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अफगान नीति: लोकतंत्र को महत्व देता है भारत, काबुल में तालिबान को नहीं कोई तरजीह

Fri, 22 Dec 2023 07:31 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 22 Dec 2023 07:31 AM IST
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सार
भारत की अफगान नीति लोकतंत्र को महत्व देने के उसके रवैये का सबूत है। काबुल में चुनी हुई सरकार के साथ भारत के रिश्ते गर्मजोशी भरे रहते हैं, लेकिन तालिबान के साथ राजनयिक संबंधों को वह कभी महत्व नहीं देता।
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India Afghanistan policy based on democratic values Indian Govt not giving any preference to Taliban
Afghan Parliament building - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारत की अफगानिस्तान नीति को मैं बहुत ध्यान से देखती हूं, क्योंकि ये दोनों ही देश हमारे पड़ोसी हैं, और इन दोनों के आपसी संबंधों का असर पाकिस्तान पर भी कमोबेश पड़ता है। मेरे विचार से भारत की काबुल नीति बेहद चतुर और जमीनी है। अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों के साथ भारत बेहद सौहार्दपूर्ण संबंध रखता है, जैसे कि उसके पूर्व अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई से थे, जो भारत और पाकिस्तान, दोनों जगह रह चुके थे। ऐसे ही वाशिंगटन से आकर अफगान राष्ट्रपति का ओहदा संभालने वाले अशरफ गनी के साथ भी भारत के बेहद अच्छे रिश्ते थे। गनी ने तो भारत और अफगानिस्तान के बीच सीधे व्यापारिक संपर्क के लिए पाकिस्तान पर जमीनी मार्ग खोलने का दबाव भी बनाया था।



लेकिन जब भी तालिबान ने काबुल में सरकार बनाई, ऐसा दो बार हो चुका है, भारत कूटनीतिक रूप से पीछे हट गया। ऐसे में, स्थिति पर बारीक नजर तो उसने रखी, लेकिन कूटनीतिक संबंध स्थापित करने की उसने जरा भी इच्छा नहीं जताई। मुझे याद है, वर्ष 2015 में जब अशरफ गनी सत्ता में थे, तब भारत ने अफगानिस्तान के संसद भवन के निर्माण में योगदान कर काबुल को लोकतंत्र से संबंधित एक प्रतीकात्मक उपहार दिया था। उस संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां थे। तब मैंने वरिष्ठ भारतीय कूटनीतिज्ञ जेपी सिंह को बधाई दी थी, जो तब इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में पदस्थापित थे। जेपी सिंह वही व्यक्ति हैं, जिन पर भारतीय कमांडर कुलभूषण जाधव की मां और बीवी के बेहद मुश्किल भरे पाकिस्तान दौरे में देखभाल की जिम्मेदारी थी।


जाहिर है, भारत द्वारा अफगानिस्तान में संसद भवन के निर्माण का दायित्व संभालना दोतरफा रिश्तों में एक असाधारण कदम था, खासकर तब, जब युद्धजर्जर अफगानिस्तान को संसदीय लोकतंत्र का अनुभव बहुत कम है। लोकतंत्र के उस शानदार उपहार को, जिसमें मुगल व आधुनिक स्थापत्य के तत्व हैं तथा जिसकी पहचान एशिया के सबसे लंबे गुंबद के रूप में है, आज उसके हाल पर छोड़ दिया गया है, क्योंकि अफगानिस्तान की सत्ता पर आज जिनका शासन है, वे चुनावी लोकतंत्र में यकीन ही नहीं करते।

संसद से याद आया कि हाल ही में भारतीय संसद में सुरक्षा चूक की एक घटना हुई। इससे पहले वर्ष 2001 में भी पांच सशस्त्र आतंकवादी भारतीय संसद के दरवाजे तक पहुंच गए थे। लेकिन सशस्त्र बलों ने बहादुरी का परिचय देते हुए आतंकियों को मार गिराया था। उसमें दिल्ली पुलिस के छह जवान, संसदीय सुरक्षा से जुड़े दो लोग और एक माली शहीद हुए थे। भारतीय संसद पर आतंकी हमले की वह घटना बेहद निंदनीय थी। उस हमले के बाद मैंने इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायुक्त कैप्टन गोपालस्वामी पार्थसारथी से मुलाकात की थी। वह क्षोभ और गुस्से से भरे हुए थे और कह रहे थे कि लोगों को यह समझना चाहिए कि हमारी संसद पर हुआ हमला हमारी मातृभूमि पर हमले की तरह है। संसद पर हमले के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक रिश्ता बुरी तरह प्रभावित हुआ, और दोनों ही देशों के उच्चायुक्तों को वापस बुला लिया गया था।

