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भारतीय गणतंत्र: समृद्धि की ओर बढ़ता भारत, लेकिन देगा होगा नवाचार, स्थिरता और समावेशिता पर जोर
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राजनीतिक व्यवस्था कोई भी हो, उसका लक्ष्य अपने नागरिकों की भलाई सुनिश्चित करना होता है। बीसवीं सदी में आत्मनिर्णय, प्रतिनिधित्व और लोकतंत्र औपनिवेशिक सरकारों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलनों में नारे बन गए थे। नतीजतन, नए लोकतंत्रों का जन्म हुआ, जिनमें भारत भी है। औपनिवेशिक काल और स्वतंत्रता के बीच, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) मेंभारत की हिस्सेदारी एक-चौथाई से गिरकर लगभग पांच फीसदी रह गई थी।
जबकि, आज वैश्विक जीडीपी में हमारी हिस्सेदारी (क्रय शक्ति समता के मामले में) लगभग सात-आठ फीसदी है। हमने अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारत को दुनिया के विकसित देशों में शामिल कराने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। पर इस लक्ष्य का पूरा होना निरंतर आर्थिक विकास से ही मुमकिन है। अभी हमारी प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,100 डॉलर है। जबकि आज उच्च आय वाला देश उसे माना जाता है, जहां प्रति व्यक्ति आय 12 हजार डॉलर से अधिक हो। यानी अभी हम उच्च आय वाले देश के छठवें हिस्से के बराबर हैं। चूंकि, वर्ष 2024 की तुलना में वर्ष 2047 में उच्च आय वाले देशों की आय सीमा स्वाभाविक ही बहुत अधिक होगी, इसलिए प्रति व्यक्ति आय का हमारा लक्ष्य 15 हजार डॉलर सालाना से अधिक होना चाहिए। भारत को विकसित देश बनाने के लिए आज से 2047 के बीच लगातार आठ फीसदी से अधिक की विकास दर पाना जरूरी है। बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय द्वारा समर्थित निजी निवेश से इस विकास को आगे बढ़ाना होगा। केंद्र सरकार निश्चित रूप से अपना काम कर रही है। जीडीपी में 2014 और 2024 के बीच केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय का हिस्सा जीडीपी के 1.5-1.6 फीसदी से दोगुना होकर जीडीपी का 3.0-3.2 फीसदी हो गया है।
बुनियादी ढांचे में यह निवेश लॉजिस्टिक की लागत को कम करेंगे और हमारी विनिर्माण प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देंगे। राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन जैसे कार्यक्रमों के साथ-साथ बुनियादी ढांचे में निवेश से इस क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ेगा। उच्च विकास दर हासिल करने के लिए विनिर्माण और निर्यात का भी विस्तार होना चाहिए। बुनियादी ढांचे में निवेश और व्यापार सुगमता पर ध्यान देने से व्यापार करने की लागत में कमी आएगी। हालांकि बहुत कुछ हासिल किया जा चुका है, पर अब अगली छलांग पर ध्यान देना चाहिए। राज्य स्तर पर प्रक्रियाओं, मंजूरी, लाइसेंस, फॉर्म्स आदि व्यवस्थाओं को निश्चित रूप से तर्कसंगत और सुव्यवस्थित किया जाना चाहिए। अब यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे अपने राज्यों को निवेश गंतव्य के रूप में बढ़ावा दें। तेजी से उभर रही नई प्रौद्योगिकी के साथ भारत को तकनीकी रूप से छलांग लगाने के लिए नवाचार-समर्थक नियामक दृष्टिकोण की जरूरत है।
