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अर्थव्यवस्था: रिजर्व बैंक का साहसिक कदम और मुद्रास्फीति नियंत्रण की नई राह
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भारतीय रिजर्व बैंक
- फोटो :
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विस्तार
पिछले एक वर्ष से भी अधिक समय से पूरे विश्व में लगभग सभी देश लगातार बढ़ती मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ब्याज दरों में वृद्धि करते जा रहे हैं। हाल ही में अमेरिका ने यूएस फेड दर में 25 आधार अंकों की एवं ब्रिटेन ने केंद्रीय ब्याज दर में 50 आधार अंकों की वृद्धि की है। यही स्थिति लगभग सभी विकसित देशों की है। इन देशों में हालांकि ब्याज दरों में लगातार वृद्धि करने से मुद्रास्फीति पूर्णतः नियंत्रण में आती दिखाई नहीं दे रही है। विकसित देश, यदि ब्याज दरों में वृद्धि करते हैं, तो अन्य देशों को अपनी मुद्रा के बाजार मूल्य को बचाने के उद्देश्य से ब्याज दरों में वृद्धि करना मजबूरी बन जाता है।
परंतु, छह अप्रैल को संपन्न हुई भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रेपो दर में वृद्धि नहीं करने का निर्णय लिया गया है। वैश्विक स्तर पर चल रही आर्थिक परिस्थितियों के बीच इसे एक साहसिक निर्णय कहा जा सकता है। अब संभावना व्यक्त की जा रही है कि अन्य देश भी (विकसित देशों सहित) रिजर्व बैंक के इस निर्णय का अनुसरण कर सकते हैं। एक तरह से भारत ने इस संदर्भ में अन्य देशों को राह ही दिखाई है।
दरअसल, मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए विकसित देशों द्वारा ब्याज दरों में लगातार वृद्धि करते जाना, अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों को विपरीत रूप से प्रभावित करता नजर आ रहा है, जबकि इससे मुद्रास्फीति पर नियंत्रण होता दिखाई नहीं दे रहा है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में अब पुराने सिद्धांत भोथरे साबित हो रहे हैं। और फिर, केवल मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ब्याज दरों में लगातार वृद्धि करते जाना, ताकि बाजार में वस्तुओं की मांग कम हो, एक नकारात्मक निर्णय है। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए मांग में कमी लाकर उत्पादन कम करने जैसे निर्णयों के स्थान पर आपूर्ति को बढ़ाए जाने जैसे सकारात्मक प्रयास किए जाने चाहिए। इससे उत्पादन बढ़ेगा, विकास की गति तेज होगी एवं रोजगार के और अधिक नए अवसर निर्मित होंगे।
केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक को निर्देश दिए हैं कि भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर चार प्रतिशत रहनी चाहिए। कोरोना महामारी के बाद एवं रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर सात प्रतिशत से अधिक हो गई थी। अतः रिजर्व बैंक ने रेपो दर में पिछले एक वर्ष के दौरान 250 आधार अंकों की वृद्धि करते हुए इसे 6.50 प्रतिशत पर पहुंचा दिया। ऐसे निर्णयों के कारण भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर अब घटती भी जा रही है। रिजर्व बैंक के अनुमान के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर घटकर 5.2 प्रतिशत हो जाएगी। जबकि थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर फरवरी 2023 माह में घटकर 3.85 प्रतिशत तक नीचे आ चुकी है।
दूसरे, भारत में ब्याज दरों को बढ़ने से रोकना इसलिए भी जरूरी है कि पिछले कुछ समय से आर्थिक गतिविधियों में आ रही तेजी के चलते बैंकों से ऋण सुविधाओं का उपयोग बहुत बढ़ रहा है। ब्याज दरों में वृद्धि होने से ऋण की लागत भी बढ़ती है, जो अंततः उत्पादन की लागत को भी विपरीत रूप से प्रभावित करती है। तीसरे, भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय बाजार में अब मजबूत हो रहा है। विकसित देशों द्वारा, विशेष रूप से अमेरिका द्वारा ब्याज दरों में की जा रही वृद्धि के चलते कुछ समय पूर्व तक भारतीय रुपये पर अमेरिकी डॉलर की तुलना में दबाव दिखाई दे रहा था।
अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपये का मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में 83 रुपये प्रति डॉलर को भी पार कर गया था, परंतु छह अप्रैल को यह सुधरकर 81.90 रुपये प्रति डॉलर हो गया है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 10 मार्च, 2023 के स्तर 56,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 24 मार्च, 2023 को 57,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। इस प्रकार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है। अतः अब भारत को अमेरिकी ब्याज दरों का अनुसरण करने की जरूरत नहीं है।