विज्ञापन

कृषि आय बढ़ने से बढ़ेगी ग्रामीण मांग

devendr sharmaदेविंदर शर्मा Updated Tue, 21 Jan 2020 05:57 AM IST
विज्ञापन
खेती
खेती - फोटो : a
ख़बर सुनें
तीन ऐसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं, जो उम्मीद है कि आगामी एक फरवरी को बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के आर्थिक उपायों की सूची को आकार देंगे। खासकर ऐसे समय में, जब देश को आर्थिक मंदी से बाहर निकालने की चुनौती है, सही दिशा में कुछ सुधारात्मक कदम निश्चित रूप से विकास के रुके हुए पहिये को वापस पटरी पर ला सकते हैं।
विज्ञापन
कुछ महीने पहले मीडिया में बताया गया था कि पांच रुपये के बिस्कुट का पैकेट खरीदने से पहले लोग दो बार सोचते हैं। उसके बाद राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की उपभोक्ता खर्च सर्वे रिपोर्ट आई, जिसका निष्कर्ष था कि ग्रामीण गरीबों की क्रयशक्ति घट रही है, हालांकि बाद में सरकार ने उसे हटा दिया। उसमें बताया गया था कि गांवों के गरीब भोजन खरीदने के लिए मात्र 19 रुपये खर्च करने में ही सक्षम हैं। और हाल ही में, खुद नीति आयोग ने कुछ हफ्ते पहले जारी सामाजिक विकास लक्ष्य सूचकांक-2019 की एक रिपोर्ट स्वीकार की, जिसमें बताया गया है कि 22 से 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गरीबी, भूख और असमानता बढ़ी है।

इन तीन रिपोर्टों को एक साथ रखकर अगर ऐसे उपाय सोचे जाएं, जिससे गरीबों के हाथ में ज्यादा पैसे पहुंचे, तो यही अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाएगा। ज्यादा मांग पैदा करने के लिए मुख्यधारा के अर्थशास्त्री यही सुझाव दे रहे हैं। ज्यादातर अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि समस्या मांग को लेकर है, जिसका मतलब यह है कि जब तक गरीब दो बार सोचे बिना पांच रुपये का बिस्कुट नहीं खरीद सकता और जब तक ग्रामीण खेत और गैर-कृषि मजदूरों की आमदनी नहीं बढ़ती है, जो काफी हद तक कृषि के पुनरुद्धार पर निर्भर है, तब तक मांग पैदा नहीं हो सकती। कृषि आय 15 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है और कृषि मजदूरी पिछले पांच वर्षों से घटती जा रही है, इसलिए ग्रामीण खर्च घटता जा रहा है, जिससे ग्रामीण मांग में कमी आ रही है।

दूसरे शब्दों में कहें, तो चूंकि कृषि कार्य में लगभग 50 फीसदी आबादी संलग्न है और इसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फिर से सक्रिय करने की क्षमता है, इसलिए वित्त मंत्री का ध्यान किसानों के  हाथ में अधिक आय देने पर होना चाहिए।

इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना में वृद्धि से होनी चाहिए। पिछले बजट में पहले से किए गए 75,000 करोड़ रुपये के वित्तीय आवंटन को जोड़ते हुए इस योजना के लिए 1.50 लाख करोड़ का एक और प्रावधान किए जाने की जरूरत है, ताकि किसानों को प्रति वर्ष गारंटीशुदा आय के रूप में 18,000 रुपये मिले, जो 1,500 रुपये प्रति माह होता है। यह राशि शहरी मध्यवर्ग के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन इससे कृषि पर निर्भर देश की आधी आबादी में बड़ा फर्क आएगा, जिनकी वार्षिक कृषि आय अधिकतम 20,000 रुपये है। यह योजना पहले से ही सभी भूस्वामी किसानों के लिए लागू है और इसमें बटायेदार किसानों को शामिल किए जाने की जरूरत है। इसलिए वित्त मंत्री को मेरा पहला सुझाव है कि वह कृषि के लिए एक आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज प्रदान करें, जो निश्चित रूप से ग्रामीण खर्च बढ़ाने में मदद करेगा।

