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भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता: रणनीतिक साझेदारी की नई शुरुआत, आत्मनिर्भर भारत की ओर एक कदम
यूरोपीय संघ से समझौते के बाद दबाव में आए अमेरिका की अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे पर सहमति नई दिल्ली के साथ उसके संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। विपक्ष के दावों व अमल की चुनौतियों के बावजूद इससे आत्मविश्वासी भारत और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में इसके बढ़ते कद की झलक मिलती है।
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भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा पर सहमति बनना दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी की दिशा में एक ऐतिहासिक पड़ाव है, जो भारत को आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ाते हुए अमेरिकी बाजारों तक उसकी पहुंच को बढ़ाता है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष फरवरी के मध्य में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण पर वार्ता शुरू करने की घोषणा की थी, लेकिन पिछले ही वर्ष अप्रैल में अमेरिका की तरफ से 25 फीसदी के पारस्परिक टैरिफ और फिर अगस्त में रूस से तेल खरीदने के दंडस्वरूप भारत पर और 25 फीसदी टैरिफ से अमेरिकी बाजारों में भारतीय निर्यात संकट में आ गया था। इसने भारत को वैकल्पिक निर्यात गंतव्यों की तलाश के लिए प्रेरित किया। तथ्य यह भी है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा जैसे कुछ उत्पादों को अमेरिका द्वारा 50 फीसदी के टैरिफ से मुक्त रखने की वजह से वर्तमान वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल-दिसंबर में गत वर्ष की समान अवधि की अपेक्षया आठ फीसदी बढ़ोतरी ही हुई है। इस दौरान, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ओमान और यूरोपीय संघ के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौते अगले वर्ष तक पूरी तरह संचालित होने लगेंगे, लिहाजा अगले वित्तीय वर्ष में भारतीय निर्यात में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। खासकर यूरोपीय संघ के भारत के साथ हुए समझौते के बाद से ही दबाव में आए अमेरिका की भारत के साथ समझौते पर सहमति नई दिल्ली के साथ उसके संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ तो है ही, इससे एक आत्मविश्वासी भारत की झलक भी मिलती है। भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूस और चीन को मिलाकर होने वाले निर्यात का तकरीबन चार गुना निर्यात वह अमेरिका को करता है। चूंकि अमेरिका ने चीन पर 37 फीसदी टैरिफ लगाया हुआ है, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजारों में चीनी कंपनियों के मुकाबले बढ़त हासिल हो सकती है। जहां तक सवाल विपक्ष के दावों का है, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का यह आश्वासन अहम है कि डेयरी उत्पादों के मामले में किसी भी शर्त के साथ बाजार नहीं खोला गया है। सरकार यह तो कह रही है कि बाजार को उन्हीं कृषि उत्पादों के लिए सीमित तौर पर खोला गया है, जहां भारत आयात पर निर्भर है या जहां घरेलू उत्पादन कम है, पर उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि यह आंशिक खुलापन लंबे समय में घरेलू किसानों पर दबाव न डाले। समझौते की जटिलताओं के मद्देनजर इसका कार्यान्वयन नई चुनौतियां पैदा कर सकता है, लेकिन इससे भारत को जो हासिल हुआ है, उसे बदलती वैश्विक भू-राजनीति और आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर ही समझा जा सकता है।
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