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अंतरिक्ष में भारत का बढ़ता दखल

Fri, 19 Dec 2014 07:56 PM IST
संजय पलसुले
संजय पलसुले Updated Fri, 19 Dec 2014 07:56 PM IST
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India's increasing interference in space

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने अब तक के सबसे भारी रॉकेट भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी मार्क-3) का सफल प्रक्षेपण कर अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इस रॉकेट में सॉलिड, लिक्विड और क्रायोजेनिक ईंधन का उपयोग किया जाना प्रौद्योगिकी के नजरिये से एक अद्भुत एवं विशेष प्रयोग है। अब भारत विश्व के उन चंद देशों में शामिल हो गया है, जो सर्वश्रेष्ठ उपग्रह प्रमोचन यान (सेटेलाइट लांच व्हीकल) बनाते हैं।

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इससे भारत को विश्व मंच पर न सिर्फ प्रतिष्ठा मिली है, बल्कि उसे अब विदेशी धन भी प्राप्त होगा, क्योंकि सस्ता और भरोसेमंद होने के कारण भविष्य में विदेशी राष्ट्र भी अपने उपग्रह इसी रॉकेट से भेजने का प्रयास करेंगे। इस अभियान की सफलता से यह उम्मीद भी तेज हो गई है कि आने वाले एकाध दशक में भारत भी अंतरिक्ष में इंसान भेज सकेगा। फिलहाल रूसी, चीनी और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ही ऐसा करने में सक्षम हैं।
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दरअसल, अंतरिक्ष में उपग्रह स्थापित करने के लिए तीन महत्वपूर्ण ऑर्बिट (कक्षा) होते हैं- लो अर्थ ऑर्बिट, पोलर ऑर्बिट, और भू-स्थिर ऑर्बिट। इसरो संवर्धित उपग्रह प्रमोचन यान यानी एसएलवी-तीन और एएसएलवी द्वारा लो अर्थ ऑर्बिट में उपग्रह भेजता रहा है, जबकि ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान यानी पीएसएलवी से रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट (आईआरएस) पोलर ऑर्बिट में स्थापित किए जा चुके हैं। इसी तरह, 2001 से अब तक भूतुल्यकाली उपग्रह प्रमोचक रॉकेट (जीएसएलवी) मार्क-1 एवं 2 के पांच सफल प्रक्षेपण कर इसरो दो से ढाई हजार किलोग्राम वजनी उपग्रहों को भू-स्थिर ऑर्बिट में प्रक्षेपित करने में सफल हो चुका है।
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लिहाजा इसरो की नई सफलता कई मायनों में खास बन गई है। इसी तरह, यह अभियान तकरीबन 160 करोड़ रुपये में पूरा किया गया है, जो दुनिया की अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों के मुकाबले करीब आधा है। चूंकि सस्ते और पुख्ते अंतरिक्ष मिशन की होड़ पूरी दुनिया में जारी है, इसलिए कम लागत में सफल अंतरिक्ष अभियान को पूरा करके इसरो दूसरे देशों के लिए पसंदीदा अंतरिक्ष एजेंसी बन गई है। वैसे मंगलयान की सफलता ने इसरो को पहले ही वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित बना दिया है।

हालांकि भारत की अंतरिक्ष यात्रा ज्यादा पुरानी नहीं है। भारत ने 21 नवंबर, 1963 को केरल में तिरुवनंतपुरम के निकट थुम्बा से अमेरिका निर्मित नाइक अपाची रॉकेट का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण करके अंतरिक्ष में कदम रखा था। और महज पांच दशकों की यात्रा में ही यह 'इलिट' अंतरिक्ष एजेंसियों में शुमार हो चुका है। इसरो ने वर्ष 1994 में सफलतापूर्वक पीएसएलवी का परीक्षण किया, और अब तक वह 28 भारतीय एवं 35 विदेशी उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर चुका है।


इसी तरह भारतीय सूदूर संवेदी रिमोट सेंसिंग आईआरएस उपग्रहों का प्रक्षेपण भी भारत के पीएसएलवी द्वारा ही किया जाता है। लिहाजा यह उम्मीद बेमानी नहीं कि अब भारतीय इन्सेट एवं विदेशी राष्ट्रों के संचार उपग्रह जीएसएलवी मार्क-3 से ही प्रक्षेपित किए जा सकेंगे। भले ही कभी भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा रूसी एजेंसी के सहायता से अंतरिक्ष पहुंचे थे, मगर अब यहां के अंतरिक्ष यात्री इसरो की सहायता से ही अंतरिक्ष जा सकेंगे। विक्रम साराभाई द्वारा शुरू की गई उपग्रह प्रक्षेपण यान की सफल परंपरा को आगे बढ़ाने की जिमेदारी अब युवा इंजीनियरों एवं युवा वैज्ञानिकों पर है।

- आईआईटी, रुड़की के एसोसिएट प्रोफेसर और इसरो में विजिटिंग साइंटिस्ट रहे हैं

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