मेरा दूसरा सुझाव एक कोष स्थापित करने को लेकर है, जिसे मूल्य समर्थन निधि या कृषि आजीविका निधि कह सकते हैं, जिसके तहत उन सभी मूल्यवर्धित उत्पादों पर उपकर लगाया जाए, जो कृषि वस्तुओं पर आधारित हैं। उदाहरण के लिए, पंजाब 120 लाख टन चावल का उत्पादन करता है। अगर प्रति किलो पर एक रुपये का उपकर लगाया जाता है, तो अकेले पंजाब में चावल से 1,200 करोड़ रुपये का मूल्य समर्थन कोष बनेगा। इसमें प्रमुख कृषि उत्पादों जैसे, चीनी, दाल, दूध और दुग्ध उत्पाद, मसाले, खाद्य तेल, सूती वस्त्र आदि को शामिल करें, तो हर साल एक बहुत बड़ा कोष तैयार किया जा सकता है। केवल प्रमुख कृषि वस्तुआें पर ही नहीं, बल्कि मूल्यवर्धित उत्पादों और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर भी उपकर लगाए जाने की आवश्यकता है। उपकर का मूल्य लाभ के आधार पर विभिन्न उत्पादों पर अलग-अलग हो सकता है।

वर्षों से किसान उपभोक्ताओं को सब्सिडी देते रहे हैं। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भारतीय अनुसंधान परिषद (आईसीआरआईईआर) का अध्ययन बताता है कि वर्ष 2000 से 2016 के बीच किसानों को उनकी वास्तवित आय से वंचित करने के कारण 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि किसानों को जो नुकसान हुआ, उससे उपभोक्ताओं को खुदरा मूल्य में 25 फीसदी का फायदा हुआ। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि उपभोक्ताओं को किसानों को बदले में भुगतान करने की आवश्यकता है और मूल्य समर्थन निधि से भुगतान करना सबसे सही तरीका है।

पिछले बजट में वित्त मंत्री ने शून्य बजट प्राकृतिक खेती की बात की थी, लेकिन उसके लिए कोई वित्तीय प्रावधान नहीं किया गया था। उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों से दूर रहने के लिए कहा। यह ऐसे वक्त में बेहद महत्वपूर्ण सुझाव है, जब कम से कम एक चौथाई ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए गहन कृषि को दोषी ठहराया जाता है। बेशक इसका नाम शून्य बजट सुझाया गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने या विस्तार करने के लिए किसी बजटीय आवंटन की जरूरत नहीं है। वित्त मंत्री को मेरा तीसरा सुझाव यह है कि सभी राज्यों में चरणबद्ध तरीके से प्राकृतिक खेती के आंध्र प्रदेश के प्रयोग को दोहराने के लिए कम से कम 25,000 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन करें। इसके बाद जैविक उत्पाद के लिए एक अलग बिक्री नेटवर्क बनाना होगा।

और अंत में, बिक्री के पर्याप्त बुनियादी ढांचे की कमी के चलते किसान अपनी उपज का सही मूल्य नहीं पा रहे हैं। कृषि उपज विपणन समिति द्वारा विनियमित 42,000 मंडियों की आवश्यकता है, पर अभी मात्र 7,000 मंडियां ही हैं। हालांकि सरकार ने दो साल पहले 22,000 ग्रामीण हाटों को उन्नत बनाने की घोषणा की थी, लेकिन उसकी प्रगति धीमी है। इसकी गति बढ़ाने के अलावा उपलब्ध मंडियों को विस्तृत और बेहतर बनाने के लिए अतिरिक्त आवंटन की जरूरत है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Disclaimer


हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
Agree
Election
  • Downloads

Follow Us