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परिदृश्य: चीन की दोहरी मुश्किलों का क्या भारत उठा सकता है कोई लाभ, पर कठिन है राह

Sat, 06 Jan 2024 07:37 AM IST
Jitendra Uttam जितेंद्र उत्तम
Updated Sat, 06 Jan 2024 07:37 AM IST
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सार
कई अर्थशास्त्री अब मानते हैं कि चीन बहुत धीमी वृद्धि के युग में प्रवेश कर रहा है, जो प्रतिकूल जनसांख्यिकी और अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ बढ़ते विवाद के कारण और भी बदतर हो गया है और जो उसके विदेशी निवेश व व्यापार को खतरे में डाल रहा है। भारत इस स्थिति का लाभ उठा सकता है।
 
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India can take advantage with china economic slowdown hit by unfavourable demographics and disputes with US
Xi Jinping - फोटो : Social Media

विस्तार

ताइवान में 13 जनवरी को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले, नए वर्ष के संबोधन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान को लेकर सख्त संदेश देते हुए कहा कि ताइवान को फिर से चीन के साथ एकीकृत किया जाएगा। इससे कुछ ही दिन पहले पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्थापक माओ त्से तुंग के जन्म की 130वीं वर्षगांठ के अवसर पर भी शी जिनपिंग ने दावा किया था कि चीन के साथ ताइवान का पुन: एकीकरण अपरिहार्य है। यह ताइवान में होने वाले महत्वपूर्ण चुनाव से पहले बीजिंग के दीर्घकालिक रुख पर बल देता है।



चीन 2.3 करोड़ की आबादी वाले स्व-शासित द्वीप ताइवान को अपने एक प्रांत के रूप में देखता है, जबकि ताइवान अपने संविधान और लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेताओं के साथ खुद को चीनी मुख्य भूमि से अलग मानता है। उधर ताइवान की राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने अपने नए साल के संबोधन में कहा कि चीन के साथ ताइवान के संबंध 'ताइवान के लोगों की इच्छा' से तय होने चाहिए। उनकी सरकार ने बार-बार चेतावनी दी है कि बीजिंग चुनाव में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है, जहां एक नया राष्ट्रपति और सरकार चुनी जाएगी।


असल में शी जिनपिंग का यह रुख चीन की हताशा को भी दर्शाता है, जो उसकी दोहरी चुनौतियों से उभरी है। चीन के समक्ष दो तरह की चुनौतियां हैं-आर्थिक मोर्चे पर मंदी और पश्चिमी देशों की घेरेबंदी। हाल के समय में इन चुनौतियों ने चीन के सावधानीपूर्वक निर्मित भव्य आख्यान को प्रभावी ढंग से प्रभावित किया है, जो चीनी क्षेत्र के उदय को महिमामंडित करता है। हालांकि यह मात्र प्रचार नहीं था, क्योंकि 1978 के बाद चीन में औसत वास्तविक विकास दर नौ फीसदी से ज्यादा देखी गई और कुछ चरम वर्षों में इसकी अर्थव्यवस्था 13 फीसदी के ज्यादा के दर से बढ़ी। इस सफलता ने एक गरीब कृषि संस्कृति वाले चीन को औद्योगिक दिग्गज राष्ट्र में बदल दिया। हालांकि तेजी से बदलते घटनाक्रम में चीन की अजेयता अतीत की बात लगने लगी है। कोविड-19 महामारी के प्रति इसकी शून्य सहिष्णुता और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बढ़ते तानाशाही रवैये ने चौतरफा आलोचना बटोरी है।

वर्ष 2023 के पहले तीन महीनों के मुकाबले दूसरी तिमाही में चीन की जीडीपी मात्र 0.8 फीसदी बढ़ी। चीन की अनुमानित वार्षिक विकास दर अब तीन फीसदी के करीब नजर आ रही है, जो पिछले तीन दशकों में सबसे कमजोर है। नए वर्ष की पूर्व संध्या पर जिनपिंग ने कहा कि कुछ उद्यमों (व्यवसायों) को कठिन समय का सामना करना पड़ा और कुछ लोगों को नौकरियां ढूंढने और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मुश्किल हुई। यह शीर्ष नेतृत्व द्वारा चीनी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली विपरीत स्थितियों की दुर्लभ स्वीकारोक्ति थी।

