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क्रिकेट: एक टीम की ऐतिहासिक जीत या खेल से खिलवाड़

Sat, 06 Jan 2024 07:13 AM IST
Raj Kumar Singh राज कुमार सिंह
Updated Sat, 06 Jan 2024 07:13 AM IST
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सार
दक्षिण अफ्रीका से टेस्ट जीत भारत ने इतिहास रच दिया। पर पांच दिवसीय टेस्ट मैच के डेढ़ दिन में खत्म हो जाने के खतरे भी क्या हम समझ रहे हैं?
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India South Africa Cape Town test match ending in just two days Shortest test match Historic win
भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

केपटाउन के न्यूलैंड्स मैदान पर मेजबान दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध टेस्ट मैच जीतने वाली पहली एशियाई टीम बनकर भारत ने इतिहास रच दिया। इस पर जश्न स्वाभाविक है, पर क्या पांच दिवसीय टेस्ट मैच डेढ़ दिन में खत्म हो जाने के खतरे भी हम समझ रहे हैं? हर दिन 90 ओवर फेंकने के नियम वाली टेस्ट क्रिकेट के मुकाबले अगर डेढ़ दिन में मात्र 107 ओवरों में समाप्त हों, तब वास्तव में कोई टीम जीतती है या क्रिकेट का खेल ही हार रहा होता है?



जीत के माहौल में यह सवाल नापसंद हो सकता है, पर असली कद्रदानों को खेल के भविष्य की चिंता भी करनी पड़ेगी, वर्ना उसे तमाशा बनानेवाली ताकतें तो सक्रिय हैं ही। पहले 60-60 ओवरों वाले वनडे मैचों का प्रयोग इसलिए हुआ कि खासकर पांच दिन में भी परिणाम न देनेवाले ड्रॉ टेस्ट मैच दर्शकों के बीच आकर्षण खो रहे थे। बाद में मुकाबले को और छोटा एवं रोमांचक बनाने के लिए वनडे मैच 50-50 ओवरों के कर दिए गए। और अब 21 सदी में तो 20-20 ओवरों वाले ट्वंटी-20 का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है, जिसे ज्यादातर दर्शक खेल के बजाय शाम के मनोरंजन की तरह देखते हैं।


आश्चर्य नहीं कि कुछ ही साल में हमें 10-10 ओवरों वाले मैचों की क्रिकेट प्रतियोगिताएं भी नजर आएं। बेशक इन प्रायोगिक लघु संस्करणों से क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ी है। आईपीएल सरीखे आयोजनों से नए खिलाड़ियों के लिए शोहरत और दौलत कमाने के अवसर भी बढ़ गए हैं। इनसे युवा खिलाड़ियों पर भी पैसा तो बरस ही रहा है, प्रदर्शन के आधार पर भारतीय टीम में प्रवेश के द्वार भी खुल रहे हैं। क्रिकेट की लोकप्रियता और क्रिकेटरों की आय बढ़ने पर किसी को भी क्यों आपत्ति होगी? पर उसके दुष्परिणाम से आंखें मूंद लेने का परिणाम खेल से ही खिलवाड़ के रूप में सामने आने लगा है।

पहले बननेवाली पिचें बल्लेबाज और गेंदबाज, दोनों को अपना कौशल दिखाने के समान अवसर प्रदान करती थीं। पहले एक-दो दिन पिच तेज गेंदबाजों को मदद करती थी, तो चौथे दिन से स्पिन गेंदबाजों को मदद मिलने लगती थी। अगर बल्लेबाज तकनीकी रूप से मजबूत हो, तब बल्लेबाजी का पराक्रम तो पांचों दिन देखने को मिलता था। कई बार चौके या छक्के से ज्यादा तालियां किसी गेंदबाज को मेडन ओवर के लिए मिलती थीं, तो बल्लेबाज को किसी बेहद मुश्किल गेंद को रक्षात्मक तरीके से खेलने के लिए भी। तब विकेट के नजदीक फील्डिंग भी एक कठिन परीक्षा होती थी।

बेशक कई बार बहुत अच्छी गेंदबाजी या पिच के अप्रत्याशित व्यवहार से तब भी कुछ मैच पांच दिनों से पहले समाप्त हो जाते थे या फिर निर्जीव पिचों की बदौलत पांच दिन में भी निर्णय नहीं निकल पाता था, पर वे उदाहरण अपवाद से ज्यादा नहीं रहे होंगे।

पिछले कुछ दशकों में दर्शकों के बीच लोकप्रियता बढ़ाने के नाम पर जो प्रयोग किए गए हैं, उनका सबसे नकारात्मक, और इसीलिए चिंताजनक पहलू यह है कि उससे क्रिकेट के खेल का मूल चरित्र ही दांव पर लग गया है। पिछली सदी तक हवा में शॉट खेलने या फिर क्रॉस बैट से खेलने पर कोच ही खिलाड़ी को बाहर का रास्ता दिखा देता था, पर अब नए क्रिकेट में वैसा करने पर तालियां भी मिलती हैं और इनाम भी बरसते हैं। बेशक केपटाउन की जीत में सिराज और बुमराह की गेंदबाजी को कम नहीं आंका जा सकता, पर पहला टेस्ट एक पारी और 32 रन से हारनेवाली टीम दूसरा टेस्ट मात्र डेढ़ दिन में सात विकेट से जीत जाए, तो पिच पर सवाल उठेंगे ही। दक्षिण अफ्रीकी कोच कोनराड से लेकर पूर्व गेंदबाज डेल स्टेन और भारतीय कप्तान रोहित शर्मा तक तमाम जानकारों ने अलग-अलग तरह से जो भी टिप्पणियां की हैं, दरअसल वे पिचों की गुणवत्ता पर ही सवालिया निशान लगाती हैं।

क्रिकेट के रोमांचक संस्करणों की प्राथमिकता हावी होने से ज्यादातर वर्तमान बल्लेबाज भी तकनीकी रूप से उतने मजबूत नहीं हैं कि किसी बहुत खराब पिच या बहुत अच्छे गेंदबाज के बावजूद अपना पराक्रम दिखा सकें। क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था आईसीसी को क्रिकेट के भविष्य से जुड़े इन चिंताजनक संकेतों पर चिंतन अवश्य करना चाहिए। 

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