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निवेश, नवाचार और नीति: एआई की वैश्विक दौड़ में भारत की दावेदारी, दर्शक नहीं निर्णायक खिलाड़ी

Tue, 17 Feb 2026 06:51 AM IST
अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Tue, 17 Feb 2026 06:51 AM IST
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सार
यह पहला अवसर है, जब वैश्विक दक्षिण का कोई देश एआई शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। भारत का संदेश साफ है कि वह एआई की दौड़ में सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय दावेदार बनना चाहता है।
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एआई शिखर सम्मेलन - फोटो : ANI

विस्तार

राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित भारत एआई इंपैक्ट सम्मेलन, जिसमें दुनिया भर के नेता, तकनीकी दिग्गज और नवोन्मेषक शामिल हुए हैं, ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता की वैश्विक दौड़ में सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय दावेदार बनना चाहता है। इससे पहले यह आयोजन ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और पेरिस में हुआ है। इस लिहाज से देखें, तो यह पहला अवसर है, जब वैश्विक दक्षिण का कोई देश इस सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। दिल्ली सम्मेलन इस मायने में भी अहम है कि यह पहली बार है, जब चर्चा का फोकस एआई के खतरों पर न होकर, इसके फायदों को सामान्य लोगों तक पहुंचाने पर है। पांच दिनों तक चलने वाला यह सम्मेलन एआई के क्षेत्र में सहयोग का एक साझा रोडमैप तैयार करने का उद्देश्य भी रखता है। जहां तक सवाल भारत का है, तो वह वैश्विक एआई परिदृश्य में एक भरोसेमंद ताकत बनना चाहता है। हालांकि, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी टूल की ताजा रिपोर्ट में अमेरिका व चीन के बाद भारत तीसरे पायदान पर है, लेकिन फिलहाल वह शीर्ष दोनों देशों से काफी पीछे है। दरअसल, ये आंकड़ों पर आधारित संभावनाएं ही हैं, जिनकी वजह से आज दुनिया भारत से उम्मीदें लगा रही है। भारत में दस करोड़ साप्ताहिक सक्रिय एआई उपयोगकर्ता हैं और इस मामले में वह अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। यही वजह है कि तकनीकी दिग्गज कंपनियां भारत में निवेश को लेकर उत्साहित दिख रही हैं। अमेजन ने 2030 तक 35 अरब डॉलर से अधिक, माइक्रोसॉफ्ट ने चार वर्ष में 17.5 अरब डॉलर, तो गूगल ने 15 अरब डॉलर के निवेश की घोषणाएं की हैं। दरअसल, भारत की डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी संरचना और डिजिटल निजी डाटा संरक्षण अधिनियम के बाद नियामक स्थिरता ने निवेशकों को आश्वस्त किया है। यह देखते हुए कि तकरीबन 90 फीसदी एआई पेटेंट अमेरिका, यूरोप या चीन के होते हैं, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि एआई के लोकतंत्रीकरण के लिए भारत का आगे रहना जरूरी है। हालांकि यह भी सच है कि चैटजीपीटी और जैमिनी जैसे बुनियादी एआई मॉडल के निर्माण में फिलहाल भारत पिछड़ता दिख रहा है। इसके अतिरिक्त, शोध व विकास पर भारत अपने बजट का सिर्फ 0.65 फीसदी ही खर्च कर रहा है, जो चीन से काफी कम है। देश के डाटा सेंटर की क्षमता भी अभी वैश्विक मानकों से कम है। सैम आल्टमैन यह जरूर कह रहे हैं कि एआई भारत के और भारत एआई के भविष्य को निर्धारित करने के लिए अहम है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सम्मेलन के विमर्श सिर्फ घोषणाओं तक सीमित न रहें, बल्कि ठोस नीतिगत बदलाव और क्रियान्वयन का मार्ग भी प्रशस्त हो।
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