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भारत, नेपाल और भूटान का आर्थिक गठजोड़
दीपक श्रीवास्तव
Updated Fri, 17 Oct 2014 11:43 PM IST
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प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही नरेंद्र मोदी दक्षिण एशियाई देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने को तत्पर दिख रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने दक्षेस (सार्क) को मजबूत बनाने की बात भी कही है। हालांकि दक्षेस की मजबूती वक्त की जरूरत भी है, क्योंकि भले ही 1985 में अपनी स्थापना के साथ दक्षेस आर्थिक मुद्दों पर ध्यान देता रहा हो, लेकिन इसका सकारात्मक परिणाम अब तक नहीं दिख सका है।
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बहरहाल, दुनिया के कई हिस्सों में यूरोपीय मॉडल की तरह आर्थिक एकीकरण इन दिनों काफी प्रचलित हो रहा है। यूरोपीय मॉडल सदस्य देशों के लिए एक बाजार और एक मुद्रा की वकालत करता है। ऐसे ही प्रयास की जरूरत एशिया में भी है। मगर दक्षेस के सदस्य देश आपसी संदेह और सीमा विवाद के कारण आर्थिक रूप से एक नहीं हो सके हैं। हालांकि नेपाल और भूटान को साथ लेकर भारत आर्थिक एकीकरण और आम मुद्रा की तरफ बढ़ सकता है, जो पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के कायांतरण में मदद करेगा।
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नेपाल और भूटान के साथ भारत का करीबी रिश्ता रहा है। सांस्कृतिक, विदेश, रक्षा और व्यापार से संबंधित कई समझौते भारत ने नेपाल और भूटान के साथ किए हैं। इतना ही नहीं, इन दोनों देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास में भी भारत हमेशा मदद करता रहा है। लिहाजा ये तीनों देश क्षेत्रीय सहयोग में मजबूती लाकर वैश्विक नीतियों का फायदा उठा सकते हैं। मगर इसके लिए जरूरी है कि तीनों देश अन्योन्याश्रय संबंध स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ें।
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यह हकीकत है कि व्यापार, निवेश और कारोबार के लिहाज से भूटान और नेपाल भारत पर अत्यधिक रूप से निर्भर हैं। भूटानी नोंग्त्रुम और नेपाली रुपया का तो भारतीय रुपये के साथ आसानी से विनिमय भी किया जाता है। यानी नोंग्त्रुम और नेपाली रुपया का निर्धारण भारतीय रुपया करता है। इसलिए अपेक्षाकृत शक्तिशाली मुद्रा होने के कारण भारत तीनों देशों के बीच एक मुद्रा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस मुद्रा के संचालन होने से न सिर्फ मौद्रिक अस्थिरता खत्म होगी, बल्कि व्यापक क्षेत्रों में इस्तेमाल होने की वजह से इस पर विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। यह आर्थिक अनुशासन और पारदर्शिता को भी बढ़ावा देने में मददगार होगी।
लेकिन इस एकल मुद्रा की तरफ बढ़ने से पहले कुछ ठोस पहल आवश्यक हैं। मसलन, आर्थिक एकीकरण के लिए मुक्त व्यापार क्षेत्र एक बुनियादी जरूरत है। इसके बाद सीमा व्यापार के संदर्भ में एक संघ बनाना होगा, जहां ये तीनों देश अन्य देशों के साथ विदेशी व्यापार नीति साझा करेंगे। अगली कड़ी के रूप में सामान्य बाजार की जरूरत है, जहां उत्पाद, श्रम और पूंजी की निर्बाध गतिशीलता होगी। चौथा प्रयास आर्थिक संघ का निर्माण करना होना चाहिए, जिसके सदस्य देशों के बीच एक मुद्रा और एक मौद्रिक नीति का संचालन होगा। हालांकि इस प्रयास में चीन पर भी नजर रखनी आवश्यक है, क्योंकि नेपाल और भूटान उसके साथ काफी लंबी सीमा साझा करते हैं।
बहरहाल, आर्थिक एकीकरण का ऐसा कोई भी प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक तीनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वसनीयता गहरी नहीं होगी। नेपाल और भूटान के कुछ राजनीतिक दल यह कहकर ऐतराज जता सकते हैं कि यह राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ समझौता करना होगा। मगर उन्हें समझना चाहिए कि क्षेत्रीय विकास के लिए यह करना एक क्रांतिकारी पहल है।