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विश्व जनमत से हमारी मुलाकात: विदेश में भारतीय शिष्टमंडलों को मिली सफलता, समर्थन और सम्मान इसके प्रमाण
Mon, 16 Jun 2025 06:20 AM IST
ज्योति भास्कर
डॉ. निशिकांत दुबे, भाजपा सांसद और संचार एवं आईटी समिति के अध्यक्ष
डॉ. निशिकांत दुबे, भाजपा सांसद और संचार एवं आईटी समिति के अध्यक्ष
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 16 Jun 2025 06:20 AM IST
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सऊदी में निशिकांत दुबे और सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल अन्य नेता
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
सूचना युद्ध के इस दौर में हमने अपना कर्तव्य समझा कि हम पूरी दुनिया को पहलगाम में पािकस्तान प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा की गई भयानक और बर्बर हत्याओं की सच्चाई और वास्तविकताओं से अवगत कराएं। इसी के अनुरूप भारत सरकार ने भाजपा, कांग्रेस, एआईएमआईएम, डीएमके, बीजेडी, शिवसेना और अन्य दलों के 59 सांसदों वाले सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भेजने का फैसला किया। प्रतिनिधिमंडल ने 32 देशों की यात्रा की, जिसमें विश्व नेताओं, नीति निर्माताओं, मीडिया, थिंक टैंक और प्रवासी भारतीयों के साथ बैठकें और रणनीतिक बैठकें कीं।
यह बहुदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल द्वारा भारत के रुख को एक स्वर में प्रस्तुत करने के लिए राज्य के नेताओं के साथ सम्मेलन आयोजित करने का पहला उदाहरण था। इसमें पांच धर्मों (हिंदू, सिख, बौद्ध, मुस्लिम व ईसाई) के सदस्य शामिल थे, जिन्होंने राज्य प्रायोजित अपराधों के खिलाफ भारत के स्वयं के बचाव के अधिकार की वकालत की। वाशिंगटन डीसी में प्रतिनिधिमंडल ने आतंकवाद का मुकाबला करने और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ व्यापक चर्चा की। ब्रुसेल्स में, भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद के समूह ने बेल्जियम के चैंबर ऑफ डेप्युटीज के अध्यक्ष पीटर डी रूवर से मुलाकात की, जिन्होंने भारत के साथ मजबूत एकजुटता व्यक्त की।
कुवैत में, हमारे मिशन ने एक ‘दीवानिया’ या अनौपचारिक बातचीत का आयोजन किया था, जहां प्रतिनिधिमंडल को पूर्व उप प्रधानमंत्री, चार पूर्व मंत्रियों, खाड़ी सहयोग परिषद के पूर्व महासचिव और कुवैत के तीन प्रमुख समाचार पत्रों के वरिष्ठ संपादकों सहित 40 से अधिक शीर्ष कुवैतियों के साथ बातचीत करने का अवसर मिला। उनका आतिथ्य पश्चिम एशिया में एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को मान्यता देता है, जिसमें हमारे पड़ोसी द्वारा राज्य प्रायोजित आतंकवाद के शिकार के रूप में भारत की स्थिति के लिए बढ़ता समर्थन भी शामिल है।
अन्य प्रतिनिधिमंडलों ने ब्राजील में सीनेट की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष सीनेटर नेल्सिन्हो ट्रैड से मुलाकात की। ब्रिटेन में टीम ने कंजर्वेटिव पार्टी के सह-अध्यक्ष लैंस्टन के लॉर्ड डोमिनिक जॉनसन और अन्य वरिष्ठ सांसदों के साथ मुलाकात की। स्पेन, मलयेशिया, लाइबेरिया और अन्य देशों के नेताओं के साथ इन उच्चस्तरीय बातचीत ने भारत की कूटनीतिक भागीदारी की व्यापकता और आतंकवाद के खिलाफ इसके दृढ़ रुख के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन को प्रदर्शित किया। पश्चिम एशियाई देशों-सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन व अल्जीरिया-ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल को उदार राजनयिक शिष्टाचार प्रदान किया। प्रतिनिधिमंडल को चार आधिकारिक लंच और डिनर की मेजबानी दी गई, जो न केवल प्रोटोकॉल का संकेत था, बल्कि भारत के प्रति क्षेत्र के गहरे सम्मान और हमारे संदेश को जिस गंभीरता से प्राप्त किया गया, उसका प्रदर्शन भी था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव पर स्थानीय अधिकारियों ने भारत और कुवैत के बीच