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भारत-चीन के बीच पिघलती नहीं दिख रही है बर्फ, बता रहे हैं हर्ष कक्कड़

Thu, 15 Oct 2020 05:20 AM IST
हर्ष कक्कड़ हर्ष कक्कड़
हर्ष कक्कड़ Published by: हर्ष कक्कड़ Updated Thu, 15 Oct 2020 05:20 AM IST
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India and China talk not progressed read Harsh Kakkar article
भारत चीन गतिरोध - फोटो : iStock

भारत और चीन के कोर कमांडरों के बीच सोमवार को सातवें दौर की बातचीत हुई। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि दोनों पक्षों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गतिरोध को लेकर गहन और रचनात्मक विचार-विमर्श हुआ। दोनों पक्ष सैन्य और कूटनीतिक चैनल के माध्यम से संवाद और संचार बनाए रखने पर सहमत हुए हैं और जल्द से जल्द गतिरोध खत्म करने के लिए पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान तक पहुंचेंगे। लगभग इसी तरह का बयान सैन्य वार्ता और भारत-चीन सीमा विवाद पर परामर्श एवं समन्वय कार्यतंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) की अंतिम दौर की बैठक के बाद जारी किया गया था। स्पष्ट कहें, तो कई स्तरों की बातचीत के बावजूद मौजूदा गतिरोध को हल करने पर दोनों देशों के बीच कोई प्रगति नहीं हुई है।


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जो भी इस पर नजर रख रहा होगा, वह समझ सकता है कि मौजूदा स्तर की बातचीत का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि दोनों पक्षों के नजरिये में भारी अंतर है। चीनी कैलाश रिज की ऊंचाइयों से भारतीय सैनिकों वापसी की शुरुआत की मांग कर रहे हैं, जिस पर अगस्त के अंत में कब्जा किया गया था। चीनियों का मानना है कि कैलाश रिज पर भारतीय जवानों का कब्जा एलएसी के पार है, जबकि भारत का कहना है कि यह एलएसी के भीतर ही है। भारत नार्थ बैंक और डेपसांग पर चीनी सैनिकों की तैनाती को भारतीय क्षेत्र मानता है, जबकि चीन इसे अपने अधिकार क्षेत्र में मानता है। भारतीय सैनिक डेपसांग और हॉट स्प्रिंग्स सहित पूर्वी लद्दाख में फैले समग्र क्षेत्रों से चीनी सैनिकों की वापसी की मांग करता है, जबकि चीन पहले केवल पैंगोंग त्सो को हल करना चाहता है।

भारत इस बात पर जोर देता है कि जिस देश ने पहले प्रवेश किया, वही पहले वापसी का कदम उठाएगा, जबकि चीन चहता है कि पहले भारतीय सैनिक अपने स्थान पर वापस लौटें। चीन सैन्य बलों के बीच दूरी बनाए रखते हुए गतिरोध खत्म करना चाहता है, जबकि भारत तनाव खत्म करना और यथास्थिति को बहाल करना चाहता है। लेकिन चीन की तरफ से नई-नई आपत्तियां उठाई जा रही हैं। 44 सीमा सड़क परियोजनाओं के उद्घाटन के बाद बीजिंग ने ताजा आपत्ति जताई, जिसमें चीन द्वारा लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश की मान्यता के प्रति अनिच्छा भी शामिल है और वे मानते हैं कि इस क्षेत्र में भारत द्वारा किया गया बुनियादी ढांचे का विकास पिछले समझौते की भावनाओं के खिलाफ है।

चीन जानता है कि ये आपत्तियां निरर्थक हैं, क्योंकि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश की मान्यता देने के प्रति उसकी अनिच्छा के बावजूद भारत के साथ उसकी बातचीत जारी रहेगी, और भारत बुनियादी ढांचे का विकास नहीं रोकेगा, क्योंकि ये भारतीय सीमा में बने रहेंगे। इसके अलावा, बुनियादी ढांचे का उद्देश्य उस क्षेत्र के लोगों की सहायता करना भी है, जबकि चीन उन्हें
क्षेत्र में भारतीय आक्रामक शक्ति बढ़ाने का ही साधन मानता है। सैन्य वार्ता केवल राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने का साधन है। ताजा वार्ता में चीन ने गतिरोध खत्म करने के लिए नया प्रस्ताव दिया है, जिसका अध्ययन भारत के चाइना स्टडी ग्रुप द्वारा किया जाएगा और इसका जवाब हॉटलाइन के जरिये दिया जाएगा। ऐसी संभावना है कि इस प्रस्ताव में दोनों पक्षों के सैनिकों की वापसी की बात है, इसलिए इसे खारिज कर दिया जाएगा, क्योंकि इसका मतलब तो यह होगा कि भारत अपने ही क्षेत्र से पीछे हटे। इसी तरह भारत के प्रस्तावों का बीजिंग में अध्ययन किया जाएगा। ये बातचीत के अगले दौर का आधार बनेंगे।