भारतीय नियामकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे पर्याप्त क्षमता से सुसज्जित हों और नई प्रौद्योगिकियों को विकसित होने का मौका देने का लचीलापन भी दिखाएं। हमें निर्यात बाजारों को भी आक्रामक रूप से लक्षित करना चाहिए। बुनियादी ढांचे में निवेश के अलावा केंद्र एवं राज्य सरकारों को भूमि एवं श्रम सुधारों को लागू करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। उद्योगों के लिए बिजली की लागत को भी अन्य समकक्ष राष्ट्रों के हिसाब से प्रतिस्पर्धी बनाना चाहिए। सरकार लागत संबंधी कमियों को दूर करने का प्रयास तो कर ही रही है, निजी क्षेत्रों को भी नवाचार, अनुसंधान व विकास और गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। भारत में अनुसंधान व विकास पर ज्यादातर खर्च सार्वजनिक क्षेत्र से होता है। खासकर उद्योग 4.0 (एआई, मशीन लर्निंग इत्यादि) में निजी अनुसंधान एवं विकास हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए आवश्यक है। डिजिटल कौशल और साक्षरता पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए और कौशल विकास उद्योग आधारित होने चाहिए। टिकाऊपन या स्थिरता को हमारे सभी प्रयासों के केंद्र में रखना होगा। आने वाले वर्षों में हर तरह के वैश्विक व्यापार में कार्बन तीव्रता एक महत्वपूर्ण बिंदु बनने वाली है। हमारी कंपनियों और सरकारों को इस बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए। इसी तरह वैश्विक पूंजी भी अपने निवेश फैसलों में तेजी से आर्थिक, सामाजिक एवं शासन संबंधी मानदंडों को ध्यान में रख रही है। भारत को इसके लिए तैयार रहना चाहिए और जलवायु एवं सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (एसडीजी) परियोजनाओं की दिशा में आने वाले निवेश का लाभ उठाना चाहिए। सरकार हमारे सामूहिक एसडीजी और जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करेगी। जलवायु कार्रवाई के मामले में भारत सबसे श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जी-20 देशों में से एक है। हरित हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ सरकार ने निजी निवेश के फलने-फूलने के लिए सक्षम वातावरण बनाया है। अब इस अवसर को साकार करने का समय आ गया है।
जब तक हम अपनी महिला श्रमबल भागीदारी दर (एलएफपीआर) नहीं बढ़ाते, तब तक भारत विकास नहीं कर सकता। इस समय महिलाओं के लिए भारत की एलएफपीआर 37 फीसदी है, जबकि पुरुषों की 80 फीसदी है। यह असमानता हालांकि वैश्विक स्तर पर है, लेकिन भारत की औपचारिक अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। महिला नेतृत्व वाले विकास पर सरकार का जोर इस दृष्टिकोण को समाहित करता है। वित्तीय समावेशन इस रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ रहा है। अब तक खोले गए 45 करोड़ से ज्यादा बैंक खातों में से करीब आधे महिलाओं के हैं। पीएम मुद्रा योजना के तहत बांटे गए सूक्ष्म ऋणों में से दो-तिहाई महिला उद्यमियों को दिए गए हैं। प्रशासनिक एवं निर्वाचित भूमिकाओं में महिलाओं के नेतृत्व एवं प्रतिनिधित्व से भी उनकी भागीदारी बढ़ेगी। हाल ही में सरकार ने संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए ऐतिहासिक विधेयक पारित किया है।
इसके अलावा, भारत की पर्यटन क्षमता का पूरी तरह से दोहन नहीं किया गया है। यदि इसके विकास के लिए वातावरण उपलब्ध कराया जाए, तो यह क्षेत्र विकास और रोजगार को काफी बढ़ा सकता है। इन क्षेत्रों में विकास ऐसा होना चाहिए, जिससे प्राकृतिक सुंदरता और विरासतों का संरक्षण हो। यही बात हमारे शहरों के विकास पर भी लागू होती है। किफायती आवास, चौबीसों घंटे सुविधाओं की उपलब्धता, सार्वजनिक परिवहन प्रमुख स्तंभ हैं। जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ रहा है, स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे होने तक सरकार, निजी क्षेत्र और समाज मिलकर समग्र और सहयोगात्मक प्रयास से एक विकसित और संपन्न राष्ट्र के दृष्टिकोण को साकार कर सकते हैं। रणनीतिक कार्रवाई, नवाचार, स्थिरता और समावेशिता के जरिये भारत एक समृद्ध भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।