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द्विपक्षीय संबंधों में ऐसा छलावा
Updated Thu, 14 Mar 2013 11:08 PM IST
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ऐसे रवैये पर देश का हक्का-बक्का रहना स्वाभाविक है। लेकिन इटली द्वारा भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोपी दो पोतरक्षकों को वापस भेजने से इंकार के बाद आम गुस्सा वहां की सरकार से ज्यादा अपनी सरकार से है। सामान्य तौर पर दोनों नौसैनिकों को इटली जाने की अनुमति दिए जाने का कोई कारण नहीं होना चाहिए था।
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जिस तरह सरकार ने इटली के दूतावास की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में दिए गए एक शपथ पत्र को ही वास्तविक इरादे का प्रमाण मानकर सहमति दी, वह समझ से परे है। हालांकि शालीन द्विपक्षीय संबंधों में ऐसे शपथ पत्र तो दूर, मौखिक वचन तक का महत्व होता है, किंतु यदि सामने वाले के अंदर कुटिलता हो, तो फिर वह लिखित वायदे से अपने बचाव का पेच निकाल लेता है।
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अब हम चाहे जितना गुस्सा प्रकट करें, दो भारतीय नागरिकों की हत्या के उन दोनों आरोपियों को भारत लाकर उन पर चल रहे मुकदमे की प्रक्रिया पूरी करने का विकल्प हमारे पास सीमित हो गया है।
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यह हर दृष्टि से असाधारण स्थिति है। इतालवी पोत एनरिका लैक्सी पर तैनात मासिमिलियानो और सल्वाटोर नाम के दो पोतरक्षकों ने 15 फरवरी, 2012 को केरल के दो मछुआरों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। उन नौसैनिकों का कहना है कि उन्होंने गलती से समुद्री डाकू समझकर गोली चलाई थी।
हालांकि केरल सरकार का मत इससे भिन्न है। किंतु भारत की खुली और स्वतंत्र न्याय प्रणाली में उन दोनों नौसैनिकों के साथ अन्याय होने का कोई कारण नहीं है। केरल उच्च न्यायालय ने क्रिसमस के दौरान भी इन दोनों नौसैनिकों को स्वदेश जाने की अनुमति दी थी। तब वे समय के पूर्व ही लौट आए थे। लेकिन अब इटली ने मतभेदों का हवाला देते हुए कहा है कि उसके दोनों पोतरक्षक भारत नहीं जाएंगे।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, इटली सरकार ने 11 मार्च की शाम एक नोट भेजा था, जिसमें कहा गया है कि भारत इस मामले का निपटारा समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र संधि, 1982 के अनुसार कूटनीतिक स्तर पर करे।
इटली ऐसा आग्रह छह मार्च को भी कर चुका था और विदेश मंत्रालय ने इसका जवाब नहीं दिया। यानी यह भारत सरकार के अंदर विचाराधीन है। ऐसे में इटली का यह रवैया हर दृष्टि से अनुचित है। क्या इटली यह समझता है कि वह ऐसा करके भारत को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में मामले के निपटारे के लिए बाध्य कर सकता है? निस्संदेह, इसमें क्षेत्राधिकार का मुद्दा अहम है।
संयुक्त राष्ट्र के समझौते के अनुसार, तटीय देश का समुद्र में क्षेत्राधिकार 12 नौटिकल मील होता है। इसके परे पोतों का संचालन केवल उस देश के कानून के तहत होता है, जिसका झंडा उस पर लगा रहता है। भारत का कहना है कि मछुआरों पर गोली चलाने की घटना 12 नौटिकल मील के भीतर हुई।
स्वाभाविक ही इसकी सुनवाई भारत में ही हो सकती है। इसके विपरीत इटली का कहना है कि चूंकि गोली चालन की घटना इटली के झंडे लगे पोत पर से हुई, इसलिए मुकदमा उसके न्यायालय में चलेगा। साफ है कि उसने अपने नागरिकों को यहां से निकालने का यह कुटिल रास्ता निकाला है।
तो क्या भारत अब इटली से टकराने पर विचार करेगा? हालांकि इसका उत्तर देना अभी कठिन है। वस्तुतः विदेशों से अपराधियों को वापस लाकर सजा दिलाने में हमारी सरकार का रिकॉर्ड अत्यंत खराब है। 1994 पुरुलिया हथियार कांड का आरोपी किम डेवी वापस इंग्लैंड जाकर आराम से रह रहा है, तो भोपाल गैस कांड के खलनायक एंडरसन और बोफोर्स कांड के ओत्तावियो क्वात्रोचि को हम भारत लाने में सफल नहीं हुए।
कुल मिलाकर, इस मामले में भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुनः अपनी छवि ऐसे नरम राज्य की बनाई है, जो विदेशियों द्वारा अपने नागरिकों की मौत के साथ भी न्याय करने में सक्षम नहीं है। उसे वस्तुतः इटली से सीखना चाहिए कि किस तरह कोई देश अपने नागरिकों की रक्षा में खड़ा होता है।
हमारे कई लाख मछुआरे समुद्र में नाव चलाते हैं। उनको सम्मान से अपना काम करने का अधिकार तथा सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। इस मामले से संकेत इसके विपरीत गया है।