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कट्टरपंथियों की गिरफ्त में
मरिआना बाबर, वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार
Updated Thu, 10 May 2018 07:09 PM IST
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टीईएल
पाकिस्तान के गृह मंत्री एहसान इकबाल पर हुआ जानलेवा हमला पाकिस्तान की जम्हूरियत पर हमला है, और आम चुनाव चूंकि कुछ ही महीने बाद होने वाले हैं, ऐसे में यह हमला कट्टरवादियों की ओर से संकेत है कि चुनाव अभियान में वे बड़ी भूमिका निभाएंगे। पीएमएल (एन) यानी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज के बेहद लोकप्रिय नेता एहसान इकबाल हालांकि बच गए हैं और स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान की घायल हो चुकी जवान जम्हूरियत को पूरी तरह स्वस्थ होने में अभी वक्त लगेगा। पिछले चुनाव के दौरान पाक तालिबान ने इतना आतंक मचाया था कि सिंध में व्यापक जनाधार वाली उदारवादी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और खैबर पख्तूनख्वा की प्रगतिशील अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) चुनाव प्रचार में हिस्सा तक नहीं ले पाई थीं।
पंजाब के कानून मंत्री राना सनाउल्ला का मानना है कि पीएमएल (एन) और उसके नेतृत्व की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए आतंक का माहौल तैयार किया जा रहा है। उनके मुताबिक, एहसान इकबाल पर हमला इसका सबूत है कि जो लोग 2018 के चुनाव में पीएमएल (एन) को जीतते नहीं देखना चाहते और उसे दबाने की अपनी पिछली कोशिशों में नाकामयाब हो चुके हैं , वे अब इस पार्टी के नेताओं को आतंकित कर देना चाहते हैं, ताकि वे अपने घरों में सिमटे रहें। सनाउल्ला के मुताबिक, यह चुनाव में देर करने की उनकी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
पीपीपी की बेनजीर भुट्टो की अगर आतंकियों ने हत्या कर दी, तो एएनपी के कई बड़े नेताओं को तालिबान ने मार डाला। लेकिन चूंकि इस साल सुरक्षा व्यवस्था बेहतर है, ऐसे में इन दोनों पार्टियों के नेता चुनाव अभियानों में व्यस्त हैं। बड़ी समस्या दरअसल यह है कि सुरक्षा एजेंसियां पंजाबी जेहादियों समेत आतंकी समूहों का समर्थन कर रही हैं। पाक सेना ने आतंकवादियों के खिलाफ सफल अभियान चलाया है, जिसमें उसके हजारों जवानों के अलावा नागरिक सुरक्षा बल के सदस्य भी मारे गए हैं। जबकि अनेक आतंकयों का सफाया नहीं किया जा सका है। एहसान इकबाल को गोली मारने वाले का ही उदाहरण लें। उसका नाम आबिद हसन है और उसकी उम्र महज इक्कीस साल है।
आबिद हुसैन ने पुलिस को बताया कि उसका लक्ष्य ईशनिंदकों की हत्या करना और सरकार में बढ़ते सेक्यूलर असर को खत्म करना है। वह इस्लामी तहरीक-ए-लबैक (टीईएल) पार्टी का सदस्य है, हालांकि इस टीईएल ने हुसैन को अपना सदस्य मानने से इन्कार किया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हुसैन ने पुलिस को बताया कि वह लबैक के संस्थापकों की शिक्षाओं से बेहद प्रभावित हुआ और पिछले नवंबर में इस्लामाबाद में पार्टी के एक धरना प्रदर्शन में भी शामिल हुआ था, जो एक मंत्री को-जिस पर ईशनिंदा के आरोप थे-सत्ता से बाहर करने की मांग पर शुरू हुआ था। हुसैन ने पुलिस को बताया कि 11 वीं सदी के धर्मोपदेशक अली हजबेरी उसके सपने में आए थे और उन्होंने उसे एहसान इकबाल की हत्या करने का हुक्म दिया।
