{"_id":"63bdd0d4fa34bd5c1d4394f7","slug":"incomplete-story-of-disinvestment-difference-between-promise-and-result","type":"story","status":"publish","title_hn":"Disinvestment: विनिवेश की अधूरी कहानी, वादे और परिणाम के बीच बड़ा अंतर","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
Disinvestment: विनिवेश की अधूरी कहानी, वादे और परिणाम के बीच बड़ा अंतर
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
Disinvestment
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
यह आखिरी क्षणों में भागदौड़ करने का सटीक उदाहरण है। जनवरी आते ही किसी सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) की आसन्न सगाई और विदाई या किसी दूसरे दुर्लभ विनिवेश लक्ष्य को पूरा करने संबंधी चुनिंदा ब्रीफिंग (जिसे विश्वस्त सूत्रों के हवाले से कहा जाता है) से कुछ व्याख्यात्मक सुर्खियां निकलती हैं। फिल्म की पटकथा की तरह कहानी में भी कई उतार-चढ़ाव होते हैं। दरअसल, विनिवेश लक्ष्य हॉलीवुड ब्लॉकबस्टर रनवे ब्राइड की याद दिलाते हैं, जिसमें
दुल्हन शादी से बचती रहती है।
एक फरवरी, 2021 को सरकार ने घोषणा की थी कि 'बीपीसीएल, एयर इंडिया, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, बीईएमएल, पवन हंस, नीलाचल इस्पात निगम से संबंधित कई लेन-देन के वित्त वर्ष 2021-22 में पूरा होने का प्रस्ताव है।' इनमें से अधिकांश लेन-देन अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। आमतौर पर उम्मीद और निराशा के बीच की दौड़ में नौकरशाही उम्मीदों को स्थगित करने का एक तरीका ढूंढती है। वादे और परिणाम के बीच का अंतर व्यवस्थागत सुस्ती का प्रतीक है।
यही कहानी वित्त वर्ष 2022–23 में भी जारी है। बजट 2022 में सरकार ने विनिवेश से 65,000 करोड़ रुपये जुटाने का वादा किया था। लक्ष्य पूर्ति का वादा इस बात पर निर्भर करता है कि निवेश और परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (डीआईपीएएम) आईडीबीआई बैंक के विनिवेश को पूरा कर सकता है या नहीं। हमेशा की तरह अंतिम क्षण के बदलाव सुर्खियों में हैं। इसमें नई बात यह जोड़ी गई है कि सरकार का वोटिंग अधिकार सिमटकर 15 फीसदी रह गया है और सार्वजनिक होल्डिंग के रूप में सेबी द्वारा सरकार की हिस्सेदारी का पुनर्वर्गीकरण किया गया है।
सवाल उठता है कि ये सारे बदलाव बजट से एक महीने पहले, अंतिम क्षण में जनवरी में ही क्यों दिखाई देते हैं। आईडीबीआई बैंक में बदलाव की बात वर्ष 2016 से बजट भाषणों में शामिल रही है। आईडीबीआई के विनिवेश का फैसला 2020-21 के बजट में किया गया था। वर्षों से सरकार बैंक की बोली लगाने के लिए विदेशी निवेशकों, फंडों और एनआरआई को लुभाने की कोशिश कर रही है। इस देरी के नतीजे जानने के लिए वैश्विक माहौल में बदलाव पर विचार करें। वर्ष 2022 के मध्य तक दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में ब्याज दरें एक फीसदी से कम थीं। बढ़ती मुद्रास्फीति के कारण दुनिया भर में ब्याज दरों में बढ़ोतरी हुई है। आईडीबीआई बैंक का मूल्य 7.5 अरब डॉलर आंका गया है। प्रभावी रूप से बोली लगाने वाले को लगभग चार अरब डॉलर का भुगतान करना होगा, जो ब्लूमबर्ग अरबपतियों के लिए भी छोटी राशि नहीं है।
