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अर्थव्यवस्था: निवेशकों को वित्तीय साधनों के जोखिम के बारे में जानकारी जरूरी, अब गेंद रिजर्व बैंक के पाले में..
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भारतीय रिज़र्व बैंक (सांकेतिक तस्वीर)
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अमर उजाला
विस्तार
हालांकि इस वर्ष की पहली छमाही में महंगाई में कमी के संकेत दिखे थे, लेकिन लगता है कि अब इसने गियर बदल लिया है और इसमें वृद्धि होने लगी है। अक्तूबर के महीने में थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति में वृद्धि खाद्य मुद्रास्फीति के कारण हुई। शेयर बाजार लंबे समय से उच्च स्तर पर चल रहा था। बाजार में बेहद जरूरी सुधार, जो कि अब हो रहा है, की भविष्यवाणी कई विश्लेषकों ने की थी। हालांकि ऐसे में स्थिर मुद्रास्फीति सुधार की प्रक्रिया को तेज करेगी और बाजार में तेजी से सुधार होगा। इस सुधार में वैश्विक कारक भी शामिल हैं। साथ ही कॉरपोरेट बैलेंस शीट पर कमाई का दबाव इस तथ्य को भी दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था में मांग सामान्य अपेक्षा से भी कम है, जबकि अर्थव्यवस्था हाल के वर्षों में सालाना छह प्रतिशत से
कम दर से नहीं बढ़ रही है। मुद्रास्फीति प्रबंधन के लिए खाद्य और गैर-खाद्य मुद्रास्फीति से निपटने के तरीके के बारे में चर्चा चल रही है। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने प्रस्ताव दिया है कि जब रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्वारा ब्याज दर तय की जाती है, तो खाद्य मुद्रास्फीति को उससे बाहर रखा जाना चाहिए। तर्क यह है कि खाद्य मुद्रास्फीति मांग-आपूर्ति प्रबंधन पर निर्भर है। इस प्रकार, ब्याज दर में बदलाव का खाद्य मुद्रास्फीति पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ सकता है।
समिति पर विकास को समर्थन देने के लिए ब्याज दर कम करने का भी दबाव है। एमपीसी के समक्ष ब्याज दरों को कम करने की मांग बढ़ रही है, ताकि फंड की लागत सस्ती हो जाए और निवेश व विकास को बढ़ावा देने में मदद मिले। हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री ने कहा है कि महंगाई को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि मांग और आपूर्ति का मुद्दा है। जबकि, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए बैंकों से ब्याज दर में कमी की मांग की थी। इसके बावजूद, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने दोहराया है कि महंगाई के खिलाफ केंद्रीय बैंक की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई हैं और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। इन स्थितियों में, एमपीसी अगली बैठक में क्या करेगी, मैं यहां उसकी भविष्यवाणी नहीं करना चाहता। हालांकि, नीतिगत ब्याज दर निर्धारित करने में खाद्य मुद्रास्फीति को अलग से शामिल करने के लिए व्यापक परामर्श की आवश्यकता है। इस तरह के बदलाव के विभिन्न निहितार्थों पर चर्चा, बहस और निष्कर्ष पर पहुंचने की जरूरत है। चूंकि मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण एक जटिल मुद्दा है, इसलिए विकास पर खाद्य मुद्रास्फीति के व्यापक निहितार्थ को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। आखिरकार मुद्रास्फीति एक अदृश्य कर है और यह वास्तविक आय और क्रयशक्ति को कम करती है, जो अपने आप में एक बाधा बनकर विकास को कम कर सकती है।
भारत जैसे विकासशील देश में, जहां रिजर्व बैंक की नीति में कई सामाजिक और विकास उद्देश्य शामिल हैं, इस विषय पर व्यापक परामर्श जरूरी है। वर्ष 2024-25 की बजट घोषणा के अनुसार, विकास के बड़े चालक राष्ट्रीय स्तर पर पूंजीगत व्यय में वृद्धि और राज्यों को अधिक पूंजीगत व्यय के लिए प्रेरित करना है। हमने वित्त वर्ष 2024-25 के मध्य बिंदु को पार कर लिया है। वित्त वर्ष की पहली तिमाही में पूंजीगत व्यय कम था। हाल के महीनों में पूंजीगत व्यय में सुधार हुआ है। हालांकि, इस साल अगले तीन-चार महीनों में पूंजीगत व्यय के चक्र को काफी तेजी से बढ़ाना होगा। अगर ऐसा नहीं होता है, तो विकास दर में कमी आ सकती है।
यह भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि ऐसे संकेत हैं कि सरकार के कर राजस्व, खासकर प्रत्यक्ष कर में उछाल आने वाला है और यह बजटीय अनुमानों से ज्यादा हो सकता है। इसलिए संभवतः सरकार उधार की सीमा को पार किए बिना उच्च पूंजीगत व्यय का बोझ उठा सकती है। अगर ऐसा नहीं होता है, तो कम राजकोषीय घाटा बाजार ब्याज दर पर दबाव को कम करने में मदद करेगा। हमें धैर्यपूर्वक देखना होगा कि अगले दो-तीन महीनों में चीजें कैसे आगे बढ़ती हैं।
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर, अनिश्चितताओं और वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने अच्छा प्रदर्शन किया है। भारत का निर्यात बढ़ रहा है। रिजर्व बैंक भी उच्च विदेशी मुद्रा भंडार बनाए हुए है, हालांकि हाल के महीनों में इसमें गिरावट आई है। उधर कई वैश्विक व्यापक आर्थिक बाधाओं के कारण भारतीय रुपया भी दबाव में है।
हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की विनिमय दर व्यवस्था बाजार द्वारा निर्धारित होती है और भारत और रिजर्व बैंक विनिमय दर के लिए कोई लक्ष्य या बैंड प्रदान नहीं करते हैं। चूंकि वैश्विक अनिश्चितताएं जारी हैं, इसलिए बढ़ती अस्थिरता के बीच विनिमय दर प्रबंधन से इस बारे में सुरक्षित अनुमान होगा कि एक नियामक के रूप में रिजर्व बैंक क्या करेगा।
अंत में, आगे बढ़ते हुए गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर ध्यान केंद्रित करते हुए वित्तीय क्षेत्र विनियमन जारी रखना होगा। असुरक्षित ऋणों, विशेष रूप से एनबीएफसी द्वारा दिए जाने वाले व्यक्तिगत ऋणों को विनियमित करने के लिए अधिक आक्रामक रुख अपनाने से घरेलू क्षेत्र, खासकर आय वितरण के निचले छोर पर रहने वाले लोगों को वित्तीय रूप से सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। ऐसे ऋणों पर बहुत कम जोखिम आवश्यक है। चूंकि प्रौद्योगिकी की उन्नति और ऐसे उत्पादों के आक्रामक विपणन के कारण अब ऐसे वित्तीय साधनों तक लोगों की पहुंच आसान हो गई है, इसलिए यह अब देश के किसी दूरदराज इलाके में किसी विशेष परिवार के ऋणग्रस्त होने की स्थानीय समस्या नहीं रह गई है। इस प्रवृत्ति को उलटने के लिए परिवारों को ऐसे वित्तीय साधनों के जोखिम के बारे में जानकारी देना आवश्यक है। चूंकि अब वित्तीय बचत दरें बहुत कम हैं, इसलिए असुरक्षित ऋण द्वारा संचालित उपभोग वित्तीय स्थिरता की कीमत पर विकास को बढ़ावा दे सकता है।