पाकिस्तान में टीईएल के उदय के लिए मुस्लिम लीग की सरकार ही जिम्मेदार है, क्योंकि इस पार्टी का जनाधार पंजाब में है, और वहां के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ-जो कि मुस्लिम लीग के मुखिया भी हैं-इस कट्टरवादी पार्टी के खिलाफ कदम उठाने के मामले में उदासीन हैं। उन्होंने इस पार्टी के किसी भी सदस्य के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है। इसके बजाय उन्होंने पिछले साल इस्लामाबाद में टीईल के सदस्यों को न सिर्फ एकजुट होने दिया, बल्कि तोड़फोड़ मचाए जाने के बाद भी उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। बल्कि सेना के एक जनरल ने टीवी कैमरों के सामने टीईएल के सदस्यों को घर लौटने के लिए पैसे दिए! ऐसे में, यह सवाल उठाया जा रहा है कि सरकार इस धार्मिक संगठन से क्यों डरती है, जिसकी आतकी गतिविधियां छिपी हुई नहीं हैं।
इसका एक जवाब यह है कि ईशनिंदा वस्तुतः बेहद संवेदनशील मामला है। कुछ साल पहले गवर्नर सलमान तासीर की उनके एक अंगरक्षक मुमताज कादरी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। सलमान तासीर दरअसल एक ईसाई महिला को न्याय दिलाने की दिशा में काम कर रहे थे, जो ईशनिंदा के आरोप में जेल में थी। मुमताज कादरी को फांसी की सजा दी गई, पर आज उसकी कब्र एक मजार में तब्दील हो गई है, जहां हजारों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं। ऐसे लोग अशिक्षित तो हैं ही, उन्हें यह कहकर बहकाया गया है कि मुमताज कादरी ने सही किया था। वह एक संत थे, जबकि सलमान तासीर ईशनिंदा की वकालत कर रहे थे।
सांसदों के लिए नेशनल एसेंबली में शपथ लेते हुए ईशनिंदा के संदर्भ को इस पृष्ठभूमि में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। सरकार ने शपथ लेने की इस प्रक्रिया को और सरल बनाने की कोशिश की, लेकिन ऐसे में वह कट्टर इस्लामी पार्टियों के निशाने पर आ गए, जिनका आरोप है कि सरकार ने इसके आखिरी पैराग्राफ से छेड़छाड़ की है, जिसमें कहा गया है कि मोहम्मद साहब आखिरी पैगंबर थे। सरकार ने इस आरोप से इन्कार किया है, लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो गया। बौखलाए हुए धार्मिक कट्टरपंथियों को अपनी ताकत दिखाने का सुनहरा मौका मिल गया। टीईएल के समर्थन में मुल्क के कोने-कोने से लोग आए और उस धरना प्रदर्शन के खिलाफ कदम उठाने के बजाय सरकार पूरी तरह रक्षात्मक नजर आई। सरकार के इस लचर रुख ने टीईएल का हौसला बढ़ाया है और वह चुनाव लड़ने जा रहा है। लोग सवाल कर रहे हैं कि चुनाव आयोग ने एक ऐसे संगठन को चुनाव लड़ने की इजाजत कैसे दे दी, जो हिंसा में लिप्त रहा है। पर ऐसी आवाजें कम ही हैं।
मीडिया रिपोर्टों में जहां गृह मंत्री एहसान इकबाल पर हमले की घोर निंदा की गई है, वहीं मुल्क के राजनीतिक नेतृत्व ने इस हादसे को आगामी आम चुनाव से पहले एक अपसगुन के तौर पर लिया है।
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पंजाब के कानून मंत्री राना सनाउल्ला का मानना है कि पीएमएल (एन) और उसके नेतृत्व की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए आतंक का माहौल तैयार किया जा रहा है। उनके मुताबिक, एहसान इकबाल पर हमला इसका सबूत है कि जो लोग 2018 के चुनाव में पीएमएल (एन) को जीतते नहीं देखना चाहते और उसे दबाने की अपनी पिछली कोशिशों में नाकामयाब हो चुके हैं , वे अब इस पार्टी के नेताओं को आतंकित कर देना चाहते हैं, ताकि वे अपने घरों में सिमटे रहें। सनाउल्ला के मुताबिक, यह चुनाव में देर करने की उनकी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
पीपीपी की बेनजीर भुट्टो की अगर आतंकियों ने हत्या कर दी, तो एएनपी के कई बड़े नेताओं को तालिबान ने मार डाला। लेकिन चूंकि इस साल सुरक्षा व्यवस्था बेहतर है, ऐसे में इन दोनों पार्टियों के नेता चुनाव अभियानों में व्यस्त हैं। बड़ी समस्या दरअसल यह है कि सुरक्षा एजेंसियां पंजाबी जेहादियों समेत आतंकी समूहों का समर्थन कर रही हैं। पाक सेना ने आतंकवादियों के खिलाफ सफल अभियान चलाया है, जिसमें उसके हजारों जवानों के अलावा नागरिक सुरक्षा बल के सदस्य भी मारे गए हैं। जबकि अनेक आतंकयों का सफाया नहीं किया जा सका है। एहसान इकबाल को गोली मारने वाले का ही उदाहरण लें। उसका नाम आबिद हसन है और उसकी उम्र महज इक्कीस साल है।
