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चिंता: डेमचोक में चीन की 'सलामी स्लाइसिंग' कर रही आशंकित,सीमा की वास्तविकता के बारे में देश को अवगत कराए सरकार
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भारत और चीन
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अमर उजाला
विस्तार
स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले यानी 14 अगस्त को भारत और चीन के बीच सीमा मुद्दों के समाधान के लिए 19वें दौर की सैन्य वार्ता हुई। उनके पास वास्तव में समाधान के लिए कुछ भी नहीं था। नतीजतन 'एक-दूसरे के प्रति भरोसा जताने और सैन्य झड़पों से बचने' पर ध्यान केंद्रित करने के अलावा इस वार्ता में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। ध्यान देने की बात है कि पिछले कुछ दौर की सैन्य वार्ता में यही हो रहा है।
वास्तविकता यह है कि भारतीय बलों ने अपने गश्त वाले क्षेत्र खो दिए हैं, दूसरी ओर, चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में काफी अंदर तक घुस आए हैं। देपसांग का मैदानी इलाका और डेमचोक जैसे विरासती मुद्दों पर बात नहीं हो रही है। डेमचोक में चीन की 'सलामी स्लाइसिंग' की रणनीति जहां आशंकित करती है, जिसके तहत छोटे-छोटे सैन्य ऑपरेशन चलाकर धीरे-धीरे किसी बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया जाता है, वहीं देपसांग रणनीतिक दृष्टि से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चीनी सेना ने वहां स्थायी संरचनाएं बनाई हैं, जहां उनके सैनिक रहते हैं। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि चीनी सेना ने भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण किया है, जैसा कि व्यापक रूप से भारतीय टिप्पणीकारों ने दावा किया है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा नापाक मंसूबा भी दिखाई दे रहा है। इसलिए इन इलाकों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है।
देपसांग मैदान भारत की सबसे ऊंची हवाई पट्टी दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) के करीब है। काराकोरम दर्रा डीबीओ के उत्तर पश्चिम में लगभग 17 से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से सटा हुआ है, और पीओके के उस हिस्से से सटा हुआ है, जिसमें शक्सगाम घाटी शामिल है, जिसे वर्ष 1963 में एक सीमा समझौते के जरिये पाकिस्तान ने गैरकानूनी तरीके से चीन को सौंप दिया था। पाकिस्तान और चीन के बीच मिलीभगत की शुरुआत दरअसल यहीं से हुई। वर्ष 1959 में जब चीनी नक्शों में पाकिस्तान के इलाकों को चीन में दिखाया गया, तब पाकिस्तान इस बात से चिंतित हो उठा था। वर्ष 1961 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस संबंध में चीन को एक औपचारिक पत्र भी लिखा, लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया। फिर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में चीन को सदस्य बनाए जाने के पक्ष में मतदान किया और बदले में चीन ने अपने विवादित नक्शे को जनवरी, 1962 में वापस लेने के साथ मार्च, 1962 में सीमा वार्ता में शामिल होने पर सहमति जताई। दोनों देशों के बीच 13 अक्तूबर, 1962 से वार्ता शुरू हुई, जिसके फलस्वरूप दो मार्च, 1963 को दोनों देशों के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। जब यह सब हो रहा था, तब भारत चीन द्वारा भारतीय सीमा पर छेड़े गए युद्ध में उलझा हुआ था। तब समझौते के तहत पाकिस्तान ने करीब 5,300 किलोमीटर क्षेत्र चीन को सौंप दिया, जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं था। ये भारतीय क्षेत्र थे। बदले में पाकिस्तान को वह क्षेत्र मिला, जिसे अब गिलगित-बाल्टिस्तान कहा जाता है।
गिलगित-बाल्टिस्तान जम्मू और कश्मीर की पूर्व रियासत का एक हिस्सा है, जो 'भारत का अभिन्न अंग' है। इस प्रकार एक दोहरी साजिश रचकर उसे अंजाम दिया गया। द अमेरिकन टाइम ने 1963 में इस मुद्दे पर रिपोर्टिंग करते हुए स्पष्ट लिखा था कि कश्मीर मुद्दे के समाधान की पाकिस्तान की उम्मीद धूमिल हो गई है, क्योंकि पाकिस्तान-चीन समझौते के तहत उत्तरी कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान के नियंत्रण को चीन ने मंजूरी दे दी है।
इस विस्तारवादी साजिश की असलियत तब सामने आई थी, जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में 27 जुलाई, 1949 को भारत-पाक सैन्य कमांडरों द्वारा हस्ताक्षरित कराची फैसले से एक नापाक निष्कर्ष निकालते हुए सियाचिन ग्लेशियर के लिए विदेशी पर्वतारोहण अभियानों को मंजूरी दी। समझौते के अनुसार, इस संघर्ष विराम रेखा पर सबसे उत्तरी सीमांकित बिंदु एनजे 9842 है, जहां से इसे उत्तर की ओर ग्लेशियरों की ओर जाना था। पाकिस्तान ने अंतिम बिंदु के रूप में इसकी अविश्वसनीय ढंग से व्याख्या की, जहां से वह कथित तौर पर काराकोरम दर्रे में शामिल हो रहा था और इससे जुड़े सभी क्षेत्र को अपना बता रहा था। जब यह धोखाधड़ी सामने आई, तब इंदिरा गांधी की सरकार ने सैन्य अभियान चलाया और चीन-पाकिस्तान की साजिश को नाकाम कर दिया। लेकिन भारत एक विस्तारवादी शत्रु के खिलाफ अपनी सतर्कता कम नहीं कर सकता है, जो देपसांग मैदानों से 30 किलोमीटर की दूरी पर दौलत बेग ओल्डी में भारतीय बेस पर नजर गड़ाए हुए है। यह एक रणनीतिक बढ़त है, जो उन्हें सीपीईसी के तहत बनाई जा रही सड़क तक पहुंच प्रदान करेगा, और जो पाकिस्तान द्वारा छोड़े गए, मगर भारत के दावे वाले क्षेत्रों से होकर गुजरती है। यही मुख्य वजह है कि भारत चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' योजना में शामिल नहीं हुआ।
चीनी शासन के अनुसार, उसके पूर्व प्रधानमंत्री झाउ एन लाइ ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि चीनी क्षेत्र काराकोरम दर्रे तक फैला हुआ है। ये दावे गैर-आधिकारिक और निजी तौर पर प्रकाशित मानचित्रों पर आधारित थे, जिन्हें शिन पाओ मानचित्र के रूप में जाना जाता है। वास्तव में, 1956 में ही चीन ने इन कार्यों के लिए समर्पित सर्वेक्षण एवं मानचित्रण ब्यूरो की स्थापना की थी। लेकिन शिन पाओ मानचित्रों का उपयोग सैन्य अभियानों में मंगोलों, उइगरों, कजाकों, ताजिकों और अन्य के क्षेत्रों पर कब्जा करने में किया गया था और वे बीजिंग शासन के आधिपत्य में थे। इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार के लिए बेहतर यही होगा कि वह बड़ी तस्वीर को ध्यान में रखते हुए चीनी गतिविधियों, रुख और दृष्टिकोण के संबंध में अपने निष्कर्षों का पुनर्मूल्यांकन करे और केवल एक राजनयिक उद्देश्य पूरा करने के लिए अपने क्षेत्रों की रक्षा करने से पीछे न हटे। सरकार को चीनी सीमा पर की वास्तविकता के बारे में देश को अवगत कराना चाहिए।