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चीन को मात: नारे नहीं, नीति चाहिए

Fri, 26 Jun 2020 08:09 AM IST
संजीव कुमार झा शंकर अय्यर, सीनियर फेलो, आईडीएफसी इंस्टीट्यूट
शंकर अय्यर, सीनियर फेलो, आईडीएफसी इंस्टीट्यूट Published by: संजीव कुमार झा Updated Fri, 26 Jun 2020 08:09 AM IST
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India china disputes, Instead of slogans only policy needs to beat China
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
भारतीय भारोत्तोलन महासंघ ने इस सप्ताह घोषणा की कि वह चीन निर्मित किसी भी उपकरण का उपयोग नहीं करेगा। पिछले वर्ष महासंघ ने एक चीनी कंपनी जेडकेसी को बारबेल और वेट प्लेट युक्त चार सेट का ऑर्डर दिया था। जबकि बारबेल और वेट के ये सेट भारत में भी निर्मित हो सकते हैं।

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इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या आयात किया जाता है, बल्कि यह भी कि क्यों किया जाता है! चीनी वस्तुओं का बहिष्कार और चीन से आयात पर रोक की मांग नई बात नहीं है। चीन जब भी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अपना असली रंग दिखाता है, छिटपुट तरीके से हर बार आक्रोश में ऐसी मांग उठती है। पर भावनाएं शीघ्र ही भाप की तरह उड़ जाती हैं और सब कुछ पहले की तरह चलने लगता है। वर्ष 2010 से 2020 के बीच चीनी घुसपैठ बहुत बार हुई, पर इस दौरान चीन से आयात 30 अरब डॉलर
से बढ़कर 70 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया।

वर्ष 1991 से 2020 के बीच मैन्यूफैक्चरिंग प्रतिस्पर्धा में सुधार के लिए अपने यहां कई कमेटियों व आयोगों का गठन किया गया तथा कई घोषणाएं की गईं। लेकिन उन घोषणाओं की असलियत को आंकड़ों से समझा जा सकता है। वर्ष 1998 में भारत ने चीन से नौ करोड़ डॉलर मूल्य की विद्युत मशीनरी का आयात किया।

वर्ष 2020 में यह आयात नौ अरब डॉलर और 2019 में 20 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यहां तर्क दिया जा सकता है कि बिजली के उपकरणों में प्रौद्योगिकी भी शामिल है, पर अन्य आयातों के बारे में क्या कहा जाए! वर्ष 1998 में भारत ने 3.90 लाख डॉलर मूल्य के फर्नीचर, गद्दे और विद्युत उपकरणों का चीन से आयात किया था, जो वर्ष 2019 में बढ़कर 90 करोड़ डॉलर को पार कर गया। चीनी मिट्टी और कांच के बने पदार्थों का आयात 30 वर्षों में  41 लाख डॉलर से बढ़कर 9.58 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया।

खराब नीतियों और अवसरों को गंवाने की कहानी दशकों पुरानी है। मेरी पुस्तक एक्सीडेंटल इंडिया यह बताती है कि राजनीति भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे विफल करती रही है। 1964 में जवाहरलाल नेहरू द्वारा नियुक्त होमी भाभा समिति ने 1962 के युद्ध के बाद भारतीयों की गणित में दक्षता को देखते हुए कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पर ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश की थी।

लेकिन अंध वैचारिकता में भारत ने आईबीएम जैसी बड़ी तकनीकी कंपनी को बाहर जाने को मजबूर कर दिया और अवसर चुक गया। दुनिया के सबसे बड़े चिप बाजार कोरिया, मलयेशिया, ताइवान और चीन में हैं। आज भारत सॉफ्टवेयर में अपने कौशल के लिए जाना जाता है, पर सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भी देश लगभग चुक गया है। 1991 के विदेशी विनिमय संकट तक कंप्यूटर और डाटा संचार के आयात पर हर तरह के प्रतिबंध से यह क्षेत्र ठप था।