मौजूदा दौर की वार्ता से प्रगति की कोई उम्मीद नहीं थी और इसलिए कोई आश्चर्य नहीं हुआ। अलग-अलग विचार और दोनों पक्षों के अपनी जिद पर अड़े रहने के कारण जल्दी समाधान की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। अच्छी बात यह है कि दोनों देश संघर्ष बढ़ाने के बजाय बातचीत कर रहे हैं। दूसरी बात यह है कि सर्दियां शुरू होने से पहले सैनिकों की वापसी की कोई संभावना नहीं है, और दोनों देश सर्दियों तक इस क्षेत्र में उच्च सैन्य बल की तैनाती बनाए रखेंगे। जाहिर है, परस्पर भरोसे की कमी है। चीन भारतीय सेना पर दबाव बनाकर खुद को एशिया में सबसे शक्तिशाली दिखाना चाहता था। वह भारत को चेताना चाहता था कि कूटनीतिक, आर्थिक अथवा सैन्य रूप से चीन के हितों के खिलाफ कदम उठाने से वह सीमा पर 1962 जैसी युद्ध की स्थिति आमंत्रित कर सकता है। 

उसने अमेरिका को यह संदेश देने की कोशिश की कि भारत चीन के खिलाफ अपनी सीमाओं की रक्षा करने में असमर्थ है, इसलिए वह इस क्षेत्र में उसका उपयुक्त साझेदार बनने योग्य नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद इससे भारत-अमेरिकी संबंधों पर असर पड़ सकता है, जहां नई सरकार द्वारा भारत-प्रशांत क्षेत्र में अपने गठबंधनों की समीक्षा करने की उम्मीद है।

यदि भारत ने चीनी घुसपैठ का जवाब नहीं दिया होता, तो भारतीय सशस्त्र बलों की क्षमता सवालों के घेरे में आ जाती। लेकिन गलवां घाटी के संघर्ष और कैलाश रिज पर कब्जे की ठोस कार्रवाई ने परिदृश्य को बदल दिया। कैलाश रिज पर कब्जा भारत को चीनी शिविरों पर वर्चस्व, मौजूदा तैनाती और चुशुल घाटी में प्रवेश में सक्षम बनाता है। तथ्य यह है कि अभी चीन के पास इस क्षेत्र में तैनाती बनाए रखने या आक्रामक मुद्दा अपनाने के विकल्प सीमित हो गए हैं, जो इस बात का संकेत है कि उसकी योजनाएं गड़बड़ा गई हैं।

चीनियों के लिए यह पहला अवसर होगा कि वे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को लद्दाख में तैनात रखेंगे। दशकों से सर्दियां शुरू होने पर पीएलए मुख्यभूमि में लौट जाते रहे हैं और सीमा सुरक्षा रेजिमेंट एवं मिलिशिया को एलएसी की रक्षा के लिए छोड़ जाते हैं। ऐसे में पीएलए की यह जबरन तैनाती भारत की एक छोटी-सी जीत है। सर्दियों के दौरान सैन्य स्तर की वार्ता जारी रहेगी, जबकि मौसम की प्रतिकूलताओं से जूझते हुए सैनिक दुश्मन की गतिविधियों पर भी नजर रखेंगे। 

संभव है कि सैन्य और डब्ल्यूएमसीसी वार्ता का स्तर देशों के बीच मतभेदों को कम करेगा और अंतिम समाधान के लिए राजनीतिक स्तर पर वार्ता के लिए स्थितियां पैदा करेगा। ऐसी भी आशंका है कि दोनों देशों के नजरिये में भारी अंतर के चलते एलएसी दूसरा एलओसी न बन जाए और कोई संघर्ष भी भड़क सकता है। फिलहाल तो हमें समाधान का इंतजार करना चाहिए और बर्फीली चोटी पर तैनात अपने सैनिकों का समर्थन करना चाहिए।

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