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Trade Deal: समझौते का आर्थिक पहलू, भारत के वस्त्र उद्योग को मिल सकते हैं अरबों डॉलर

Sat, 31 Jan 2026 07:42 AM IST
Anand Kumar आनंद कुमार
Updated Sat, 31 Jan 2026 07:42 AM IST
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सार
भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता भारत की विकास यात्रा में मील का पत्थर साबित होगा, जो निर्यात, रोजगार, निवेश और वैश्विक एकीकरण को बढ़ावा देगा।
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india eu trade deal economic side benefits for garment sector
भारत-ईयू एफटीए - फोटो : amarujala.com

विस्तार

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता आर्थिक दृष्टि से अत्यंत व्यापक है। इसके लागू होने के बाद लगभग दो अरब लोगों को समेटने वाला बाजार बनेगा, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करेगा। भारत के लिए यह इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह उसकी व्यापार नीति में एक गुणात्मक बदलाव का संकेत देता है। भारत के लगभग सभी निर्यातों पर यूरोपीय संघ में शुल्क या तो समाप्त हो जाएंगे या काफी कम हो जाएंगे, जबकि यूरोप के निर्यातों को भी चरणबद्ध तरीके से भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी।


भारत के लिए सबसे बड़े लाभ उन क्षेत्रों में दिखाई देते हैं, जो श्रम-प्रधान हैं और जिनमें रोजगार की व्यापक संभावनाएं हैं। वस्त्र और परिधान उद्योग इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। पहले यूरोपीय संघ में भारतीय वस्त्रों पर 12 प्रतिशत तक का शुल्क लगता था, जो अब पहले दिन से ही शून्य हो जाएगा। इससे भारत को उन देशों के मुकाबले प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी, जिन्हें पहले से तरजीही पहुंच प्राप्त थी, जैसे बांग्लादेश, वियतनाम और तुर्किये। यूरोपीय संघ का वस्त्र और परिधान बाजार 260 अरब डॉलर से अधिक का है, लेकिन उसमें भारत की हिस्सेदारी अब तक अपेक्षाकृत कम रही है। नए समझौते के बाद भारत को इस बाजार में अपनी मौजूदगी कई गुना बढ़ाने का अवसर मिलेगा। वस्त्र उद्योग भारत में लगभग साढ़े चार करोड़ लोगों को रोजगार देता है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और छोटे उद्यमों से जुड़े कामगार शामिल हैं।


तमिलनाडु के तिरुप्पुर से लेकर गुजरात के सूरत और उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प केंद्रों तक, इस समझौते का लाभ देश के सैकड़ों जिलों तक फैलेगा। यह उन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ाएगा, जहां रोजगार की सबसे अधिक जरूरत है और जहां निर्यात वृद्धि का सीधा असर आम लोगों की आय पर पड़ता है। वस्त्रों के अलावा चमड़ा, जूते-चप्पल, रत्न-आभूषण, रसायन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्र भी इस समझौते के बड़े लाभार्थी होंगे। यूरोपीय बाजार में शुल्क-मुक्त या कम-शुल्क पहुंच से भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता से राहत मिलेगी। साथ ही भारत ने अपने कृषि क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित की है। डेयरी, अनाज और पोल्ट्री जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है, जिससे घरेलू किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अचानक दबाव न पड़े।

यूरोपीय संघ के लिए भी यह समझौता रणनीतिक रूप से अहम है। ऑटोमोबाइल, ऑटो कंपोनेंट्स, वाइन और स्पिरिट्स जैसे क्षेत्रों में उसे भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी, हालांकि यह प्रक्रिया चरणबद्ध होगी। इससे भारतीय उद्योगों को प्रतिस्पर्धा के लिए समय मिलेगा। साथ ही यूरोप को एशिया में एक भरोसेमंद और लोकतांत्रिक साझेदार मिलेगा, जो चीन और अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता को संतुलित कर सकता है। संवेदनशील क्षेत्र जैसे कृषि (डेयरी, कुछ फसलें) और स्टील में सुरक्षा बरती गई है, इसलिए घरेलू उत्पादकों को बड़ा झटका नहीं लगेगा। हालांकि, आयात बढ़ने से कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, लेकिन कुल मिलाकर यह समझौता दोनों पक्षों के लिए लाभप्रद है।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऐसे समय में मुक्त व्यापार समझौता हुआ है, जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था अभूतपूर्व दबाव में है। ऐसे में यह समझौता आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक ठोस कदम तो है ही, एक रणनीतिक व राजनीतिक वक्तव्य भी है। यह समझौता भारत की आर्थिक विकास यात्रा में मील का पत्थर साबित होगा, जो निर्यात, रोजगार, निवेश और वैश्विक एकीकरण को बढ़ावा देगा।

 
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