पिछले कुछ दशकों में एक पत्रकार के तौर पर इस्लामाबाद में मैंने कई भारतीय उच्चायुक्तों से मुलाकात और बातचीत की। भारत ने हमेशा ही अपने काबिल राजनयिकों को उच्चायुक्त के तौर पर पाकिस्तान भेजा, जिनमें से कई विदेश सचिव भी हुए। पाकिस्तान में काम करने वाले अपने भारतीय पत्रकार मित्रों से मैं गाहे-बगाहे मजाक भी कर लेती थी कि इस्लामाबाद में पदस्थापित कौन भारतीय उच्चायुक्त विदेश सचिव बनेंगे, और किनके न बनने के आसार हैं। आश्चर्यजनक रूप से मेरे अनुमान ज्यादतर सही साबित हुए। कैप्टन गोपालस्वामी पार्थसारथी के बारे में पूछे जाने पर मैंने कहा था कि उनके विदेश सचिव बनने की संभावना नहीं है। उसकी वजह भी थी। वर्ष 2001  में भारत-पाकिस्तान के राजनयिक रिश्ते खराब होने से पहले इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में आमंत्रित किए गए पाकिस्तानी पत्रकारों के साथ उनका संवाद अपेक्षित नहीं था।

यहीं पर मुझे एक दूसरे भारतीय उच्चायुक्त टीसीए राघवन की याद आती है। उनके समय में ही मुंबई में भीषण आतंकवादी हमला हुआ था। वह इतनी बर्बर, जघन्य और निंदनीय घटना थी कि जब मुंबई हमले के मुख्य दोषी अजमल कसाब को पकड़ा गया, तब पाकिस्तान में न तो उसके मां-बाप ने या दूसरे किसी ने उसे रिहा करने की वकालत की। जब कसाब को उसके जुर्म के लिए फांसी दी गई, तब पाकिस्तान में लोगों ने राहत की सांस ली। मुंबई में हुआ आतंकवादी हमला इसलिए भी बहुत भीषण था, क्योंकि उसमें सैकड़ों निर्दोष भारतीय और कुछ विदेशी नागरिक भी मारे गए थे। लेकिन टीसीए राघवन की तारीफ करनी होगी कि इतने जघन्य हमले पर स्तब्ध रह जाने के बावजूद इस्लामाबाद में उच्चायुक्त की जिम्मेदारी का पालन उन्होंने गरिमा के साथ किया। ऐसे अवसरों पर राजनयिकों की जिम्मेदारी कठिन हो जाती है। और ऐसे ही अवसरों पर उनकी काबिलियत की परीक्षा भी होती है। हम पत्रकारों ने मुंबई हमले की कड़ी आलोचना की थी। मुझे याद है कि भारतीय उच्चायोग द्वारा पत्रकारों के सम्मान में आयोजित एक डिनर पार्टी में टीसीए राघवन ने कहा था, 'इस आतंकी हमले को आसानी से नहीं भुलाया जा सकता। उसमें लंबा समय लगेगा।' वह बिल्कुल सही थे।

टीसीए राघवन के साथ हम पत्रकारों के अनेक सुखद और दिलचस्प अनुभव भी थे। जब मौजूदा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काबुल से सीधे इस्लामाबाद आ रहे थे, तब राघवन समेत पूरे उच्चायोग को इस बारे में मालूम नहीं था। नरेंद्र मोदी दरअसल तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मरियम नवाज की बेटी की शादी की बधाई देने के लिए आ रहे थे। चूंकि वह रविवार का दिन था, और पहले से कुछ पता नहीं था, लिहाजा भारतीय प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए हवाई अड्डे पर पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती बहुत प्रयासों के बाद की जा सकी। अचानक पता चलने पर उच्चायुक्त राघवन ने अपनी कार में पेट्रोल भरवाया और पूरी रफ्तार से कार लाहौर ले जाने का निर्देश दिया। चूंकि वह समय पर लाहौर हवाई अड्डे पर पहुंचकर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत नहीं कर सकते थे, इसलिए वह जट्टी उमरा स्थित नवाज शरीफ के घर की तरफ जा रहे थे। भारतीय संसद की सुरक्षा में हुई चूक के ताजा मामले के संदर्भ में इससे मिलती-जुलती घटनाओं की याद आना स्वाभाविक ही है। 

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