महर्षि भृगु से कहा, ‘आप ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के पास जाइए और उनकी परीक्षा लीजिए।’  मुनिश्रेष्ठ भृगु सबसे पहले कैलाश पर्वत पर गए और भगवान शंकर के गणों से बोले, ‘मेरा नाम भृगु है और मैं महादेव का दर्शन करने आया हूं। आप भगवान शंकर को मेरे आने की सूचना दीजिए।’ यह सुनकर शिवगणों के स्वामी नंदी ने भृगु से कहा, ‘भगवान शंकर, देवी के साथ क्रीड़ाभवन में हैं। आप उनसे नहीं मिल सकते।’



भृगु कुपित हो गए और बोले, ‘भगवान शंकर तमोगुण से युक्त हैं और वे द्वार पर आए ब्राह्मण का सम्मान करना नहीं जानते। मैं शाप देता हूं कि उन्हें अर्पित किया हुआ अन्न, जल, फूल, हविष्य आदि सब कुछ अभक्ष्य हो जाएगा।’ शिव को शाप देकर भृगु ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा, देवताओं के साथ बैठे थे। भृगु ने ब्रह्मा को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके सामने खड़े रहे। किंतु ब्रह्मा ने भृगु का सत्कार नहीं किया। उनसे प्रिय वचन तक नहीं कहा। यह देखकर महर्षि भृगु ने ब्रह्मा से कहा, ‘आप महान रजोगुण से युक्त होकर मेरी अवहेलना कर रहे हैं, इसलिए आज से समस्त संसार के लिए आप अपूज्य हो जाएंगे।’


इसके बाद भृगु क्षीरसागर में श्रीविष्णु के लोक में गए। वहां महात्माओं ने भृगु का सत्कार किया और फिर भृगु भगवान के अंत:पुर में चले गए। 

उन्होंने शेषनाग की शय्या पर सोये हुए भगवान लक्ष्मीपति को देखा। लक्ष्मी जी भगवान की सेवा कर रही थीं। उन्हें देखकर भृगु अकारण कुपित हो उठे और उन्होंने भगवान के वक्षःस्थल पर अपने बाएं चरण से प्रहार किया। भगवान तुरंत उठ बैठे और बोले, ‘आज मैं धन्य हुआ!’ फिर वे महर्षि के चरण दबाते हुए बोले, ‘मुनिवर! मेरे शरीर पर आपके चरणों का स्पर्श होने से मेरा बड़ा मंगल होगा। ब्राह्मण की चरणधूलि मुझे सदा पवित्र करती रहे।’ फिर भगवान विष्णु ने दिव्य माला और चंदन से भृगु का पूजन किया। 

भृगु के नेत्रों में आनंद के आंसू भर आए। उन्होंने भगवान को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले, ‘श्रीहरि का कितना मनोहर रूप है, कैसी शांति है, कितनी दया है, कैसी निर्मल क्षमा और कितना पावन सत्वगुण है। भगवन! आप गुणों के समुद्र हैं। आप ही सबके हितैषी, शरणागतों के रक्षक और पुरुषोत्तम हैं। आपका चरणोदक पितरों, देवताओं और संपूर्ण ब्राह्मणों के लिए सेव्य है तथा यही पापों का नाशक और मुक्ति का दाता है। आप ब्राह्मणों के पूज्य और सत्वगुण से सम्पन्न हैं।’ प्रभो! संपूर्ण देवता और ऋषि आपकी माया से मोहित होने के कारण संपूर्ण लोकों के स्वामी आप परमात्मा को नहीं जानते। भगवन! संपूर्ण वेदों के विद्वान भी आपके तत्व को नहीं जानते। भगवन! मैं महर्षियों के कहने पर आपके पास आया हूं। आपके शील और गुणों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही मैंने आपकी छाती पर पैर रखा। हे गोविंद! कृपानिधे! मेरे इस अपराध को क्षमा करें।’

ऐसा कहकर महर्षि भृगु ने बारंबार भगवान के चरणों में प्रणाम किया और फिर वे प्रसन्नचित्त होकर यज्ञ में महर्षियों के पास लौट आए। महर्षियों ने भृगु को प्रणाम किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा की। इसके बाद भृगु ने महर्षियों को सब बातें बताईं। भृगु बोले, ‘ब्रह्मा जी में रजोगुण का आधिक्य है और रुद्र में तमोगुण का। इन्हीं गुणों के कारण ब्रह्मा और शिव से मेरी भेंट नहीं हो पाई। केवल भगवान विष्णु शुद्ध सत्वमय हैं। वे गुणों के सागर, नारायण, परब्रह्म तथा संपूर्ण ब्राह्मणों के देवता हैं। वे ही विप्रों के लिए पूजनीय हैं। उनके स्मरण मात्र से पापियों की मुक्ति हो जाती है। भगवान विष्णु को निवेदन किए हुए हविष्य का ही देवताओं के लिए हवन करें और वही पितरों को भी दें। वह सब अक्षय होता है।’ भृगु ने अंत में कहा, ‘अतः हे द्विजवरो! आप जीवनभर भगवान विष्णु का पूजन कीजिए। वे ही परम धाम हैं और वे ही सत्य ज्योति। श्रीविष्णु ही सब यज्ञों के भोक्ता परमेश्वर हैं और इसलिए मेरे विचार से त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु एवं महादेव में श्रीविष्णु ही श्रेष्ठ हैं।’

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