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जानना जरूरी है: वशिष्ठ-विश्वामित्र कैसे बने शत्रु? कालांतर में कठोर तप से ब्रह्मर्षि बने कौशिक

Sun, 24 Nov 2024 05:41 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 24 Nov 2024 05:41 AM IST
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सार
अनेक अपराधों के बावजूद वशिष्ठ हर बार विश्वामित्र को क्षमा करते गए। विश्वामित्र ने वशिष्ठ के पुत्रों तक का नाश कर दिया, फिर भी उनके मन में प्रतिशोध का भाव जागृत नहीं हुआ...
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Indian Mythology How did Vashishtha and Vishwamitra become enemies
जानना जरूरी है - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक बार गंधर्वराज चित्ररथ की अर्जुन से भेंट हुई, तो उन्होंने अर्जुन को वशिष्ठ की महिमा सुनाते हुए कहा, ‘वशिष्ठ ने अपनी तपस्या के बल पर काम और क्रोध पर विजय पाई थी। विश्वामित्र के अनेक अपराध करने पर भी वशिष्ठ के मन में क्रोध उत्पन्न नहीं हुआ और वह हर बार विश्वामित्र को क्षमा करते गए। विश्वामित्र ने वशिष्ठ के पुत्रों तक का नाश कर दिया, फिर भी वशिष्ठ के मन में प्रतिशोध का भाव जागृत नहीं हुआ। वह चाहते तो अपने पुत्रों को जीवित कर सकते थे, पर उन्होंने यमराज के नियमों का उल्लंघन नहीं किया। उन्होंने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया था, इसीलिए उनका नाम वशिष्ठ पड़ा।’



अर्जुन ने चित्ररथ से कहा, ‘वशिष्ठ और विश्वामित्र, दोनों सिद्ध तपस्वी थे, तो फिर दोनों शत्रु कैसे हो गए?’ अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में चित्ररथ ने कहा-‘प्राचीन समय में कान्यकुब्ज देश में गाधि नाम के एक बड़े यशस्वी राजा हुए। वह राजर्षि कुशिक के पुत्र थे। गाधि के पुत्र का नाम कौशिक था, जो राजकुल में जन्म लेने पर भी आगे चलकर महर्षि विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक बार राजा कौशिक शिकार खेलते हुए महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे। वशिष्ठ ने विधिपूर्वक उनका स्वागत-सत्कार किया और अपनी नंदिनी नामक गाय के प्रताप से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ आदि की व्यवस्था कर कौशिक को तृप्त कर दिया।


इस आतिथ्य से कौशिक बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने वशिष्ठ से कहा, ‘मैं क्षत्रिय हूं और आप ब्राह्मण। आप तपस्या-स्वाध्याय में लीन रहते हैं। आपको इस गाय की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है, किंतु मैं राजा हूं। यदि यह मेरे पास होगी, तो इसके माध्यम से राज्य और प्रजा, दोनों समृद्ध हो जाएंगे। अत: आप मुझसे एक अर्बुद गायें ले लीजिए, परंतु अपनी नंदिनी गाय मुझे दे दीजिए।’

वशिष्ठ बोले, ‘मैंने यह गाय देवता, अतिथि, पितर और यक्षों की सेवा के लिए रखी हुई है। मैं किसी भी मूल्य पर यह गाय आपको नहीं दे सकता।’

कौशिक ने तर्क दिया, ‘आप राजा की इच्छा का अनादर कर रहे हैं। यदि आप खुद मुझे यह गाय नहीं देंगे, तो मैं बलपूर्वक इसे ले जाऊंगा।’ इस पर महर्षि वशिष्ठ ने कहा, ‘आप बलवान क्षत्रिय हैं, जो चाहे कर सकते हैं। फिर सोच-विचार कैसा?’ यह सुनकर कौशिक ने नंदिनी को जबर्दस्ती ले जाने का प्रयास किया, तो वह डकराती हुई वशिष्ठ के पास आकर खड़ी हो गई और बोली, ‘ऋषिवर! राजा के सैनिक मुझे चाबुक और डंडों से पीट रहे हैं, मैं अनाथ की तरह डकरा रही हूं। आप मेरी सहायता क्यों नहीं करते?’ नंदिनी का करुण-क्रंदन सुनकर वशिष्ठ क्षुब्ध नहीं हुए। वह बोले, ‘क्षत्रियों का बल तेज है और ब्राह्मणों का बल क्षमा। मैं केवल क्षमा करना जानता हूं। परंतु मैंने तुम्हारा त्याग नहीं किया है। यदि तुझमें शक्ति है, तो तू स्वयं राजा का सामना कर।’

नंदिनी बोली, ‘यदि आपने मुझे नहीं छोड़ा है, तो मुझे बलपूर्वक कोई नहीं ले जा सकता।’ यह कहकर नंदिनी ने सिर ऊपर उठा लिया। उसकी आंखें लाल हो गईं। उसका भीषण रूप देखकर कौशिक के सैनिक इधर-उधर भागने लगे। उन्होंने जब फिर से नंदिनी को ले जाने की चेष्टा की, तो वह सूर्य के समान चमकने लगी। उसके रोम-रोम से मानो अंगारों की वर्षा होने लगी। उसके प्रत्येक अंग से सहस्रों योद्धा प्रकट हो गए और अस्त्र-शस्त्र लेकर कौशिक की सेना पर टूट पड़े। आश्रम में भगदड़ मच गई। शीघ्र ही कौशिक की सेना भाग खड़ी हुई। यह दृश्य देखकर कौशिक को आश्चर्य हुआ। उन्हें अपने क्षत्रिय-भाव पर बड़ी ग्लानि हुई। वह बोले, ‘क्षत्रिय बल को धिक्कार है। वास्तव में ब्रह्मतेज का बल ही सच्चा बल है।’ कौशिक ने अपना विशाल राज्य, लक्ष्मी तथा समस्त सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया और तपस्या करने चले गए। कालांतर में कौशिक ने कठोर तप करके राजर्षि, महर्षि और अंत में ब्रह्मर्षि की उपाधि प्राप्त की और विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस बीच विश्वामित्र कई बार वशिष्ठ से पराजित हुए। यही कारण था कि वशिष्ठ और विश्वामित्र का परस्पर वैर हो गया।

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