व्यापार व मौद्रिक संबंधों को प्रदर्शित करने वाली एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। बहुत कम लोगों को याद होगा कि 1947 से 1962 तक कुवैत और बहरीन में भारतीय रुपया वैध मुद्रा के रूप में काम करता था। यह हमारे देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक और आर्थिक संबंधों का प्रतीक था। इस प्रयास को मीडिया व कूटनीतिक हलकों ने सराहा और भारत को एक स्थिर व विश्वसनीय शक्ति के रूप में दर्शाया गया। सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन और अल्जीरिया की अपनी यात्रा के दौरान, हम वास्तविक सच्चाई को प्रस्तुत कर पाए कि यह दो देशों के बीच संघर्ष नहीं है, बल्कि आतंकवाद की आड़ में काम कर रहे पाकिस्तानी सेना के तत्वों द्वारा भारतीय लोगों पर सीधा हमला है। इसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय नेताओं के बीच तत्काल स्वीकृति और प्रतिक्रिया प्राप्त हुई। कुवैत पर इराकी आक्रमण या यमन में हूतियों द्वारा सऊदी अरब में उग्रवाद की धमकियों जैसे संघर्ष और उग्रवाद के पीड़ितों के कड़वे अनुभव के साथ, ये देश, सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई के बारे में अच्छी तरह समझ सकते हैं।
कुवैत और सऊदी अरब में बैजयंत पांडा के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने याद दिलाया कि कैसे 2008 के मुंबई हमलों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 2009 में शर्म अल-शेख में अपने पाकिस्तानी समकक्ष से मुलाकात की और एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए, जिसमें भारत और पाकिस्तान को आतंकवाद के परस्पर पीड़ित के रूप में बताया गया-बिना आईएसआई या पाकिस्तानी सेना का नाम लिए। प्रतिनिधिमंडल ने यह स्पष्ट किया कि राज्य प्रायोजित आतंकवाद के सामने समझौतापूर्ण कूटनीति केवल हमलावर को बढ़ावा देती है। हमारे सदस्य असदुद्दीन ओवैसी ने समझाया कि कैसे पाकिस्तान के मौजूदा सेना प्रमुख और पूर्व आईएसआई प्रमुख जनरल आसिम मुनीर इस आतंकवादी नेटवर्क की प्रतीकात्मक कड़ी हैं। उन्होंने पाकिस्तान के 2018 से 2022 तक एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में रहने और फिर भी विदेशी सहायता प्राप्त करने पर सवाल उठाया। पाकिस्तान अपनी गरीबी को कम करने के लिए मिलने वाली अरबों डॉलर की अंतरराष्ट्रीय सहायता को व्यवस्थित रूप से प्रॉक्सी समूहों को प्रायोजित करने और भारत विरोधी आतंकी ढांचे को मजबूत करने में लगा रहा है।
हमारे प्रतिनिधिमंडल ने यह गलतफहमी दूर की कि सिर्फ मुस्लिम बहुल देश ही फलस्तीनियों को लेकर चिंतित हैं। हमने बताया कि भारत हमेशा से दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है, जिससे इस्राइल और फलस्तीन, दोनों को सुरक्षित और स्वतंत्र भविष्य मिल सके। साथ ही, हमने बताया कि आज फलस्तीनियों की दुर्दशा दुखद रूप से हमास से जुड़ी हुई है, जो एक आतंकवादी संगठन है, जिसने गाजा में शासन पर कब्जा कर लिया है।
यह देखकर हर्ष हुआ कि हमारे सऊदी समकक्षों ने भारत के दृष्टिकोण के साथ उल्लेखनीय सामंजस्य दिखाया। जब पहलगाम में हमला हुआ, तब प्रधानमंत्री मोदी सऊदी अरब में थे और प्रतिनिधिमंडल को लगा कि वे उनके द्वारा शुरू की गई कूटनीतिक गति को आगे बढ़ा रहे हैं। सऊदी थिंक टैंकों ने पहलगाम हमले को केवल आतंकवाद नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सेना व आईएसआई द्वारा समर्थित एक संगठित सैन्य ऑपरेशन के रूप में परिभाषित किया, इसे ‘राज्य समर्थित विषम युद्ध’ कहा गया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि 32 देशों में सात बहुपक्षीय प्रतिनिधिमंडलों ने दिखाया कि एकता हमारी रक्षा की पहली पंक्ति है। हमारे प्रतिनिधिमंडलों ने एक शक्तिशाली संदेश दिया : भारत राज्य प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ सैन्य और कूटनीतिक रूप से कार्रवाई कर सकता है और करेगा। (साथ में हर्षवर्धन शृंगला, आईएफएस एवं पूर्व विदेश सचिव)