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कूटनीति का रास्ता बंद हो जाने के बाद, बता रहे हैं प्रदीप कुमार

Thu, 06 Aug 2020 03:23 AM IST
pradeep kumar प्रदीप कुमार
Updated Thu, 06 Aug 2020 03:23 AM IST
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India China Faceoff, After the path of diplomacy is closed, Pradeep Kumar is telling What Next
भारत चीन गतिरोध - फोटो : iStock

भारत-चीन सीमा पर मई से पहले की स्थिति बहाल हो पाएगी? अर्थात चीन जहां-जहां घुस आया है, वहां से पीछे जाएगा? सीमा पर शांति कायम हो सकती है? और इस सबकी जड़ में जो सीमा विवाद है, वह कभी हल हो सकता है? इन प्रश्नों के असंदिग्ध उत्तर भारत में चीन के राजदूत सुन वीदांग के सार्वजनिक बयानों से निकलते हैं।


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सुन ने कहा कि सीमा पर दोनों पक्षों के सैनिक पीछे हट चुके हैं। भारत इसका अर्थ यह लगा रहा है कि चीन पैंगांग सो और डेपसांग इलाकों को पूरी तरह खाली नहीं करना चाहता। उत्तरी कमान के कमांडर ले.ज. वाईके जोशी की प्रतिक्रिया है, 'सीमा पर पहले की स्थिति बहाल करने के लिए हम हर कोशिश करते रहेंगे। देश की भौगोलिक अखंडता से कोई समझौता नहीं हो सकता।'

सुन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अब तक बरकरार झीने परदे को भी फाड़ कर फेंक दिया। उन्होंने कहा, 'चीन एलएसी के स्पष्टीकरण के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे नए विवाद पैदा हो सकते हैं। एलएसी के स्पष्टीकरण का बुनियादी मकसद सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता स्थापित करना है; जब हम इतिहास में देखते हैं, तो पाते हैं कि अगर कोई एक पक्ष वार्ता के दौरान एकतरफा बात कहे, तो नए विवाद पैदा होते हैं।

इसलिए यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती।' इस तरह चीन ने पिछली शताब्दी के छठे दशक से अब तक चली आ रही सीमा वार्ता के खात्मे का एलान कर दिया। अक्तूबर, 1962 में हमले के बाद भी चीन का रुख इतना कठोर नहीं था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शांति समझौते की कोशिशें हुई थीं।

अब देखते हैं, चीन कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के मार्ग को किस प्रकार अवरुद्ध करने की कुचेष्टा कर रहा है। जुलाई के अंतिम सप्ताह में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बयान में कहा,'भारत को विकास करना है, तो परंपरागत एहतियात छोड़कर अपने हितों को स्पष्ट करते हुए अधिक आत्मविश्वास प्राप्त करना पड़ेगा। भारत गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़ चुका है।

हम यह नहीं कह सकते कि हम खेल में शामिल हैं भी और नहीं भी। बहुत एहतियात और बहुपक्षीयता पर अधिक निर्भरता का युग समाप्त हो चुका है। जोखिम उठाने की जरूरत है। जोखिम उठाए बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।' प्रतिक्रिया में चीन ने कहा, 'हम उम्मीद करते हैं कि भारत स्वतंत्र विदेश नीति पर चलते हुए अंतरराष्ट्रीय मामलों में सकारात्मक भूमिका अदा करता रहेगा और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता में योगदान करेगा।'

चीन की धौंस-धमकी का मकसद बहुत साफ है। भारत से 'स्वतंत्र विदेश नीति' पर चलते रहने की अपेक्षा का अर्थ यह है कि हम अपने को कूटनीतिक मोर्चे पर निहत्था कर दें; अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम और अन्य क्षेत्रीय देशों से सामरिक संबंधों को आगे न बढ़ाएं और कुल मिलाकर विस्तारवाद और भारत की कूटनीतिक घेरेबंदी से प्रेरित चीन की दुरभिसंधियों का जवाब देने की सोचें भी नहीं। जयशंकर के दूरगामी महत्व के बयान के एक सप्ताह के भीतर चीन ने एक और तीर छोड़ा।