शुरुआती चार दशकों तक आत्मनिर्भरता भारत की औद्योगिक नीति की आधारशिला थी। तब सरकारों ने इस धारणा के तहत काम किया कि आत्मनिर्भरता का मतलब है एक बंद अर्थव्यवस्था। उन्होंने विदेशी पूंजी, प्रौद्योगिकी और निवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। नतीजतन बहुत खराब औद्योगिकीकरण हुआ और विकास दर निम्न रही। उम्मीद जताई गई कि 1991 में लाइसेंस राज खत्म कर देने से बदलाव आएगा। वर्ष 1992 में भारत की जीडीपी 350 अरब डॉलर की और चीन की 390 अरब डॉलर की थी। पर तीन दशक बाद चीन की जीडीपी करीब 150 खरब डॉलर है और भारत की जीडीपी 27 खरब डॉलर है। इस अंतर को निर्यात प्रतिस्पर्धा से समझा जा सकता है। चीन दुनिया का शीर्ष निर्यातक है, जो 25 खरब डॉलर का माल निर्यात करता है।

ऐसा नहीं है कि भारत प्रतिस्पर्धी नहीं है। भारत का दोपहिया बाजार (टीवीएस, बजाज एवं हीरो) तीस से ज्यादा देशों में दोपहियों का निर्यात करता है। भारतीय कार संयंत्र दुनिया भर में कॉम्पैक्ट मॉडल के डिजाइन और लॉन्च के वैश्विक केंद्र हैं। भारतीय कपड़ा उद्योग के दिग्गज और मिल दुनिया भर के शीर्ष ब्रांडों को आपूर्ति करते हैं। कम लागत वाली इंजीनियरिंग ने भारतीय इंजीनियरिंग कंपनियों को वैश्विक कंपनियों में शीर्ष पर रखा है।

महामारी की स्थिति में आपूर्ति शृंखला पर विभिन्न देशों में पुनर्विचार ने एक अवसर पेश किया है। भारत निस्संदेह सबसे बड़ा उभरता हुआ घरेलू बाजार है और इसका लाभ उठाया जा सकता है। भारत को अभी 5जी सेवाओं का शुभारंभ करना है। यह सुनिश्चित करने के लिए एक नीति तैयार की जा सकती है कि उपकरण बनाने वाले संयंत्र और उपकरण नेटवर्क भारत में स्थित हों। जीवाश्म ईंधन से दूर जाने और इलेक्ट्रिक गतिशीलता की ओर आगे बढ़ने के लिए इसरो के पास उपलब्ध बैटरी टेक्नोलॉजी तथा ऑटो निर्माताओं के बीच तालमेल बैठाने की जरूरत है।

दवा उत्पादन सुविधाओं के लिए दुनिया के कई देश तैयारी कर रहे हैं। पर हमारे यहां सरकारी क्षेत्र की चार बड़ी दवा कंपनियां विनिवेश सूची में शामिल हैं। उन्हें विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के रूप में नामित किया जा सकता है और भारत तथा दुनिया की बड़ी कंपनियों को फार्मा सामग्री, ड्रग्स और टीके के उत्पादन का प्रस्ताव दिया जा सकता है। ऐसा औद्योगिक समूहों के विकास से हो

सकता है।

बदलाव के लिए उत्पादकता के कारकों को बाधाओं से मुक्त करना जरूरी है। औद्योगिकीकरण के प्रमुख कारक-भूमि और श्रम लगातार कानून और नियमों के उलझाव में फंसे रहते हैं। भूमि अधिग्रहण को राज्यों पर छोड़ दिया गया है, पर राज्य सरकारें मंजूरी राज की बाधाओं को हटाने के प्रति अनिच्छुक हैं। हालात को पर्यावरण की मंजूरी और भी जटिल बनाती हैं। सरकारी परियोजनाएं भी इस कारण अटकी हुई हैं। केंद्र द्वारा बनाया गया आदर्श श्रम कानून अप्रभावी है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी के कारण यहां परियोजनाओं की लागत चीन व अन्य पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं से दोगुनी है और बिजली की लागत भी ज्यादा है। 

सफलता प्रार्थना करने से नहीं मिलती और न ही आयात पर प्रतिबंध लगाने के लिए संघर्ष करने से। केवल नारे से अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। चीनी सामान पर प्रतिबंध लगाने के बजाय उन्हें भारतीय बाजार में अप्रासंगिक बनाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। चीन अपनी आर्थिक शक्ति के बल पर उभरा है। हमारा उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की प्रमुखता कम करना होना चाहिए।
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