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और करीब आते भारत और अमेरिका

Wed, 14 Jan 2015 12:27 AM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Wed, 14 Jan 2015 12:27 AM IST
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India and US coming more close

जब बराक ओबामा भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में पहले अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर मुख्य अतिथि बनेंगे और चार महीने के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दूसरी बार शिखर वार्ता करेंगे, तो यह अपने आप में एक अनूठा रिकॉर्ड होगा। इससे उम्मीदें भी पैदा होती हैं। सबसे पहले, तो यह मोदी और ओबामा के बीच व्यक्तिगत तालमेल के संबंध में सकारात्मक संकेत देता है, जो सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र के संबंधों को लेकर वास्तविक ही प्रतीत होता है। अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत ललित मानसिंह का कहना है कि 'ऐसे रिश्ते आम तौर पर बनाए जाते हैं' और नेताओं द्वारा एक खास किस्म का संदेश देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

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इससे पता चलता है कि भारत और अमेरिका पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा नजदीक आए हैं और कई मुद्दों पर दोनों एकमत हैं। यह सच है, हाल के वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार में काफी वृद्धि हुई है और यह सौ अरब डॉलर को पार कर गया है। हालांकि अमेरिका और चीन के कारोबार की तुलना में अब भी यह एक चौथाई ही है। किसी भी गैर नाटो देशों की तुलना में भारत-अमेरिका के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास ज्यादा हो रहे हैं। तीस से ज्यादा क्षेत्रों, जिसमें कृषि, मौसम पूर्वानुमान, शिक्षा, स्वास्थ्य, आतंकवाद, साइबर अपराध से लेकर अंतरिक्ष कार्यक्रम तक शामिल हैं, में सहयोग बढ़ा है। यह बहुक्षेत्रीय, बहुआयामी सहयोग सामरिक साझेदारी का आधार है, जिसे अमेरिका में रिपब्लिकन एवं डेमोक्रेट, दोनों दलों का समर्थन हासिल है और भारत में भी लगभग इस पर राष्ट्रीय सहमति है। यह सहमति अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी तक जारी है।
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हाल ही में दिल्ली में एक कार्यक्रम में अमेरिका के पूर्व उप विदेश मंत्री निक बर्न्स ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि अपनी नीतियों के बावजूद भारत वैश्विक रूप से अलग-थलग नहीं है। उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका-चीन समझौता, भारत के रूस और ईरान के साथ संबंध आदि का हवाला दिया। भारत को अपने हित में कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए एक समय-सीमा निर्धारित करनी चाहिए, लेकिन उसे अमेरिका-चीन समझौते का अनुकरण करने की जरूरत नहीं है। रूस भारत का सबसे विश्वसनीय मित्र रहा है और हाल के वर्षों तक वह भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता था। भारत ने खुलेआम यूक्रेन में रूसी कार्रवाई का समर्थन नहीं किया है, लेकिन उसकी वैधानिक रणनीतिक चिंताओं को समझता है। भारत मानता है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के रवैये ने रूस को चीन को गले लगाने के लिए मजबूर किया है। भारत का ईरान के साथ संबंध ऐसा नहीं हो सकता, जो अमेरिकी नीतियों के अनुकूल हो। खासकर तब, जब वह भारत को सबसे ज्यादा कच्चे तेल की आपूर्ति करता है और खाड़ी देशों में उसका काफी प्रभाव है, जहां 60 लाख भारतीय काम करते हैं। भारत परमाणु संपन्न ईरान के पक्ष में नहीं है, मौजूदा अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता इस बात की सुबूत है कि भारत ने कूटनीतिक तौर पर ईरान को परमाणु कार्यक्रम रोकने के संकल्प पर हस्ताक्षर करने के लिए जोर डाला।
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जाहिर है, सभी अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भारत और अमेरिका एकमत नहीं हो सकते, खासकर तब, जब दोनों की स्थिति अलग हैः अमेरिका एक महाशक्ति देश है, हालांकि उसका वर्चस्व घट रहा है, जबकि भारत दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और तेजी से बढ़ती दूसरी अर्थव्यवस्था है। सौभाग्य से इनकी साझेदारी इतनी परिपक्व हो चुकी है, जहां दोनों पक्ष अपने मतभेदों पर खुलकर चर्चा कर सकते हैं और आपसी साझेदारी के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। अमेरिका के दोनों दलों में इस बात पर भरोसा बढ़ रहा है कि एक मजबूत, स्थिर और विकसित भारत अमेरिका के व्यापक हित में है। उसी तरह माना जाता है कि मोदी ने निष्कर्ष निकाला है कि अमेरिका के साथ घनिष्ठ रिश्ता उभरते भारत के उनके दृष्टिकोण पर अमल के लिए जरूरी है। दोनों पक्षों की यह व्यावहारिकता भारत-अमेरिकी संबंधों को गहरा करेगी। दोनों देश चीन के बढ़ते आर्थिक, भू-राजनीतिक, सैन्य वर्चस्व और बढ़ती आक्रामकता, जो कई पड़ोसी देशों की चिंता का कारण है, के बारे में वाकिफ हैं। चीन के साथ सक्रिय भागीदारी, प्रतिस्पर्धा और सहयोग की नीति को भारत और अमेरिका, दोनों का समर्थन प्राप्त है।

भारत और अमेरिका, दोनों को अपनी शिकायतों को परे रखकर ओबामा-मोदी की दूसरी शिखर वार्ता में कुछ बड़े समझौते करने चाहिए। भारत में रक्षा उन्नयन का काफी काम बाकी है, इसलिए रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की जरूरत है, पर संयुक्त शोध और उत्पादन का काम नहीं हो रहा है। द्विपक्षीय निवेश समझौता दोनों पक्षों की कई चिंताओं का समाधान कर सकता है। ऊर्जा, स्वच्छ ऊर्जा, बाजार में व्यापक पहुंच, उच्च प्रौद्योगिकी, आतंकवाद पर ज्यादा एकजुटता आदि पर भारत को काफी उम्मीदें हैं। परमाणु उत्तरदायित्व कानून, बौद्धिक संपत्ति अधिकार, व्यापार एवं कर व्यवस्था, लालफीताशाही, श्रम कानून आदि ऐसे मुद्दे हैं, जिनकी अपेक्षा अमेरिका को भारत से है।


बेशक भूमि अधिग्रहण एवं पेंशन से संबंधित ताजा अध्यादेश सकारात्मक संदेश दे सकता है, लेकिन वाइब्रैंट गुजरात सम्मेलन में मोदी ने, उम्मीद के मुताबिक पारदर्शी और पक्षपात रहित माहौल बनाकर और केंद्र व राज्य स्तर पर मंजूरी के लिए एकल खिड़की खोलकर भारत को व्यवसाय के लिए आसान जगह बनाने का जो संकल्प जताया, उसे जरूर पूरा करना चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो अमेरिकी और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां बड़ी तादाद में आएंगी और भारत के आर्थिक विकास में लंबी छलांग लगाने में मदद करेंगी।

-पूर्व राजदूत एवं इंडो-अमेरिकन फ्रेंडशिप एसोसिएशन के अध्यक्ष

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