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आबादी: जनसंख्या को वरदान बनाने के अष्टसूत्र और मानव संसाधन का सच
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जनसंख्या
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AMAR UJALA
विस्तार
एशियन सदी में भारतीय लीडरशिप की थ्योरी पर वास्तविकता की पहली मुहर लगाने वाली एक बहुत बड़ी खुशखबरी पिछले सप्ताह हमें मिली। जनसंख्या में हम सबसे बड़े देश बन गए। लेकिन क्या हमने या हमारी सरकारों ने, इस युगांतकारी, ऐतिहासिक मोड़ पर कोई जश्न मनाया?
लगता है यह खबर हमें ऐसे मिली है, जैसे प्रेग्नेंसी रिपोर्ट के पॉजीटिव होने की खबर आई हो। आंगन में फूल खिलने का हर्ष तो है, लेकिन लालन-पालन के खर्चों का पहाड़ भी दिख गया। 'हम दो, हमारे दो' का स्लोगन अवचेतन में इतना गहरा धंसा है कि जनसंख्या की रेस जीतने की खबर हमें लजा रही है। तब भी, जबकि हमने देख लिया कि चीन को आगे जाकर अपनी 'वन चाइल्ड पॉलिसी' बदलनी पड़ी और जापान जैसे कई मुल्क आर्थिक विकास के बावजूद बूढ़ों के उदास देशों में तब्दील हो गए। वास्तव में, आबादी को बोझ मानने वाला अर्थचिंतन इधर कमजोर पड़ा है। अब तो 'डेमोग्रैफिक डिविंडेंड' की थ्योरी का बोलबाला है, जिसके मुताबिक आबादी में नौजवान नागरिकों का अनुपात बढ़ने का सीधा मतलब है, इकॉनमी में ज्यादा कामगार, जो जीडीपी बढ़ाने में सहयोग करेंगे। जिस तरह आबादी की वृद्धि दर को केवल खाद्य आपूर्ति की वृद्धि दर के संदर्भ में देखने वाली 200 साल पुरानी मॉल्थस थ्योरी को 19वीं सदी में कार्ल मार्क्स के दर्शन और औद्यौगिक क्रांति ने गलत साबित कर दिया था, उसी तरह इधर चीन ने साबित कर दिया कि आबादी को तरक्की का विलोम समझना भूल है।
साम्यवादी चीन ने सबको चौंकाते हुए बाजारवादी अर्थनीति को गले लगाया और अपनी प्रचंड जनसंख्या को घनघोर विकास की बारिश करने वाले बादलों में रूपांतरित कर दिया। दो किताबों का उल्लेख यहां उपयोगी होगा। सीके प्रह्लाद की- पिरामिड की जड़ में भाग्य- जो निम्नवर्गीय गरीब आबादी को एक विराट उदीयमान बाजार की सकारात्मकता में देखती है। दूसरी हैंस रोजलिंग की बेस्टसेलर-फैक्टफुलनेस- जिसका मर्म है, 'मुल्कों की गरीबी को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है। दुनिया लगातार खुशहाल हो रही है और कुछ दशक पहले के मुकाबले एक औसत विश्वनागरिक का जीवन सुधरा है।'
इस पृष्ठभूमि में आइए देखें कि समकालीन अर्थचेतना के अनुसार बड़ी आबादियों को मानव संसाधन पूंजी के वरदान में बदलने के सूत्र क्या हैं:
पहला सूत्र है, शहर और गांव की खाई की विदाई। विश्व आर्थिक मंच के मुताबिक, 2030 में देश की 40 फीसदी आबादी शहरों की निवासी होगी। एक लाख तक की आबादी के कोई 5,000 बड़े कस्बे और दस हजार आबादी तक के 50 हजार छोटे कस्बे होंगे। सबको ब्रॉडबैंड और मोबाइल कनेक्टिविटी देनी होगी। शहरीकरण अवश्यंभावी है। पुराने महानगर भर चुके हैं। हर जिले में नए शहर बसाने होंगे।
दूसरा सूत्र है, सही हुनर सिखाने और पुन: प्रशिक्षण का। संयुक्त राष्ट्र विश्व जनसंख्या रिपोर्ट ने बताया है कि देश में 'वर्किंग एज मैजोरिटी' है, यानी 68 फीसदी आबादी 15-64 वर्ष के सक्रिय आयुवर्ग में है। 50 फीसदी आबादी 25 वर्ष से कम वाली है, जिससे भारत सबसे युवा राष्ट्र बना। मतलब सबसे बड़ी जिम्मेदारी 'कौशल विकास मंत्रालय' के कंधों पर होगी। नौजवानों को सही हुनर सिखाना और पुराने हुनरमंदों को देश-दुनिया की बदलती तकनीक और मांग के हिसाब से नए हुनर में प्रशिक्षित करना ही मूलमंत्र होगा। उसी से विराट जनसंख्या को रोजगार मिलेंगे।