कई अर्थशास्त्री अब मानते हैं कि चीन बहुत धीमी वृद्धि के युग में प्रवेश कर रहा है, जो प्रतिकूल जनसांख्यिकी और अमेरिका व उसके सहयोगियों के साथ बढ़ते विवाद के कारण और भी बदतर हो गया है और जो उसके विदेशी निवेश तथा व्यापार को खतरे में डाल रहा है। विद्वान यह तय करने में लगे हैं कि चीन की मौजूदा आर्थिक समस्याएं अल्पकालिक हैं या संरचनात्मक। 40 खरब डॉलर के विशाल मुद्रा भंडार के साथ चीन अल्पकालिक समस्याओं से निपटने में सक्षम है। लेकिन बुजुर्ग होती आबादी, पश्चिमी बाजारों से अलगाव, स्थानीय मांग के बजाय अधिकांशतः निवेश आधारित आर्थिक विकास जैसे संरचनात्मक मुद्दे जल्द हल होने वाले नहीं हैं।

फिर भी, चीन को जल्दबाजी में खारिज करना गलती होगा। वैश्विक उतार-चढ़ाव को देखते हुए कई लोग अब भी मानते हैं कि सभी बाधाओं के बावजूद 21वीं सदी 'चीनी सदी' होने जा रही है। दोहरे अंकों की आर्थिक वृद्धि के सुनहरे दिनों ने चीनी शासक को महत्वाकांक्षी बीआरआई परियोजना शुरू करने की प्रेरणा दी। विकास के चकित कर देने वाले रिकॉर्ड से प्रभावित होकर चीन ने 'शांतिपूर्ण विकास' की परिकल्पना से बाहर निकल कर अधिक आक्रामक रुख अपना लिया, जिससे उच्च हिमालय से लेकर दक्षिण चीन सागर तक समस्याएं पैदा हो गईं।

बीजिंग की आक्रामकता ताइवान के एकीकरण के दावे के साथ ‘वन चाइना पॉलिसी’ के जबरन कार्यान्वयन में तब्दील हो गई। इसने चीन को अमेरिका के साथ विवाद में उलझा दिया, जो ताइवान की सुरक्षा की गारंटी का दावा करता है। चीन अमेरिकी वर्चस्व वाली उदार विश्व व्यवस्था को चुनौती देने के लिए तैयार है। उसने पश्चिम की रणनीतिक घेरेबंदी को तोड़ने के लिए रूस से हाथ मिलाया है। चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करने के लिए अमेरिका ने कई देशों को चीन-केंद्रित विश्व व्यवस्था की याद दिलाई है, जिसने कभी कोरिया और वियतनाम जैसे देशों को अर्ध संप्रभु स्थिति में रखा था। चीन की मौजूदा आक्रामकता को अतीत के गलत कार्यों के आलोक में देखने से हमें इस एशियाई दिग्गज की भावी कार्रवाई के संकेत मिलते हैं।

चीन में व्याप्त मौजूदा उथल-पुथल से भारत लाभ उठाने की स्थिति में है। चीन की दोहरी चुनौती के विपरीत भारत नई आर्थिक उड़ान के साथ-साथ पश्चिम द्वारा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रमुख खिलाड़ी की मान्यता पाने के संकेत देख रहा है। क्वाड का संस्थापक सदस्य होने के नाते भारत न केवल रूस से संबंध बनाए रखकर, बल्कि वाशिंग्टन की दबाव की रणनीति के खिलाफ रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है। जब चीन को अजेय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, तब भारत बढ़त हासिल करता दिख रहा है। दुनिया ने लोकतंत्र, जनसांख्यिकी और पूंजीवाद जैसे क्षेत्रों में चीन पर भारत की बढ़त पहचानी है। पश्चिम का मानना है कि स्थायी शक्ति संतुलन के लिए चीन के खिलाफ भारत को खड़ा करने की जरूरत है, जिसने भारत को इस क्षेत्र में एक अपरिहार्य शक्ति बना दिया है।

चीन के आक्रामक रवैये ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भारत को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है, जिसका उपयोग तेजी से और दृढ़ संकल्प के साथ किया जाना चाहिए। जनसांख्यिकी भारत के पक्ष में है, लेकिन बेरोजगार युवाओं की फौज को नियोजित करने के लिए गंभीर कोशिश करनी होगी। चीन का मुकाबला करने के लिए चीन से सीखना होगा। देश की बड़ी और युवा आबादी का लाभ उठाकर हम विनिर्माण के क्षेत्र में चीन की जगह ले सकते हैं।
(-लेखक पूर्वी एशियाई अध्ययन केंद्र, जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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