चंद्रयान की चमक से दमकता भारत : हिन्दुस्तान के लिए अब चंदा मामा दूर के नहीं रहे
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हिन्दुस्तान के लिए अब चंदा मामा दूर के नहीं रहे। इसरो के वैज्ञानिकों और उनके सत्रह हजार सहयोगियों ने सोमवार को जिस पल अपने दूसरे चंद्रयान को छोड़ा, तो उनके लिए उस एहसास को शब्दों में बयान करना कठिन था। करीब तीन लाख 84 हजार किलोमीटर का फासला तय करके सितंबर के पहले हफ्ते में जब इस यान का चांद से संपर्क होगा, भारतीय तिरंगे की शान और बढ़ जाएगी।
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हिन्दुस्तान के लिए अब चंदा मामा दूर के नहीं रहे। इसरो के वैज्ञानिकों और उनके सत्रह हजार सहयोगियों ने सोमवार को जिस पल अपने दूसरे चंद्रयान को छोड़ा, तो उनके लिए उस एहसास को शब्दों में बयान करना कठिन था। करीब तीन लाख 84 हजार किलोमीटर का फासला तय करके सितंबर के पहले हफ्ते में जब इस यान का चांद से संपर्क होगा, भारतीय तिरंगे की शान और बढ़ जाएगी।
वैज्ञानिक कयास लगाते आए हैं कि किसी समय चक्र में यहां जीवन था और जीव-जंतु विचरण करते थे, लेकिन ज्वालामुखी के फटने से विनाश हो गया। जीवाश्म याने फॉसिल्स इन्हीं जीव-जंतुओं की मौजूदगी को सुनिश्चित करते हैं। इसके अलावा वहां मैग्नीशियम - कैल्शियम खनिजों और लोहा धातु की उपस्थिति के बारे में चंद्रयान दो जांच कार्य में सहायता कर सकता है।
जो मुल्क हमारे गरीब होने पर ताना देते थे कि भारत को यह हक नहीं है कि वह अंतरिक्ष कार्यक्रम पर अनाप-शनाप रुपये बहाए, वही देश आज भौंचक्के हैं। केवल हजार करोड़ रुपये से कम में हिन्दुस्तान चांद पर पहुंच सकता है -उनकी कल्पना से परे है। एक कड़वा दौर ऐसा भी आया था, जब अमेरिका ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम पर नाराजगी दिखाई थी और सोवियत संघ के साथ मिलकर काम करने पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी थी।
इस कारण रूस ने अपने हाथ खींच लिए तो दो बरस के भीतर भारत ने स्वदेशी तकनीक का विकास कर संसार को अपनी वैज्ञानिक क्षमता का नमूना दिखा दिया था। ग्यारह साल पहले जब हिन्दुस्तान ने चंद्रयान-एक छोड़ा तो फिर किसी देश ने आंखें दिखाने का साहस नहीं किया।
लेकिन यह साराभाई का कमाल था कि अगले साल ही 21 नवंबर को केरल के थुंबा से दो रॉकेट छोड़कर देश ने अंतरिक्ष युग में प्रवेश कर लिया था। इन रॉकेटों के कलपुर्जे बैलगाड़ियों और साइकलों से ढोकर ले जाए गए थे। दो-चार देशों को छोड़ दें, तो ज्यादातर विकसित देशों के लिए अंतरिक्ष में प्रक्षेपण एक सपने जैसा था।
चार चांद तो तब लगे, जब बारह बरस के अथक परिश्रम के बाद अप्रैल 1975 में पहला उपग्रह आर्यभट्ट और जून 1979 में दूसरा उपग्रह भास्कर छोड़ा गया। इसके बाद 18 जुलाई 1980 को जब रोहिणी उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किया गया, तो सारे संसार में हिन्दुस्तान की अंतरिक्ष यात्रा के चर्चे थे। हालांकि विश्व के विकसित देशों की आंखों में भारत कांटे की तरह चुभने लगा था।
भारत के इतिहास में 18 अप्रैल 1984 का दिन कभी न भूलने वाला दिन है। उस दिन हिन्दुस्तान ने अंतरिक्ष में एक और छलांग लगाईं।स्कवाड्रन लीडर राकेश शर्मा देश के पहले अंतरिक्ष यात्री बने। जिस पल उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिराजी से अंतरिक्ष में बैठकर संवाद किया और कहा - सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा तो हर भारतीय की आंखों से खुशी और गर्व से के आंसू छलक पड़े थे।
इसके बाद हमने पीछे मुड़कर नहीं देखा। चंद्रयान के अलावा भारतीय मंगल मिशन को भी सारे संसार ने हैरत से देखा है। अनेक देशों के उपग्रहों को प्लेटफॉर्म देने वाला भारत आज अंतरराष्ट्रीय उपग्रह उद्योग की पहली कतार में है।