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सड़कों पर बढ़ता दबाव

Subhash Chandra Kushwaha सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Thu, 12 Mar 2020 08:10 AM IST
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Increasing pressure on roads
- फोटो : अमर उजाला

हमारे यहां विगत दो-दशकों में हाई-वे के स्वरूप को बेहतर बनाने के प्रयास हुए हैं। कुछ बड़े हाई-वे बनकर तैयार भी हुए, जिनमें 2,369 किलोमीटर का सबसे बड़ा राजमार्ग वाराणसी से कन्याकुमारी तक बना है। लगभग 230 राष्ट्रीय मार्गों के नेटवर्क से देश में सड़क परिवहन को गति मिली है। 21वीं सदी के प्रारंभ में स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना, जो 2009 तक कार्यरूप में आ गई थी। इन प्रयासों से लगा कि हमारी सड़क परिवहन सुविधाएं जल्द ही विश्व स्तर की हो जाएंगी। कुछ सुधार हुआ भी, मगर यह स्थायी नहीं रहा। इन परियोजनाओं के पूरे हुए एक दशक ही बीता है कि उचित और दूरदृष्टि के अभाव में सड़कें तंग होने लगी हैं। ऐसा क्यों हुआ, इस पर विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्गों को बार-बार चौड़ा नहीं किया जा सकता। इनमें खर्च के अलावा पर्यावरण का नुकसान भी होता है।


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हमारी नई सड़क नीति में माल ढुलाई के लिए सड़क परिवहन को ज्यादा निर्भर बना दिया गया है। माल वाहनों का आवागमन यात्री वाहनों के साथ समायोजित किया गया है। दोनों के लिए अलग-अलग सड़कें नहीं बनी हैं। इससे जहां सड़क दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ती है, वहीं यातायात बाधित होता है। विगत एक दशक में सड़कों पर बड़े कंटेनरों की आवाजाही में दो सौ प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। मल्टी एक्सल भारी वाहनों ने सिंगल एक्सल भारी वाहनों को सड़कों से बाहर कर दिया। बड़ी गाड़ियों की आवाजाही से एक दशक पहले बनी सड़कें भी आज तंग होती जा रही हैं। हमने आनेवाले समय के हिसाब से वाहन क्रांति का अध्ययन नहीं किया था और ज्यादातर राष्ट्रीय राजमार्गों को अधिकतम चार लेन में तैयार किया था। इसके अलावा हमने सड़कों को केवल लेन में बदलने पर जोर दिया, वाहनों के ठहराव तथा चालकों-परिचालकों के विश्राम स्थलों को सड़क से अलग विकसित करने के बारे में समुचित नीति नहीं बनाई। इस कारण चालकों ने हाई-वे पर ही वाहन खड़े करने शुरू किए। जगह-जगह अनियंत्रित ढाबे खुल गए, जिन्होंने सड़कों के बाहरी लेन को निगलना शुरू कर दिया। सड़क दुर्घटना में वृद्धि इसके दुष्परिणाम के रूप में सामने आई। हमारे राजमार्गों को बाजारों से मुक्त भी नहीं किया गया। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों, बैलगाड़ियों के लिए हाई-वे से भिन्न अलग लेन बनाने की जरूरत अभी तक नहीं समझी गई है।

राष्ट्रीय राजमार्गों की निगरानी की कोई व्यवस्था प्रभावी नहीं है। डिवाइडर तोड़ने, उस पर बोर्ड लगाने, गोबर जमा करने या ढाबों के विज्ञापन लगाने आदि की प्रवृत्ति देखी जा रही है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने अपने पूरे मार्गों पर सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाए हैं। हाई-वे पुलिस की संख्या न के बराबर है। उन्हें प्रशिक्षित करने तथा सड़क परिवहन व सड़क प्रयोगकर्ताओं को सहूलियत देने के लिए तैयार करने की जरूरत है। अगर हमने सड़क संस्कृति को सुधारने की दिशा में प्रयास नहीं किया, तो सड़कों पर अराजकता बढ़ेगी।

अनियंत्रित आबादी, वाहन क्रांति और उद्योग-धंधों के विस्तार से सड़कों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, केवल उत्तर प्रदेश में 6,000 से ज्यादा धार्मिक स्थल सड़क मार्ग को अतिक्रमण कर बनाए गए हैं। अतिक्रमण से अवरुद्ध होती सड़कें कई तरह की समस्याओं को जन्म देती हैं। गाड़ियों के रुक-रुककर चलने से ईंधन व्यय और प्रदूषण बढ़ता है, तो जाम की वजह से समय की बर्बादी होती है।

 

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