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नायाब है भारतीय सेना
Tue, 15 Jan 2019 07:35 PM IST
Nootan Gupta
अरविंदर सिंह लांबा
अरविंदर सिंह लांबा
Published by: Nootan Gupta
Updated Tue, 15 Jan 2019 07:35 PM IST
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अरविंदर सिंह लांबा
ब्रिटिश भारतीय थलसेना के पूर्व कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल क्लाउड ऑचिनलेक ने कहा था कि भारतीय सेना के बिना दोनों विश्वयुद्धों में ब्रिटेन को सफलता नहीं मिल सकती थी। उनकी कही इबारत कहीं से गलत नहीं है, क्योंकि पहले विश्वयुद्ध में भाग लेने वाले करीब साढ़े तेरह लाख सैनिकों की संख्या अपने आप में बहुत कुछ कहती है। जनरल करियप्पा के पद संभालते ही पंद्रह जनवरी, 1949 को भारतीय थल सेना को पहली बार किसी भारतीय का नेतृत्व मिला था। तब से लेकर आज तक हर साल 15 जनवरी की तारीख भारत के सभी सेना मुख्यालयों में जश्न का दिन होता है। पूरे देश में मंगलवार को सेना दिवस मनाया गया।
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इंसानी कूबत ही हिंदुस्तानी फौज की ताकत है और यह कई मौकों पर साबित हो चुका है। फिर चाहे वे विश्वयुद्ध हों या कश्मीर के लिए पाकिस्तान से लड़ी गईं जंग। हमारे फौजियों ने हर झंडे के तले असाधारण प्रदर्शन किया है। जिन ग्यारह भारतीय सैनिकों को विक्टोरियन क्रॉस से नवाजा गया है, उसकी शुरुआत बलूच रेजिमेंट के खुदादाद खान से हुई थी। शानदार नेतृत्व, कार्रवाई की आजादी और मूल्यों से कभी समझौता न करना भारतीय सेना की विशेषताएं हैं।
लगभग हर तरह की रण भूमि के माहौल से वाकिफ और रासायनिक और परमाणु खतरों के दौर में भारतीय सेना आसमान से लेकर समुद्र तक सभी क्षेत्रों में किसी भी मिशन के लिए पूरी तरह तैयार है। विक्रम बत्रा से लेकर ईश्वर सिंह जैसे नाम यों ही नहीं याद आते, जिनकी अकेले की बहादुरी दुनिया के इतिहास और भूगोल बदलने के लिए काफी थी। एकीकृत टीमों द्वारा ऑपरेशन, दुश्मनों के खिलाफ विशेष ऑपरेशन और उनके इलाकों में रणनीतिक हमले तथा आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन हमारी सेना की अनूठी ताकत है। बांग्लादेश से लेकर मालदीव तक में सफल कार्रवाई और कारगिल युद्ध की शौर्यगाथा भारतीय सैनिकों की क्षमता ही दर्शाती है।
आज जबकि जंग के मैदान का स्वरूप बदलकर साइबर व तकनीक आधारित हो चुका है, सेनाओं को पारंपरिक तरीकों के अलावा इन मोर्चों पर भी तैयार रहना पड़ता है। भारतीय सैनिकों ने यहां भी अपनी काबिलियत साबित की है। दुनिया के किसी हिस्से से ज्यादा चुनौतीपूर्ण भौगोलिक माहौल में हमारे सैनिकों को कई तरह की आंतरिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। हथियारों से लेकर विभिन्न सेवाओं में बंटी सेना पर देश के सामाजिक ताने-बाने का सीधा असर पड़ता है। अगर लोग सेना से जुड़ी फर्जी खबरों पर विश्वास करने लगें, तो इसका सैनिकों के मनोबल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
'आर्मी मास मोमेंटम' सेना की नई और अनूठी विशेषता है। देश और समाज के गौरव और सम्मान को बनाए रखने के लिए भारतीय सैनिक का सम्मान और पलटन और रेजिमेंट के प्रति अपनेपन की भावना किसी भी फौजी के लिए बहुत मददगार होती है। असाधारण प्रशिक्षण के साथ प्रेरित सेना को बेहतर उपकरण व उन्नत प्रौद्योगिकी के जरिये लगातार ऐसा बनाया जाता है कि वह अपनी सामाजिक स्थिति को हमेशा उच्चतर रखे।
भारतीय सेना ने अपनी शूरता को समय-समय पर साबित किया है। यही कारण है कि सेना को लोग राष्ट्र के अंतिम उपाय के तौर पर मानते हैं और इसमें उनकी पूरी आस्था है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल द्वारा भारतीय सैनिकों और अधिकारियों की नायाब बहादुरी को दी गई श्रद्धांजलि विश्वयुद्धों के बाद भारतीय परंपरा की मूक गवाही थी। आगे के युद्धों में यह और अधिक निर्णायक कारक साबित होगी।
-लेखक भारतीय सेना के पूर्व उप प्रमुख हैं।