वास्तव में दूसरों की तुलना में सरकार पिछले एक साल से बैलेंस शीट की सफाई और ऋण में वृद्धि के सकारात्मक प्रभाव को जानती होगी। शेयर बाजार में पिछले 18 महीनों से अधिक समय से बैंक शेयरों में तेजी की संभावना बनी हुई है। हर विश्लेषक और सट्टेबाज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर दांव लगा रहे हैं। पिछले दो वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के शेयरों में तेजी आई है। फिर भी बिना किसी कारण के आईडीबीआई बैंक के विनिवेश में देरी हो रही है। तथ्य यह है और इतिहास इस बात का गवाह है कि साल-दर-साल साहसी दावों के बावजूद सरकारें अक्सर विनिवेश लक्ष्य से चूक जाती हैं। वर्ष 1992 के बाद से 11.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि विनिवेश से जुटाने का लक्ष्य रखा गया था और आधे से कम या 5.6 लाख करोड़ रुपये जुटाए गए हैं।
वास्तव में अधिकांश विनिवेश सरकार द्वारा किया गया पुनर्निवेश है। सरकार के अनुसार 'विनिवेश/बिक्री का मतलब प्रबंधन नियंत्रण के हस्तांतरण के साथ-साथ केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम (सीपीएसई) की सरकारी शेयरधारिता की पूरी या पर्याप्त बिक्री है।' वर्ष 2016 में सरकार ने 'रणनीतिक विनिवेश' के लिए केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के 36 उद्यमों को सूचीबद्ध किया। टाटा द्वारा अधिग्रहित एयर इंडिया और नीलाचल इस्पात को छोड़कर, बड़े 'विनिवेश' अनिवार्य रूप से सरकार के स्वामित्व वाले उद्यमों द्वारा खरीदे जा रहे हैं। एचपीसीएल ओएनजीसी को बेच दिया गया था, आरईसी को पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन द्वारा खरीदा गया और इसी तरह कामराजार पोर्ट के हिस्से को चेन्नई पोर्ट ट्रस्ट और एचएससीसी (इंडिया) लिमिटेड को एनबीसीसी को बेच दिया गया। पिछले दस वर्षों में केवल दो बार सरकार ने विनिवेश का लक्ष्य हासिल किया है।
हैरानी की बात नहीं कि सार्वजनिक उद्यमों से प्राप्त लाभांश को विनिवेश के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया जा रहा है! इस बीच व्यावसायिक उद्यमों का राजनीतिक प्रबंधन करदाताओं के पैसे को उड़ा रहा है। शीतकालीन सत्र के दौरान, सरकार ने संसद को सूचित किया कि 248 ऑपरेटिंग सीपीएसई में से 59 घाटे में चल रहे थे। पिछले पांच वर्षों में सीपीएसई ने 1.17 लाख करोड़ रुपये से अधिक का घाटा दर्ज किया है, जो दिन के हर घंटे में 2.6 करोड़ रुपये से अधिक है। लाभ में सिर्फ वही सीपीएसई हैं, जहां सरकार प्रमुख खिलाड़ी है या सरकार का एकाधिकार है। एक के बाद एक आने वाली सरकारें जिस मूलभूत कारक को हल करने के लिए संघर्ष करती रही हैं, वह यह है कि अंपायर/नियामक बनना है या खिलाड़ियों में से एक। यह सच है कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में सरकार निवेश और विकास में प्रमुख भूमिका निभाती है। सवाल यह है कि क्या सरकार को वह सब कुछ चाहिए, जो उसके पास है और सरकार को वह सब कुछ प्रबंधित करना चाहिए, जिसका वह प्रबंधन करती है।
शुरुआत करने के लिए सरकार को निजीकरण के लिए सूचीबद्ध कंपनियों की होल्डिंग को संसद के प्रति जवाबदेह एक संप्रभु ट्रस्ट में स्थानांतरित करना चाहिए। दूसरा, राजनीतिक प्रबंधन को हटा देना चाहिए और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) के माध्यम से सभी सरकारी होल्डिंग्स को घटाकर रणनीति के अनुसार 51 या 26 प्रतिशत कर देना चाहिए। विकास कार्यों के वित्तपोषण के लिए होल्डिंग का लाभ उठाया जा सकता है। अवसर आने पर विनिवेश हो सकता है, जैसा कि प्रीमियम पर विभिन्न चरणों में मारुति के साथ हुआ। विनिवेश लक्ष्य से चूकने की सालाना कहानी खत्म होनी चाहिए। दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को बेहतर होना चाहिए। धुंध और लक्ष्य के लिए अंतिम क्षण की दौड़ खत्म होनी चाहिए।