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चीन की चुप्पी का मतलब, समझा रहे हैं प्रशांत दीक्षित

Tue, 22 Sep 2020 02:47 AM IST
prashant dikshit प्रशांत दीक्षित
Updated Tue, 22 Sep 2020 02:47 AM IST
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India China News : Prashant Dixit Is Explaining The Meaning Of Chinas Silence
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों सेना के बीच नजदीकी विवाद के बावजूद अब गतिरोध नजर आता है। लेकिन यह असहज करने वाली चुप्पी है। पैंगोंग त्सो के दक्षिणी किनारे की चोटियों पर भारतीय सैनिकों की कब्जे की पहल के बाद पीएलए की टुकड़ियां पीछे हट गईं। यह इसलिए हैरान करने वाली बात है, क्योंकि पीछे की तरफ टैंकों और हथियारों की उनकी मजबूत घेराबंदी थी।


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इससे ऐसा लगता है कि चीनी सैनिक टकराव को और तूल देना नहीं चाहते और वे वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे इलाके पर कब्जे से संतुष्ट हैं। हालांकि सच्चाई यह है कि हमारे इलाके पर कब्जा जमाकर उन्होंने वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति तो बदल ही दी है।

लेकिन मास्को में भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर के साथ बैठक में चीनी विदेश मंत्री ने मेल-मिलाप वाली मुद्रा में आने वाली सर्दी और उस दौरान होने वाली परेशानी की ओर इशारा किया। यानी चीनी सैन्य प्रतिष्ठान को यह मालूम है कि इन ऊंची चोटियों और प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच जीवित रहना एक बात है और एक दूसरे के खिलाफ युद्ध लड़ना बिल्कुल दूसरी बात।

जाहिर है, वे इस स्थिति के लिए तैयार नहीं थे। और उन्हें यह बात भी पता है कि भारतीय सेना को इसमें महारत हासिल है। ऐसे में, बातचीत का मुद्दा अब पूर्व स्थिति बहाल करने के बजाय मौजूदा तनाव को रोकने पर ही केंद्रित होगा। दरअसल चीनी सैनिकों की मंशा इंतजार करने और खुद को मौसम के अनुकूल ढालने की है, मौसम ही उनकी सबसे बड़ी दुश्मन है।

अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले की प्रतिक्रिया में चीन ने लद्दाख में अपने कुटिल इरादे को अंजाम देना शुरू किया। खासकर दिसंबर, 2019 में लोकसभा में इससे संबंधित बहस में गृह मंत्री ने कहा था कि पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर के हिस्से हैं, और 'इन्हें हासिल करने के लिए हम अपने जान की बाजी लगाने के लिए तैयार हैं।'

इसने चीन को इस कदम के लिए उकसाया। उसने अपना यह कुटिल अभियान मई, 2020 में लांच किया, जब शी जिनपिंग ने सेंट्रल मिलिटरी कमीशन के चेयरमैन के तौर पर पीएलए को 'युद्ध के लिए तैयार होने' को कहा। जिनपिंग की इस आक्रामकता के कई कारण बताए जाते हैं, जिनमें वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच काल्पनिक झड़प भी एक कारण है।

दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण कारण है यूरोप और अमेरिका में कोरोना महामारी का प्रकोप, जिसके लिए शी जिनपिंग को जिम्मेदार ठहराया गया। और चीन ने इससे बचने के लिए भारत से तनाव की आड़ ली। कोई भी इस पर यकीन करेगा कि परमाणु शक्तिसंपन्न चीन द्वारा परमाणु शक्तिसंपन्न भारत के खिलाफ सैन्य अभियान से कोरोना से निपटने के बीजिंग के रिकॉर्ड और दुनिया भर में संक्रमण फैलाने के कारण चीन की भूमिका की जांच के लिए उठती मांग ठंडी पड़ जाएगी।