पाकिस्तान, नेपाल और अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों से बातचीत में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि ये चार देश सहयोग सुदृढ़ करते हुए बीआरआई (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) और सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) से संबंधित परियोजनाओं पर काम करते रहें। बीजिंग से संकेत मिले कि इन तीन दक्षिण एशियाई देशों के साथ स्थायी सहयोग तंत्र कायम करना चाहता है। भारत के खिलाफ एक और मोर्चा।

इतिहास की दो घटनाओं से पथ प्रशस्त होता है। नवंबर, 1962 में चीन की सेना लगातार आगे बढ़ रही थी। सैनिक, कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर भारत असहाय हो चुका था। 19 नवंबर को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी को पत्र लिखकर कहा, पूरी ब्रह्मपुत्र घाटी को गंभीर खतरा पैदा हो चुका है; अगर तुरंत कुछ नहीं किया गया तो असम, त्रिपुरा, मणिपुर और नगालैंड चीन के हाथ चले जाएंगे। इसी दिन कुछ घंटे बाद नेहरू ने केनेडी को एक और पत्र लिखा।

24 घंटे के अंदर चीन ने तवांग को खाली करते हुए एकतरफा युद्ध विराम घोषित कर दिया। 1971 में चीन के प्रधानंत्री चाउ एन लाई ने पाकिस्तान के फौजी शासक याहिया खान को भारत के खिलाफ हस्तक्षेप का भरोसा दिलाया था। चीन चुप रह गया, क्योंकि भारत से मैत्री संधि से बंधे सोवियत संघ ने चीन को हमले की धमकी दे दी थी।

आज की हालत यह है कि पश्चिमी सेक्टर में, जहां चीन ने 1950 से अब तक बड़ा इलाका हथिया रखा है, यथास्थिति स्थायी बनती दिख रही है, पश्चिम से लेकर पूर्वी सेक्टर में सेनाएं टकराव की मुद्रा में हैं। और चीन ने उत्तराखंड वाले मध्य सेक्टर को भी सक्रिय कर दिया है। नेपाल की माओवादी ओली सरकार तनाव बढ़ाने में उसका साथ दे रही है।

असैनिक विकल्प केवल यह है-चीन की शर्तों और उसके विस्तारवादी आचरण को भारत स्वीकार कर कूटनीतिक मोर्चे पर निष्क्रिय होकर अपनी सीमाओं में सिकुड़ कर बैठे। निष्कर्ष यह कि भारत चीन का स्वामित्व तसलीम कर ले, जैसे अतीत में चीन के सम्राट पड़ोसी देशों (भारत पर कभी नहीं) पर थोपा करते थे।

देश में सर्वानुमति है कि ऐसा कभी नहीं होने दिया जाएगा। चीन के इतिहास को ध्यान से पढ़ें, तो पाएंगे कि उसके सामरिक चिंतन में 'समग्र राष्ट्रीय शक्ति' का सदैव स्थान रहा है। शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद इस पर जोर बढ़ गया है।

स्वाभिमान का जीवन जीने के लिए भारत को भी इसी शक्ति का आह्वान करना पड़ेगा। आर्थिक धन, सैनिक शक्ति धन, अटूट सामाजिक सद्भाव- मुख्यतः इन तीन तत्वों से समग्र राष्ट्रीय शक्ति का जन्म होता है। चीन के मुकाबले हम इस मामले में कमजोर हैं। चीन 'सौ सालों के अपमान' को दिल में संजोए हुए है। हम सत्तर साल या इससे अधिक के अपमान को अपनी स्मृति में स्थायी स्थान दे सकते हैं।

भरोसेमंद शक्ति समीकरण बनाने में भारत को अपने समूचे तंत्र को झोंकना पड़ेगा। तब तक चीन के जंगखोर हुक्मरानों को पक्का एहसास कराते रहना चाहिए कि भारत के सामने युद्ध का कोई विकल्प नहीं होने पर असहनीय नुकसान उनका भी होगा और 'सौ साल की सफल दौड़' का उनका स्वप्न दिवा स्वप्न सिद्ध हो सकता है।

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