तीसरा सूत्र, विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करना है। कारखानों के तंत्र के लिए सड़क-पानी, बिजली, पुल, नहरों और ब्राडबैंड का ढांचा अनिवार्य है। भारत में आज 80 फीसदी रोजगार कस्बों-शहरों के असंगठित क्षेत्र में हैं, जो आगे संगठित बनेंगे। सेवा क्षेत्र और विनिर्माण-यही दोनों भविष्य में रोजगार सृजन के डबल इंजन बनेंगे।
चौथा सूत्र, प्रतिभा पलायन पर लगाम का है। देखना होगा कि यह युवा देश कहीं कनाडा या आस्ट्रेलिया के लिए व्हाइट कॉलर कामगारों का आउटसोर्सिंग अड्डा न बनकर रह जाए। सब्सिडियां देकर उच्च शिक्षा आसान बनाने वाला भारतीय शिक्षा तंत्र हाथ मलता रह जाए और पढ़े-लिखे नौजवान टोरंटो या मेलबोर्न का वनवे टिकट जेब में रख दमकते चेहरों के साथ प्लेन की सीढ़ियां चढ़ते जाएं-यह राष्ट्र से छल है।
पांचवां सूत्र है, आर्थिक और लैंगिक असमानता पर नियंत्रण। जनसंख्या में नंबर एक हो जाएं और 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन किट के मोहताज रहें-यह नजारा सिर्फ महामारी में बर्दाश्त किया जा सकता है। राष्ट्र की 77 प्रतिशत संपत्ति शीर्ष के 10 फीसदी नागरिकों के कब्जे में है। संपत्ति के साथ अवसरों की भी समानता हो, यही आबादियों के उद्धार की शर्त है। दूसरा कड़वा सच है घरों, कारखानों और दफ्तरों में लिंगभेद। कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी मौजूदा 25 फीसदी के आंकड़े पर अटकी रही, तो जनसंख्या वरदान नहीं, समस्या बनी रहेगी।
छठा सूत्र है, आबादियों के लिए टिकाऊ विकास। जंगल-तालाब मिटते रहें, लाखों जीवरूप विलुप्त होते हों, माइक्रोप्लास्टिक हमारे डीएनए तक घुस जाए और धरा के सबसे दूषित शहर भारत में हों, तो जनसंख्या या जीडीपी बढ़ने का क्या लाभ? इतने ही अहम, बाल मृत्युदर, पेयजल उपलब्धता, प्राथमिक स्वास्थ्य, भूख निवारण, स्वच्छ ऊर्जा आदि के टिकाऊ विकास लक्ष्य हैं, जिन्हें 2030 तक पूरा करने का वादा भारत सरकार ने किया है।
सातवां सूत्र, आम आबादी के प्रगतिपरक मूल्यों का है। विकास की यात्रा विज्ञानपरक सोच, उदारीकरण और विश्वबंधुत्व की यात्रा है। अंतर्मुखी या अतीतजीवी समाज आगे नहीं बढ़ पाते। पूर्वजों की गलतियों की पोथी खोलकर बैठी रहने वाली पीढ़ियां और बार-बार इतिहास के जख्म कुरेदने वाली मानसिकताएं भविष्य के बदलाव नहीं भांप सकतीं। मिथकों में जीने वाले और अंधश्रद्धाओं के दास नागरिक कब अनुशासित जीवन छोड़ समाज और राजनीति की अराजकताओं में भटक जाएं- कहना मुश्किल रहेगा।
आठवां और सबसे बड़ा सूत्र है, लोकतंत्र और संविधान की सुरक्षा। हिंदुस्तानी इतिहास की सबसे पवित्र पुस्तक भारतीय संविधान है। उसी ने मौलिक अधिकार और सर्वधर्म समभाव जैसे मूल्य पोषित किए, जिनके कारण पिछले अमृतकाल में भारत कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक रहा। अब सबसे बड़ी आबादी वाले भारत को अगले 75 वर्षों में भी, अंतर्विस्फोटों, गृहयुद्धों और नए बंटवारों से बचाने की गारंटी यही संविधान देगा।