सैन्य आक्रामकता के अलावा चीन भारत-विरोधी अभियान में अपने विद्वानों का भी मुखपत्र के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के प्रोफेसर दीपक ने चीनी लेखकों के भारत-विरोधी रवैये को रेखांकित किया है। वह कहते हैं, 'चीनी विद्वानों का मानना है कि भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास चीन का कुछ इलाका हड़प लिया है।

वे चीन को पीड़ित के रूप में दिखा रहे हैं, जिसने लगातार संयम का परिचय दिया है और जिसने कभी वास्तविक नियंत्रण रेखा नहीं लांघी। दूसरी ओर, भारत को उसकी कथित अति सक्रियता और लगातार सीमापार उकसावे के लिए दोषी ठहराया जा रहा है।

चाइना वेस्ट नॉर्मल यूनिवर्सिटी के लांग शिनचुआन, फुडान यूनिवर्सिटी के लिन मिन्वांग, शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के लिउ जोंग्यी समेत कई लोग ऐसी बात कह रहे हैं। ऐसे ही ट्रिगर ट्रेंड के एडिटर इन चीफ हुआंग हेंचनेग भारत के भेड़िये के तरह के स्वभाव और चीनी इलाके के प्रति भारत के लालच के बारे में बताते हैं। हालांकि आगे वह अपनी ही बात को काटते प्रतीत होते हैं, जब वह लिखते हैं कि तिब्बत पर जिसका भी नियंत्रण होगा, उसका पूरे उपमहाद्वीप पर नियंत्रण होगा।'

चीनी विमर्श में भारत द्वारा चीन की जमीन हड़पने की कपोल कल्पना पुरानी है। चीन के राजनीतिक वर्ग के अलावा वांग होंग्वेई, यांग गोंग्सु, वांग डेहुआ जैसे पुरानी पीढ़ी के बौद्धिक ऐसा प्रचार करते रहे हैं। समकालीन चीनी विद्वान भी उसी रुख का परिचय दे रहे हैं। प्रोफेसर दीपक कहते हैं, 'यद्यपि भारत के बारे में इन चीनी लेखन में धमकाने का भाव है, लेकिन वे इसकी भी वकालत करते हैं कि भारत से सीधे लड़ने के बजाय उसके चारों ओर के छोटे देशों को घेरने की रणनीति पर काम करना चाहिए।

चीन को छोटे देशों के साथ मिलकर बड़े देश को निशाना बनाने की रणनीति पर सोचना चाहिए। मसलन, नेपाल और पाकिस्तान के साथ रणनीतिक साझेदारी के जरिये चीन के प्रति भारत के कठोर रवैये से निपटा जा सकता है। दक्षिण एशिया में चीन इसी रणनीति पर काम कर रहा है। पर यह देखना शेष है कि इस क्षेत्र के देश पाकिस्तान की तरह चीन के पाले में आते हैं या नहीं।'

लेकिन चीन के संबंध में यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने यहां पैदा होने वाले किसी भी सत्ता-विरोधी आंदोलन को बीजिंग निर्ममता से कुचलने में यकीन रखता है। चीन की सत्ता एक तानाशाही सत्ता है, जो आर्थिक बहुलतावाद का दिखावा करती है। जर्मनी की एंजेला मर्केल की सरकार ने इसी कारण चीन को झटका देते हुए अपनी नीतियों में सिर्फ लोकतांत्रिक सरकारों से मजबूत साझेदारी निभाने की बात कही है।

भारत-प्रशांत रणनीति इसी सोच का नतीजा है, जिसकी प्रस्तावना जर्मनी ने की और जिसका भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और आसियान के सदस्यों ने अनुमोदन किया। इस नीति को और स्पष्ट करते हुए विगत दो सितंबर को जर्मन विदेश मंत्री हाइको मास ने कहा, 'हम एक ऐसी विश्व व्यवस्था चाहते हैं, जो ताकतवर द्वारा बनाए गए कानून के बजाय नियमों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित हो।'

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