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कट्टर इस्लाम का बढ़ता खतरा

Tue, 14 Mar 2017 07:33 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Tue, 14 Mar 2017 07:33 AM IST
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Increasing threat of extrimist islam
तवलीन सिंह

चुनावों का मौसम न होता, तो हो सकता है कि सैफुल्लाह के बारे में हम पत्रकारों ने थोड़ी खोजी पत्रकारिता करके कुछ जानकारी और इकट्ठा करने की कोशिश की होती। यह जानकारी अब भी जरूरी है, क्योंकि पुलिस सूत्रों के मुताबिक, लखनऊ में जो मुठभेड़ पिछले सप्ताह हुई, वह भारत के दरवाजे पर आईएस की पहली दस्तक थी। सैफुल्लाह अगर पुलिस मुठभेड़ को अखबारों की सुर्खियों में देखना चाहता था, तो उसने गलत समय चुना, क्योंकि उसी दिन आईएस के कथित खोरासान मॉडयूल ने काबुल के एक अस्पताल पर भी हमला किया था।

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सैफुल्लाह की मौत के बाद टीवी पर चली चर्चा में जब खोरासान मॉडयूल का जिक्र आया, तो जाने-माने रक्षा विशेषज्ञों ने पुलिस का मजाक उड़ाया। कुछ ऐसे थे, जिन्होंने कहा कि पुलिस बिना सबूत के सैफुल्लाह का नाम आईएस से जोड़ रही है, जबकि कुछ ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने कहा कि आईएस में इस नाम का कोई दस्ता है ही नहीं। जबकि आईएस ने कई बार कहा है कि भारत उनके निशाने पर है, क्योंकि वहां के हिंदुओं ने मुस्लिमों पर बहुत जुल्म ढाए हैं।
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समस्या यह है कि यह बात यदि हमारे देश में कोई खुलकर कहे, तो उस पर फौरन हिंदुत्ववादी होने का बिल्ला लग जाता है। सैफुल्लाह जिस दिन मारा गया, मैंने उस दिन एक टीवी पत्रकार को यह कहते सुना कि सैफुल्लाह जैसे युवक शायद घर वापसी और लव जेहाद को देखकर आतंकवादी बने हैं। ऐसी ही बातें मैंने तब सुनी थीं, जब बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद दंगे हुए थे। सारा दोष हिंदुओं पर डाला गया।
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हमारे रक्षा विशेषज्ञ सच का सामना कब करेंगे? वे कब मानेंगे कि इस्लाम में कट्टरता का जहर इतना फैल चुका है कि शायद ही कोई गैर-मुस्लिम देश बचा है, जहां मुसलमानों का स्वागत किया जाता है? मुस्लिम कौम को जितनी सुरक्षा भारत में हासिल है, उतनी किसी दूसरे गैर-मुस्लिम देश में नहीं है।  फिर भी जब कोई जेहादी आतंकवाद की घटना सामने आती है, तो राजनेता और बुद्धिजीवी कहते हैं कि आतंकवाद का मजहब से कोई वास्ता नहीं है और कुछ गुमराह युवकों के कारण इस्लाम को बदनाम करना गलत है। बेरोजगारी न होती, गुुरबत न होती, तो जिहादी आतंकवाद भी न होता।

सच यह है कि आईएस जैसा आतंकी संगठन एक विचारधारा का डरावना प्रतीक है। पिछले कुछ दशकों से इस्लाम में ऐसी खराबी आ गई है कि जिन देशों में इस्लाम का अति उदार रूप दिखता था, वहां भी कट्टरपंथी इस्लाम पहुंच गया है। इंडोनेशिया और मलयेशिया जैसे देशों में 9/11 से पहले हिजाब और बुर्के मुश्किल से दिखते थे। पर आज अगर वहां कोई औरत बेहिजाब दिखे, तो आश्चर्य होता है। भारत में भी ऐसा होने लगा। लेकिन हमारे सेक्यूलर राजनेताओं को अपनी धर्मनिरपेक्षता पर इतना गर्व है कि उन्होंने बढ़ती जेहादी संस्थाओं की तरफ देखा तक नहीं, उन पर पाबंदियां लगाना तो दूर की बात। आज भी वे आईएस का नाम लेने से कतराते हैं।


ऐसा होता रहा, तो वह दिन दूर नहीं है, जब आईएस का प्रभाव देश भर में दिखने लगेगा। हमारे पड़ोस में एक भी देश नहीं है, जो इस जहरीली विचारधारा के फैलते प्रभाव से बच सका है। ऐसे में हम कैसे बच पाएंगे, जब तक हम इसका खुलकर विरोध करने को तैयार नहीं हैं? आईएस की  विचारधारा के मुताबिक, न केवल बुतपरस्त लोग, बल्कि वे मुसलमान भी काफिर हैं, जो सूफियाना  इस्लाम से प्रभावित हो चुके हैं। भारतीय इस्लाम पूरी तरह से सूफियाना है।

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