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स्मृति के महीन धागों में
नई दिल्ली
Updated Sat, 02 Mar 2013 11:11 PM IST
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जिंदगी में किस्सों की कमी नहीं होती। कभी बचपन की बातें याद आती हैं तो कभी जवानी की कहानियां। कभी वो पल, जब हर कोई अपना लगता था तो कभी वो सफर, जब देश और दुनिया बदलने की ठानी थी। चमकीली आंखों से लेकर सपनीली आंखों तक जैसे आंखों में ही जिंदगी के ये सारे किस्से दर्ज होते जाते हैं।
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फिर जब यही आंखें किस्सागोई करने लगती हैं, तो एक कवि के लिए उन किस्सों को शब्दों में कहना जरूरी भी हो जाता है। इसी जरूरत को पूरा किया है युवा कवि प्रदीप कांत ने अपने गजल संग्रह ‘किस्सागोई करती आंखें’ में। गणित और भौतिकी जैसे विषयों से जूझते हुए भी प्रदीप ने अपनी जिंदगी की तसवीर को कला, संगीत और साहित्य के रचनात्मक रंगों से संवारा है।
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गालिब और दुष्यंत कुमार की गजलों को पढ़कर बड़े हुए प्रदीप की किस्सागोई में भी गजल विधा की साफगोई और स्पष्टता साफ नजर आती है। ‘होठों पर सकुचाए शब्द, नजर मिली मुस्काए शब्द/ छोड़ जहां तुम चले गए, पड़े वहीं, कुम्हलाए शब्द/ ’या फिर ‘सहज मिले जिसमें भी रोटी, लिख लो वही हमारी जात/’ जैसी कटाक्ष करती गजलों में प्रदीप ने समय और समाज की वास्तविकता को बड़ी बेहतरी से सजाया है। एक ऐसे दौर में जब गजल लिखना युवाओं के बीच फैशनपरस्ती सरीखा हो चुका है, तब प्रदीप इस गंभीर अर्थ संजोने वाली विधा को बचाते नजर आते हैं।
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किस्सागोई करती आंखें (गजल संग्रह)
लेखक- प्रदीप कांत
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य- 40 रुपये