आबिद हुसैन ने पुलिस को बताया कि उसका लक्ष्य ईशनिंदकों की हत्या करना और सरकार में बढ़ते सेक्यूलर असर को खत्म करना है। वह इस्लामी तहरीक-ए-लबैक (टीईएल) पार्टी का सदस्य है, हालांकि इस टीईएल ने हुसैन को अपना सदस्य मानने से इन्कार किया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हुसैन ने पुलिस को बताया कि वह लबैक के संस्थापकों की शिक्षाओं से बेहद प्रभावित हुआ और पिछले नवंबर में इस्लामाबाद में पार्टी के एक धरना प्रदर्शन में भी शामिल हुआ था, जो एक मंत्री को-जिस पर ईशनिंदा के आरोप थे-सत्ता से बाहर करने की मांग पर शुरू हुआ था। हुसैन ने पुलिस को बताया कि 11 वीं सदी के धर्मोपदेशक अली हजबेरी उसके सपने में आए थे और उन्होंने उसे एहसान इकबाल की हत्या करने का हुक्म दिया।
पाकिस्तान में टीईएल के उदय के लिए मुस्लिम लीग की सरकार ही जिम्मेदार है, क्योंकि इस पार्टी का जनाधार पंजाब में है, और वहां के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ-जो कि मुस्लिम लीग के मुखिया भी हैं-इस कट्टरवादी पार्टी के खिलाफ कदम उठाने के मामले में उदासीन हैं। उन्होंने इस पार्टी के किसी भी सदस्य के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है। इसके बजाय उन्होंने पिछले साल इस्लामाबाद में टीईल के सदस्यों को न सिर्फ एकजुट होने दिया, बल्कि तोड़फोड़ मचाए जाने के बाद भी उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। बल्कि सेना के एक जनरल ने टीवी कैमरों के सामने टीईएल के सदस्यों को घर लौटने के लिए पैसे दिए! ऐसे में, यह सवाल उठाया जा रहा है कि सरकार इस धार्मिक संगठन से क्यों डरती है, जिसकी आतकी गतिविधियां छिपी हुई नहीं हैं।
इसका एक जवाब यह है कि ईशनिंदा वस्तुतः बेहद संवेदनशील मामला है। कुछ साल पहले गवर्नर सलमान तासीर की उनके एक अंगरक्षक मुमताज कादरी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। सलमान तासीर दरअसल एक ईसाई महिला को न्याय दिलाने की दिशा में काम कर रहे थे, जो ईशनिंदा के आरोप में जेल में थी। मुमताज कादरी को फांसी की सजा दी गई, पर आज उसकी कब्र एक मजार में तब्दील हो गई है, जहां हजारों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं। ऐसे लोग अशिक्षित तो हैं ही, उन्हें यह कहकर बहकाया गया है कि मुमताज कादरी ने सही किया था। वह एक संत थे, जबकि सलमान तासीर ईशनिंदा की वकालत कर रहे थे।
सांसदों के लिए नेशनल एसेंबली में शपथ लेते हुए ईशनिंदा के संदर्भ को इस पृष्ठभूमि में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। सरकार ने शपथ लेने की इस प्रक्रिया को और सरल बनाने की कोशिश की, लेकिन ऐसे में वह कट्टर इस्लामी पार्टियों के निशाने पर आ गए, जिनका आरोप है कि सरकार ने इसके आखिरी पैराग्राफ से छेड़छाड़ की है, जिसमें कहा गया है कि मोहम्मद साहब आखिरी पैगंबर थे। सरकार ने इस आरोप से इन्कार किया है, लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो गया। बौखलाए हुए धार्मिक कट्टरपंथियों को अपनी ताकत दिखाने का सुनहरा मौका मिल गया। टीईएल के समर्थन में मुल्क के कोने-कोने से लोग आए और उस धरना प्रदर्शन के खिलाफ कदम उठाने के बजाय सरकार पूरी तरह रक्षात्मक नजर आई। सरकार के इस लचर रुख ने टीईएल का हौसला बढ़ाया है और वह चुनाव लड़ने जा रहा है। लोग सवाल कर रहे हैं कि चुनाव आयोग ने एक ऐसे संगठन को चुनाव लड़ने की इजाजत कैसे दे दी, जो हिंसा में लिप्त रहा है। पर ऐसी आवाजें कम ही हैं।
मीडिया रिपोर्टों में जहां गृह मंत्री एहसान इकबाल पर हमले की घोर निंदा की गई है, वहीं मुल्क के राजनीतिक नेतृत्व ने इस हादसे को आगामी आम चुनाव से पहले एक अपसगुन के तौर पर लिया है।