भारत-अफगानिस्तान दोस्ती की धुरी

अविनाश पालीवाल Updated Fri, 23 Dec 2016 07:18 PM IST
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भारत-अफगानिस्तान दोस्ती
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भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते की प्रगाढ़ता का प्रदर्शन इसी महीने की शुरुआत में अमृतसर में हुए छठे हार्ट ऑफ एशिया कॉन्फ्रेंस में देखने को मिला था। नई दिल्ली और काबुल ने अफगान केंद्रित हक्कानी नेटवर्क और भारत में सक्रिय लश्करे-तैयबा और जैशे मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को पनाह देने के लिए पाकिस्तान की आलोचना की और इस्लामाबाद को अलग-थलग करने में इस मंच का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। दोनों देशों ने पाकिस्तान को नजरंदाज कर हवाई कार्गो गलियारा की संभावना पर भी बात की। इसकी जरूरत इसलिए है, क्योंकि पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत को एक-दूसरे के बाजार तक पहुंच बनाने में अड़ंगा डालता है।
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यदि भारत के नीति-नियंता 2014 में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के पाकिस्तान की ओर तथाकथित 'झुकाव' को लेकर चिंतित थे, तो 2016 में उनके रुख में आए बदलाव से खुश हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी वर्ष जून में इंडिया-अफगानिस्तान फ्रेंडशिप डेम का उद्घाटन किया था। अगस्त में अफगान नेतृत्व ने बलूचिस्तान और गिलगित तथा पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार हनन को लेकर दिए गए मोदी के बयान का समर्थन किया था। इसके अलावा अफगानिस्तान ने इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क बैठक का भी बहिष्कार किया था और उड़ी में हुए आतंकी हमले के जवाब में नियंत्रण रेखा के पार जाकर की गई भारत की सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन किया था।
अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए ये संकेतक भारत-अफगानिस्तान की मित्रता की दमदार तस्वीर पेश करते हैं। हालांकि ऐतिहासिक कारणों से इस धुरी को हल्के में नहीं लेना चाहिए, बावजूद इसके कि अफगानिस्तान का झुकाव पाकिस्तान की ओर होता रहा है। तार्किक रूप से शांति, स्थिरता और विकास के लिए भारत और अफगानिस्तान के पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते आवश्यक हैं। इतिहास दिखाता है कि अफगानिस्तान और भारत, दोनों ने ही पाकिस्तान के साथ मतभेदों को दूर करने की, चाहे कम ही मौके क्यों न रहे हों, कोशिश की है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत का अफगानिस्तान से रिश्ता ऐसी घटनाओं से भरा हुआ है, जब दोनों देशों ने या तो पाकिस्तान की संप्रभुता और भौगोलिक एकता को प्रभावित करने की कोशिश की या ऐसा महसूस किया गया। इस संदर्भ में 1960 और 1970 के दशक की दो घटनाओं का जिक्र किया जा सकता है।
पहली घटना, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में नई दिल्ली के दृष्टिकोण में अफगानिस्तान की प्रतिक्रिया ठंडी और संदिग्ध थी। लाहौर पर तकरीबन कब्जा कर लेने के बाद भारत ने कूटनीतिक रूप से पाकिस्तान को बलूच, पख्तूनिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की बहसों में चुनौती दी थी। युद्ध के दौरान कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेताओं ने सरकार पर पख्तून और बलूच अलगाववादियों को समर्थन देने के लिए दबाव बनाया था। बादशाह खान के साथ काबुल में उच्च स्तरीय बैठक के बाद तत्कालीन विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह ने सीमांत गांधी को संसद के संयुक्त सत्र में पख्तूनिस्तान के लिए उनके संघर्ष के बारे में बताने के लिए आमंत्रित किया था, जिस पर उन्हें दूसरी पार्टियों का भी समर्थन मिला। पख्तूनिस्तान पर भारत के आक्रमक रुख ने अफगानिस्तान में भारी बेचैनी पैदा कर दी थी। हालांकि अफगान जनमानस जहां भारत के पक्ष में था, वहीं लाहौर पर हुए हमले से अफगान किंग जहीर शाह हतोत्साहित हो गए थे। तनी हुई रस्सी पर चलते हुए उन्होंने भारी मशक्कत के साथ तटस्थता अपनाई।

दूसरी घटना, 1971 की है, जब युद्ध में पाकिस्तान को पराजित करने के बावजूद भारतीय नेतृत्व ने पाकिस्तान के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई करने का अफगानिस्तान का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। 1973 में अफगानिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री दाऊद खान ने एक रक्तहीन क्रांति में जहीर शाह को बेदखल कर दिया था। पाकिस्तान विरोधी और पख्तूनिस्तान समर्थक खान ने नवंबर, 1974 में पाकिस्तान की सीमा पर फौज के जमावड़े के आदेश दिए। भारतीय नेतृत्व यों तो अफगानिस्तान का समर्थन कर रहा था, लेकिन उसे पाकिस्तान के और विभाजन को लेकर चिंता हुई और उसने बलूच और पख्तून आंदोलन को 1971 के युद्ध के समय से दिया जा रहा गुप्त समर्थन वापस ले लिया।

इसके बाद भारत ने देखा कि किस तरह से पाकिस्तान ने काबुल विरोधी अफगान उग्रवादियों को आईएसआई के दिशा-निर्देश में पनाह दी और फलन-फूलने का मौका दिया। इनमें जमाते इस्लामी के अहमद शाह मसूद और बुरहानुद्दीन रब्बानी तथा हिज्ब-ए इस्लाम के गुलबुद्दीन हिकमतयार शामिल थे। दिलचस्प है कि इनमें से कई किरदार और संगठन आज अफगानिस्तान में सक्रिय हैं। आने वाले दशकों में भारत और अफगानिस्तान के पाकिस्तान के साथ रिश्ते उतार-चढ़ाव के साथ कई मोड़ से होकर गुजरे। परिस्थितियां चाहे कुछ भी रही हों, काबुल पर भारत का प्रभाव और नई दिल्ली के लिए अफगानिस्तान के सामरिक महत्व की एक सीमा रही है। दोनों देशों के बीच की मौजूदा प्रगाढ़ता की वजह यह है कि दोनों के हित ऐसे समय साथ हैं, जब पाकिस्तान अपने इन दोनों पड़ोसियों से एक साथ विमुख हो चुका है। 2014 में गनी पाकिस्तान के ठीक उसी तरह से करीब जा रहे थे, जैसे 2000 में करजई ऐसा कर रहे थे और दोनों ही समय भारतीय नीति-नियंता इसलिए परेशान नहीं थे कि अफगानिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व नौसिखया है और पाकिस्तान के मंसूबों से वाकिफ नहीं है, बल्कि इसलिए कि यह उस भू-राजनीतिक द्वंद्व का नतीजा है, जिसे आसानी से भुला दिया गया है।

पाकिस्तान के अपने पड़ोसियों से तालमेल को लेकर अदूरदर्शिता दिखाने और उग्रवादी गुटों को अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करने के कारण भारत-अफगानिस्तान 'धुरी' मजबूत हो रही है, यह ऐसा परिदृश्य है, जिसका 1990 के दशक में वह विरोध कर रहा था।

-लेखक, किंग्स कॉलेज लंदन के डिफेंस स्टडीज से संबद्ध हैं
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