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अर्थशास्त्र: जीडीपी को अल्पकालिक और दीर्घकालिक रूप से प्रभावित करती है घरेलू बचत में गिरावट
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विस्तार
भारत दशकों से बचतकर्ताओं का राष्ट्र माना जाता रहा है, लेकिन यह प्रवृत्ति तेजी से बदल रही है, क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि घरेलू बचत में गिरावट आ रही है। रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2023 में भारत की घरेलू बचत 5.1 प्रतिशत के निचले स्तर पर पहुंच गई है। पिछले दशक में यह गिरावट स्थिर रही, क्योंकि भारत के लोग बदलती पारिवारिक संरचना एवं जीवन-यापन की बढ़ती लागत से उपजी चुनौतियों से प्रभावी तरीके से निपट रहे थे। 1980 और यहां तक 1990 के दशक (जब संयुक्त परिवार अस्तित्व में थे) के परिवारों की तुलना में पिछले दो दशकों में घरेलू संरचना में लगातार बदलाव देखा गया है।
घरेलू बचत क्षमता में कई वजहों से गिरावट आई है-उपभोक्ता वस्तुओं पर खर्च में वृद्धि, संयुक्त परिवार व्यवस्था में कमी और मुद्रास्फीति में वृद्धि, जो लोगों की क्रय शक्तियों को प्रभावित करती है। आसान किस्तों पर ऋण उपलब्ध हो जाने के कारण कर्ज लेने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, जिसके कारण बचत दर पर असर पड़ रहा है। आम तौर पर घरेलू बचत दर में कमी के लिए मुद्रास्फीति के साथ बढ़ती लागत को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है। भारत और भारतीयों ने बचत और निवेश के लिए डिजिटलीकरण और वित्तीय साधनों की आकर्षक उपलब्धता के साथ बहुत कुछ बदल दिया है।
यदि आप रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़े पर गंभीरता से गौर करें, तो पूर्ण आधार पर शुद्ध वित्तीय संपत्ति में वर्ष 2022-23 में गिरावट आई है, और यह 130.80 खरब रुपये रह गई है, जबकि 2021-22 में यह 170 खरब रुपये थी। लेकिन, वित्त वर्ष-23 में परिवारों की सकल वित्तीय संपत्ति साल-दर-साल 14 फीसदी की दर से बढ़कर 290.60 खरब रुपये हो गई। साथ ही, इसी अवधि में वित्तीय देनदारियों में 76 फीसदी की आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है, जिससे परिसंपत्तियों में वृद्धि की तुलना में सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में शुद्ध वित्तीय बचत कम हो गई है। मूल रूप से कर्ज का उपयोग वित्तीय लक्ष्यों और सपनों को पूरा करने के लिए बढ़ गया है। आज ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे, जो उधार के पैसे से कार, घर खरीदते हैं और यहां तक कि छुट्टियां मनाने जाते हैं।
कर्ज लेने में कोई बुराई नहीं है, खासकर यदि आप उसका उपयोग संपत्ति बनाने के साथ-साथ अपने वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए चतुराई से करते हैं। हालांकि जब कोई बहुत ज्यादा उधार लेना शुरू कर देता है, तो बचत की दर घट जाती है, जिससे कुछ मामलों में डिफॉल्ट होने की आशंका बढ़ जाती है।
क्षमता से अधिक कर्ज लेने से वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है। कोविड महामारी के बाद लॉकडाउन के दौर ने लोगों को वास्तविकता से अवगत कराया, क्योंकि आय कम होने के कारण अनेक लोगों को अपने गांव-घर लौट जाना पड़ा और अनेक लोग तो वित्तीय रूप से असमर्थ होने के कारण अपना ऋण भुगतान करने से भी चूक गए।
दरअसल घरेलू बचत का एक बड़ा हिस्सा उपभोग के साथ-साथ रियल एस्टेट में निवेश कर दिया गया है, इसलिए इसमें गिरावट आई है। आय में कम वृद्धि और ऋणों पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी ने घरेलू बचत के आंकड़े में गिरावट में बढ़ोतरी की है। जीडीपी के आंकड़ों के मुताबिक, अंतिम निजी उपभोग व्यय में वर्ष 2022-23 में 7.5 फीसदी की वृद्धि हुई, जो वर्ष 2021-22 की 11.2 फीसदी वृद्धि से कम है, जिसे बहुत ही अनुकूल आधार प्रभाव से लाभ हुआ।
साथ ही, आंकड़ों के मुताबिक, 'वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाओं' उद्योग के सकल मूल्य में 2022-23 में 7.1 फीसदी की वृद्धि हुई, जो कि 2021-22 में 4.7 फीसदी और 2020-21 में 2.1 फीसदी से अधिक थी। कम घरेलू बचत दर की ओर यह बदलाव टिकाऊ नहीं है और बचत में कमी के कारण उपभोग में वृद्धि भी टिकाऊ नहीं है। कई अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारत में निजी खपत कुल मांग का एक प्रमुख चालक है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इसकी हिस्सेदारी घट गई है, फिर भी यह कुल मांग का सबसे बड़ा हिस्सा है, जो सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देता है। घरेलू बचत एवं खर्च के साथ-साथ उधार आय, धन, मुद्रास्फीति, प्रचलित ब्याज दर और भविष्य की उम्मीदों पर निर्भर करता है। इस समय हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जब ये सभी कारक तनाव में हैं। आय में उतनी वृद्धि नहीं हुई है जितनी उम्मीद थी, लेकिन जीवन-यापन की लागत बढ़ रही है और मुद्रास्फीति भी।
लंबे समय में, आय और धन निजी उपभोग को संचालित करते हैं और परिवार अपने लिए उपलब्ध संभावित संसाधनों के दीर्घकालिक दृष्टिकोण के आधार पर अपना खर्च निर्धारित करते हैं। जो परिवार आज इस विश्वास के साथ संपत्ति खरीद रहे हैं कि कीमतें बढ़ती रहेंगी, उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, जब संपत्ति की कीमतें बाद में सही हो जाएंगी। इसी तरह, परिसंपत्ति की कीमतों में कोई भी बदलाव अल्पावधि में मूल्य सुधार की स्थिति पैदा कर सकता है, जो परिसंपत्ति के मूल्य को और प्रभावित कर सकता है और किसी की संपत्ति के मूल्य को कम कर सकता है। यदि मुद्रास्फीति ऊंची बनी रही, तो इसका निजी उपभोग और खर्च पर भी असर पड़ेगा।
जीडीपी के प्रतिशत के रूप में घरेलू बचत में गिरावट के आंकड़ों का अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि घरेलू बचत में गिरावट के कारण शेष अर्थव्यवस्था के लिए उधार लेने या निवेश करने के लिए कम धनराशि उपलब्ध होती है, तो यह चिंता का कारण है। बचत में कमी आर्थिक मंदी का एक कारण भी बन सकती है, जिसका असर अब तक आर्थिक संकेतकों पर नहीं दिख रहा है। लेकिन, जीडीपी की तुलना में घरेलू बचत दर में लगातार गिरावट को देखते हुए ऐसी स्थिति हो सकती है, जब आय वास्तविक रूप से न बढ़े। इसका असर इस बात पर पड़ सकता है कि परिवार किस तरह बचत करते हैं और अपने पैसे का उपयोग कर आर्थिक विकास में कैसे योगदान करते हैं।